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”तू जौ का एक दाना नहीं निगल सकता मैं अशर्फियों के टोकरे कैसे बर्दाश्‍त कर पाऊंगा”

: शाहन के शाह : महमूद गजनवी की बोलती बंद कर दी अबुल हसन ने :  महमूद गजनवी के इशारे पर गुलामों ने अशर्फियों के टोकरे दरवेश के सामने रख दिये, बदले में दरवेश ने बादशाह को जौ का एक दाना थमा कर चबाने की गुजारिश की। गजनवी ने दाना मुंह में रख कर चबाने और निगलने की कोशिश की, लेकिन दाना उसके गले में ही फंस गया। बेहाल बादशाह को देखकर दरवेश हंसा, बोला:- जब अल्‍लाह का दिया यह दाना तुमसे नहीं निगला जा रहा, तो अशर्फियों के यह टोकरे मैं कैसे बर्दाश्‍त कर पाऊंगा। बातचीत का मकसद महमूद गजनवी समझ गया। इशारा हुआ और टोकरे हटा लिये गये। लेकिन इसके बावजूद गुजारिश की कुछ तो तोहफा कूबूल कर लीजिए। दरवेश बोला:- मुझे दुनियावी चीजों में मत भटकाओ।

: शाहन के शाह : महमूद गजनवी की बोलती बंद कर दी अबुल हसन ने :  महमूद गजनवी के इशारे पर गुलामों ने अशर्फियों के टोकरे दरवेश के सामने रख दिये, बदले में दरवेश ने बादशाह को जौ का एक दाना थमा कर चबाने की गुजारिश की। गजनवी ने दाना मुंह में रख कर चबाने और निगलने की कोशिश की, लेकिन दाना उसके गले में ही फंस गया। बेहाल बादशाह को देखकर दरवेश हंसा, बोला:- जब अल्‍लाह का दिया यह दाना तुमसे नहीं निगला जा रहा, तो अशर्फियों के यह टोकरे मैं कैसे बर्दाश्‍त कर पाऊंगा। बातचीत का मकसद महमूद गजनवी समझ गया। इशारा हुआ और टोकरे हटा लिये गये। लेकिन इसके बावजूद गुजारिश की कुछ तो तोहफा कूबूल कर लीजिए। दरवेश बोला:- मुझे दुनियावी चीजों में मत भटकाओ।

खिसियाये बादशाह ने चलते-चलते उनके झोंपड़े की तारीफ कर दी, बस इतने पर दरवेश ने फिर तपाक से जवाब दिया। तूने अल्‍लाह के नाम पर इतना बड़ा साम्राज्‍य खड़ा कर लिया, लेकिन जेहन से लालच अब तक नहीं गया। इस दरवेश के झोंपड़े से अगर तेरी हवस मिट सकती है, तो ले, यह भी रख ले। लेकिन जब शर्मिंदा बादशाह लौटने लगा तो दरवेश उसे बाहर तक विदा करने आया। पूछने पर जवाब दिया, कि अब तेरे चेहरे पर अल्‍लाह की हैसियत महसूस करने का नूर आ गया है, और उसकी उपेक्षा मैं हर्गिज नहीं कर सकता। दरअसल, गजनवी ने दरवेश के पास यह कहला भेजा था कि अल्‍लाह की सेवा तो करो, मगर उसकी भी सेवा करो जो शाह-ए-मुल्‍क है। बस यही खटक गया था दरवेश को। उसने कहला दिया कि अल्‍लाह की खिदमत से ही फुर्सत नहीं, फिर दूसरों के साथ बकवास करने का क्‍या मतलब। झल्‍लाये बादशाह ने दरवेश की परीक्षा लेने के लिए अपने गुलाम को बादशाह के कपड़े पहनाये और खुद गुलामों के लिबास में गुलामों के साथ हो लिये। लेकिन दरवेश ने गुलाम बने बादशाह से पूछा:- यह नाटक करने की क्‍या जरूरत थी। जाहिर है, गजनवी का सिर शर्म से झुक गया।

खिरकान के इलाके में जन्‍मा यह दरवेश था अबुल हसन। अपने इलाके नाम पर ही इनके नाम के आगे खिरकानी जुड़ गया। लेकिन सरलता इतनी कि वक्‍त ने उन्‍हें महान तम संतों की श्रेणी में शामिल कर लिया। अल्‍लाह की इबादत के बारे में उनका तर्क था कि अल्‍लाह को एक बार याद करने की कीमत अगर चेहरे पर तलवार के हजार वार बर्दाश्‍त करने की भी हो, तो सौदा सस्‍ता है। बताते हैं कि अपनी बीमार मां की सेवा के लिए अबुल हसन और उनके भाई बारी बांट ली थी। एक दिन उनका भाई इबादत में था और अबुल हसन मां की सेवा कर रहे थे। इबादत करते भाई के कानों में आवाज गूंजी:- तुम्‍हारे भाई को मोक्ष मिल गया और उसके जरिये तुम्‍हें भी।

