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तुम्हारी गलती नहीं आफरीदी, विष के पेड़ में आम नहीं फलते

पदमजीभारत के हाथों विश्व कप सेमीफ़ाइनल में हारने के बाद स्वदेश पहुंचने पर मीडिया से घिरे पाकिस्तानी कप्तान शाहिद आफरीदी ने कराची हवाई अड्डे पर अपने वतन के लोगों से जब यह सवाल किया, ”वे क्यों हिंदुस्तान से नफ़रत करते हैं जबकि हम सारी रवायतें, यानी शादी-व्याह आदि उनकी तरह से करते हैं, अपने ड्राइंग रूम में भारतीय फिल्में देखते हैं और हिंदी गाने हमारी हर गली हर कूचे में बजते रहते हैं, तब क्यों नहीं वे इंडिया से दुश्मनी की बात सोचते, वे क्यों क्रिकेट मैच को आम मैच की तरह न लेकर जंग की तरह लेते हैं?”

पदमजीभारत के हाथों विश्व कप सेमीफ़ाइनल में हारने के बाद स्वदेश पहुंचने पर मीडिया से घिरे पाकिस्तानी कप्तान शाहिद आफरीदी ने कराची हवाई अड्डे पर अपने वतन के लोगों से जब यह सवाल किया, ”वे क्यों हिंदुस्तान से नफ़रत करते हैं जबकि हम सारी रवायतें, यानी शादी-व्याह आदि उनकी तरह से करते हैं, अपने ड्राइंग रूम में भारतीय फिल्में देखते हैं और हिंदी गाने हमारी हर गली हर कूचे में बजते रहते हैं, तब क्यों नहीं वे इंडिया से दुश्मनी की बात सोचते, वे क्यों क्रिकेट मैच को आम मैच की तरह न लेकर जंग की तरह लेते हैं?”

यदि मैंने उनका यह चकित करने वाला बयान स्वयं अपनी आँखों से टेलीविजन पर न देखा होता तो शायद विश्वास नहीं कर पाता कि कोई पाकिस्तानी कप्तान अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत दो दिलों को जोड़ने वाली भाषा भी बोल सकता है…! मैंने तत्काल फेसबुक  पर ”पठान की पठानी को सलाम” शीर्षक से टिप्पणी की थी. मगर कल आफरीदी ने एक पाकिस्तानी चैनल से बातचीत में जिस कदर भारत के खिलाफ ज़हर उगला और पलटी खाई उसने स्वाद कसैला तो किया ही, यह भी भरोसा हो गया कि चाहे लाख जतन कर ले कोई पर कुत्ते की दुम न कभी सीधी हुई है और न कभी होगी.

मैं यहाँ अपने कुछ पत्रकार मित्रों की भी चर्चा करना चाहूँगा. दरअसल, मैंने आस्ट्रेलिया पर जीत के बाद अपने कालम के अंतिम पैराग्राफ में पाकिस्तान को लेकर जो लिखा उस पर अपने कमेन्ट में उन मित्रों ने नाखुशी जाहिर की, यह कहते हुए कि स्तम्भ पढ़ कर उन्हें आनद आया, अंतिम पैरा छोड़ कर. शायद वे एक खेल स्तम्भ में राजनीति को अश्पृश्य मानते होंगे. मैं एक बार फिर उस अंतिम पैरे की उन पंक्तियों को यहां उधृत करना चाहूंगा, जो इस प्रकार थीं- ”चाणक्य की तीन बातें हमें याद रखनी चाहिए और वे हैं, ‘अपमान, आत्मग्लानि और पराजय`. मैं यह नहीं कहता कि क्रिकेट कोई युद्ध है, मैं यह भी नहीं कहता कि अजमल कसाब के साथ क्रिकेट का कोई सरोकार है परन्तु इतना जरूर कहूंगा कि पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने कभी आतंकवाद की निंदा भी नहीं की है. उन्हें कम से कम एक बार हमें इस संकल्प के साथ हराना चाहिए, जिसमें शतक लगे तो अपमान के जवाब में, विकेट गिरे तो आत्मग्लानि के मार्जन में, ताकि औसत दर्जे की पाकिस्तानी टीम को यह बताया जा सके कि कबीला चाहे कितना भी ताकतवर क्यों न हो जाये, उसे कभी भी सेना नहीं कहा जाता.”