भाई के दिमाग में सवाल कौंधा :- इबादत तो मैं कर रहा हूं, मगर पहले मुझे क्‍यों नहीं। जवाब मिला:- इबादत और खिदमत में फर्क होता है। तू इबादत कर रहा है, जिसकी मुझे जरूरत नहीं। जबकि तेरा भाई अपनी मां की खिदमत कर रहा है, जिसकी सख्‍त जरूरत है। लेकिन इसके बावजूद अबुल हसन ने सरलता का साथ नहीं छोड़ा। वे हमेशा कहते रहे कि मैं दूसरों के साथ अल्‍लाह को जब तक देखता रहा, निश्‍छल नहीं हो पाया, लेकिन अल्‍लाह को पहले देखने के बाद ही सरलता अपने आप ही मुझमें आ गयी। हां, हाजिरजवाब तो वे हमेशा ही रहे।

एक घटना देखिये। अपना बड़प्‍पन दिखाने के लिए एक सूफी संत दरवेशों को समझा रहे थे कि सूफी के आचरण क्‍या होते हैं, उन्‍हें क्‍या करना और कैसे रहना चाहिए। दरवेश ने जिज्ञासा प्रकट की तो जवाब मिला कि दरवेश को ओढ़ने के लिए ऊन का कम्‍बल और भोजन में केवल जौ का ही इस्‍तेमाल करना चाहिए। मगर दरवेश ने पलट कर जब यह पूछ लिया कि जानवर भी तो जौ खाता है और ऊन ओढे रहता है, व‍ह भी बिना किसी लालच के। फिर उसे सबसे बड़ा सूफी क्‍यों ना मान लिया जाए, पूरे माहौल में सन्‍नाटा छा गया।

बेहिसाब हाजिर जवाब भी थे अबुल हसन खिरकानी। एक बार एक शेखों के शेख माने जाने वाले अबू उल उमर अबू अब्‍बास ने एक दिन एक विशाल पेड़ पर अबुल हसन के साथ चढ़ कर मजाक किया:- चलो, इस दरख्‍त से कूदा जाए। अबुल हसन ने तत्‍क्षण जवाब दिया:- कूदना ही है तो दोनों जहान से कूदो, बहिश्‍त से भी और दोजख से भी। और सीधे अल्‍लाह की गोद में जा गिरो ताकि अपना जीवन तो संवार सको। शेख ने किसी दिन एक और चमत्‍कार दिखाने के लिए अबुल हसन के पानी के घड़े में हाथ डाल कर एक जिन्‍दा मछली निकाल कर भेंट की, तपाक से अबुल हसन ने सामने जल रही आग के शोलों में हाथ डाल कर एक जिन्‍दा मछली शेख की खिदमत में पेश कर दी। शेख घबराया और बोला :- चलो, इस आग में कूद कर देखें कि कौन जिन्‍दा बचता है। अबुल हसन का जवाब था कि आग में गोता लगाने और उससे बचकर निकलने के बजाय अल्‍लाह में दिल लगाओ और फिर देखा जाए कि कौन उस परवरदिगार की हस्‍ती से बच कर जिन्‍दा वापस आता है।

लोगों को हैरत होती थी कि खिरकान से पांचों वक्‍त की नमाज पढ़ाने के लिए सात मील दूर लेबनान जाकर हर बार अबुल हसन के लिए मुमकिन कैसे होता है, लेकिन यह काम वे पूरी निष्‍ठा से करते थे। और लम्‍ब समय तक तो लोग यह जान ही न पाये कि अबुल हसन लेबनानी हैं या खिरकानी। जब समझा भी, तो उसे चमत्‍कार माना जाने लगा। लेकिन अबुल हसन हमेशा संयत रहे। उनका तो कहना था कि जो अल्‍लाह के सामने पहाड़ की तरह चेतनाशून्‍य नहीं हो सकता, वह इंसान नहीं। इंसान तो वह है जो खुद को मिटाकर अल्‍लाह की हस्‍ती के सामने नतमस्‍तक हो। संत इतिहास के इस बेमिसाल बंदे की सरलता का अंदाजा केवल इसी घटना से ही लगाया जा सकता है कि डाकुओं द्वारा उनके बेटे का सिर कलम कर उसे अबुल हसन के दरवाजे पर टांग देने की घटना पर बीवी दहाड़ मार कर उन्‍हें लानतें भेजनी शुरू कर दीं। बोलीं :- आप जैसे शख्‍स को मैं वली मानने से इनकार करती हूं। अबुल हसन ने साफ तौर पर माना कि घटना के वक्‍त मैं अल्‍लाह की खिदमत में जरूर मैंने कोई गुनाह किया होगा।

माना जाता है कि शरीर छोड़ते वक्‍त उनका अल्‍लाह से सीधे ही साक्षात्‍कार हो गया। किंवदंतियों के मुताबिक अबुल हसन ने उनसे गुजारिश की कि मेरे कामों का चिट्ठा फरिश्‍तों को दे दीजिए और मुझे सदा के लिए अपने साथ बातचीत के लिए रख लीजिए।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनका यह लेख लखनऊ से प्रकाशित जनसंदेश टाइम्स अखबार में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

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