अब जरा सुनिए आफरीदी ने हमारी ही बात की किस कदर तसदीक की, ”हिन्दुस्तानी इतने तंग दिल हैं कि उनसे कभी दोस्ती हो ही नहीं सकती. हम पाकिस्तानियों का दिल बहुत बड़ा है”. उन्होंने हमारी ही बात की पुष्टि करते हुए गंभीर को इसलिए कोसा कि इस भारतीय खब्बू बल्लेबाज ने विश्व कप की जीत 26 \ 11 कांड में मारे गए शहीदों को समर्पित की थी. आफरीदी का इस पर कहना था कि गंभीर को मालूम भी है कि मुंबई के हमलावर कौन थे? यानी पाकिस्तानी कप्तान यह कहना चाहते थे कि आतंकी उनके देश के नहीं थे. जबकि स्वयं उनकी सरकार काफी हीला-हवाली के बाद मान चुकी है कि मुबई कांड की साजिश पाकिस्तान में रची गयी थी और वे सभी उनके देश के ही थे.

असल में आफरीदी का पलटी मारना अपने पहले के कप्तानों की राह पर चलना ही है, जो हमेशा भारत के साथ क्रिकेट मुकाबलों को बतौर जंग देखते थे. दूरदर्शन की आर्काइब्‍ज में 1978 सीरीज के दूसरे लाहौर टेस्ट में पक्षपाती देशभक्त घरेलू अम्पायरों की मदद से भारत को हराने के बाद तत्कालीन पाकिस्तानी कप्तान मुश्ताक के उस बयान की फुटेज मिल जाएगी. उसे देखिये तो स्वतः ही जवाब मिल जाएगा कि खेल को जंग की तरह से कौन लेता है. मुशी ने तब कहा था, ”दुनिया भर के मुसलमान भाइयों की दुआओं से हम यह जंग जीतने में कामयाब हुए हैं.” यही नहीं, थोड़ी देर बाद ही सैन्य तानाशाह जियाउल हक साहब पीटीवी पर नमूदार होकर जीत की खुशी में अगले दिन पाकिस्तान में सार्वजनिक छुट्टी का एलान करते हैं और यह सुन कर वहां मौजूद भारतीय पत्रकारों की आंखें अविश्वास से चौड़ी हो गयी थीं. अभी आप देखिये कि चाहे वो 1983 रहा हो या 2008, हमने एक दिनी और टी-20 के विश्व कप जीते और फिर इसी बीती दो अप्रैल को मुंबई में भी इतिहास दोहराया. देश में जश्न का सागर लहराया. पर किसी ने इस उपलक्ष्य में छुट्टी की कल्पना भी की क्या?

यह मानसिकता मुझे पाकिस्तान की अपनी यात्राओं में देखने को मिली. पाक के लिए कोर इशु कश्मीर है और इसके चलते कई युद्ध लड़े जा चुके हैं, यह भी बताने की जरूरत नहीं, पर अपनी कप्तानी के दौरान इमरान खान हमेशा एक बात कहा करते थे कि कश्मीर को दांव पर लगा कर क्रिकेट मैच खेल लो, जिसकी जीत हुई, कश्मीर उसी का हो जाएगा. मानो कश्मीर कोई पांचाली या कोई कप अथवा ट्राफी हो. जरा टीम इंडिया के उन खिलाडियों से तो कोई पूछ कर देखे जो पाकिस्तान जा चुके हैं, वे आपको बताएंगे कि वहां किस कदर उनका जीना हराम होता रहा है. खिलाड़ी जब हमसे मिलते तब यही पहला सवाल होता, और कितने दिन बचे? उनकी होम सिकनेस का कोई पुरसा हाल लेने वाला नहीं था.

मुझे याद है कि 1983 विश्व कप गंवाने के बाद वेस्टइंडीज टीम घायल शेरों के मानिंद थी. कानपुर में खेले गए पहले टेस्ट में उसने सवा तीन दिन से भी कम समय में कपिल की टीम को धो कर रख दिया था और तीसरे दिन के खेल की समाप्ति के समय ही भारत फालोआन खाकर शर्मनाक पराजय के दहाने पर खड़ा था. तब टेस्ट मैचों दौरान एक दिन का अवकाश हुआ करता था. मैं उस टेस्ट के अवकाश दिवस पर मित्र दिलीप वेंगसरकर से मिलने जब होटल पहुंचा तो रमन लाम्बा (स्वर्गीय) के साथ रूम शेयर कर रहे वेंगी ने मिलते ही तपाक से मुझसे सवाल किया, ”अगर हमारे खिलाफ पाकिस्तान अपने घर में इसी स्थिति में हो तो क्या टेस्ट पूरा हो सकेगा, क्या वहां की जनता पिच पर तारकोल नहीं डाल देगी ओर क्या दंगा नहीं भड़क उठेगा?”

वेंगी की आशंका गलत या पूर्वाग्रहों से भरी नहीं थी, तब तक अपने जिन दो दौरों में उन्होंने जो अनुभव किया था, वही हम आपस में इस बहाने बांट रहे थे. 1989 में क्या हुआ हुआ था, वेंगी तो बोर्ड के कोपभाजन होने की वजह से टीम में नहीं लिए गए थे. लेकिन उनका कहा एकदम सही साबित हुआ. पाकिस्तान ने 30 रन पर जब मियांदाद सहित पांच विकेट खो दिए तो दर्शक मैदान में घुस आये और दंगे में भारतीय कप्तान श्रीकांत के कपडे़ फाड़ दिए गए. गनीमत यह रही कि वे किसी तरह से बचे. 16  साल का सचिन अपने इस पहले दौरे में ही यह दृश्य देख कर घबरा उठा था और कराची का वो बदनाम एक दिनी मैच रद्द कर दिया गया था.

पाकिस्तानी कप्तान अफरीदी ने ज़हर उगलते समय जाने-अनजाने में अल्लाह मियां के हक को भी छोटा कर दिया. इस्लाम का मानना है की परवरदिगार ने खुदाई और दुनिया बनाई है. पतंगे से लेकर इन्सान उन्हीं की मेहरबानी है, पर आफरीदी को लगा कि मुसलमानों और पाकिस्तानियों का दिल खुदा ने बड़ा बनाया है, हिन्दुस्तानियों का नहीं. इसका मायने यह होता है कि खुदा सभी का रचयिता नहीं है. गाली दो भारतीयों को मगर खुदा के लिए खुदा की हैसियत को तो छोटा मत करो. यह जो तुम्हारा बड़ा दिल है, यह और कुछ नहीं एक गभीर बीमारी है -हार्ट इन्लार्ज्मेंट की और तुम्हारे मुल्क को इसके लिए लम्बे इलाज की जरूरत है. मटके में भरा हुआ ज़हर हो और ऊपर थोड़ी सी मलाई की परत, तो वह ज़हर को कम तो नहीं न करेगी.

खैर,  आफरीदी तुम्हारी कोई गलती नहीं. विष के पेड़ में आम नहीं फलते. तुम्हारे मुल्क में कठमुल्ला वाद ने हिन्दुस्तानी नफरत के ककहरे से तुम्हारी जुबान खोली है, तुम्हारे इतिहास की उम्र हिंदुस्तान के किसी मुफलिस के घराने से भी कम है. लिहाज़ा हमें तुम्हारी बदजुबानी से भी हमदर्दी है. अभी तक कबीलाई हो, जिस दिन तुम शरीफ इंसान बनोगे, उस दिन हम तुम्हे आगे की तालीम देंगे.  (नवीन जोशी भाई, सुन रहे हैं न…)

लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है.

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