त्यौहारों का मौसम है, बाजार सजे हैं, भीड़ है कि थमने का नाम नही ले रही है। व्यापारी हैं कि इसी मौसम में पूरे साल भर का खर्चा वसूलने की तैयारी में हैं, इसलिए इलावटी-मिलावटी पर खासा जोर है। नौकरी पेशा और रोज मेहनत करने वाला परेशान है कि खर्चे पूरे करने हैं। अड़ोस-पड़ोस से मुकाबला जो करना है। त्यौहार आते ही मोहल्ले-पड़ोस में भारत-पाकिस्तान जैसा मुकाबला जो शुरू हो जाता है। अब आमने-सामने डटे हैं तो मुकाबला कैसे छोड़ दें। इस देश की महिमा भी कितनी निराली हैं। अरविन्द अडिगा की व्हाइट टाइगर पढ़ रहा था। हिन्दुओं के 33 करोड़ देवी-देवता और धर्मावलम्बियों के लिए तो मुस्लिम, सिख, ईसाई को मिलाकर और भी बढ़ जाते हैं। अब इतने लोगों की जयन्ती और पुण्यतिथि का भी पता नहीं है। पर त्यौहार हैं कि हर वर्ष अपने समय पर ही आ जाते हैं। अब त्यौहार हैं, तो किसी न किसी के नाम पर तो होंगे ही। साल में महिलाएं दो-दो बार नवरात्रों में नौ-नौ दिन का व्रत रखती हैं, अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिए, पर क्या सबको सब कुछ मिलता हैं।
करवा चौथ का व्रत है, पत्नियां अपने पति की लम्बी उम्र के लिए पूरे दिन भूखी ‘बिना अन्न’ रहती हैं। पहाड़ पर इस व्रत को मनाने की परम्परा नहीं थी, किन्तु जब से पहाड़-मैदान का भाई-चारा हुआ है, पहाड़ी महिलाओं ने मैदानी महिलाओं के सुर में सुर मिलाना शुरू कर दिया हैं। भले ही आज व्रत हो, एक दिन पहले ही मेरी महिला मित्र ने मोबाइल पर मैसेज भेजा कि ‘‘एक बार उल्लू लक्ष्मी जी के पास नाराज होकर गया और बोला कि आपकी तो हर साल दिवाली पर पूजा होती है, पर मेरी नहीं होती, लक्ष्मी जी का वाहन ठहरा उल्लू, नाराज भी नही कर सकती थी। इसलिए बोला कि मेरी पूजा से ठीक 11 दिन पहले पूरे संसार में उल्लू की पूजा होगी। तभी से दिपावली से 11 दिन पहले करवा चौथ मनाने की परम्परा शुरू हो गयी।’’ मैसेज मजाकिया था पर मैंने भी देर न कर इसे फेसबुक-आरकुट-ट्विटर पर पोस्ट कर दिया। नयी बहस छिड़ गयी, हर कोई अपने-अपने अंदाज में जवाब दे रहा था, किन्तु बताने को कोई तैयार नहीं था कि उल्लू कौन है?
जिस महिला मित्र ने मैसेज भेजा, उनका भी आज व्रत है और पूरे विधि-विधान से शाम को चांद देखकर व्रत खोलने की योजना बना रही हैं। अब पति दूर है, तो क्या चांद देखने का कोई टैक्स तो नहीं लगता। कुछ सालों से तो लगता है धर्म का सैलाब सा उमड़ पड़ा है। सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने को आतुर कांवड़ियों के कारण जाम होता राष्ट्रीय राजमार्ग, जुम्मे पर मस्जिदों में बढ़ती भीड़, गुरू पर्व पर लंगर छकने को आतुर सिख्ा और क्रिसमस पर बाजारों में लगते जाम। क्या आपको याद है कि कुछ साल पहले तक मदर-डे और फ्रेण्डशिप-डे पर आप किसी को विश करते थे, पर ग्लोबलाईजेशन के दौर में कोई भी चीज व्यक्तिगत नहीं रह गई। बिल क्लिंटन और हिलेरी की अय्याशी, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की तबाही या गड्ढे में गिरे प्रिंस का बचाव अभियान, सब कुछ पलक झपकते ही दूरी दुनिया के सामने होता है। अब अमिताभ बच्चन कैसे होली खेलते हैं या सिद्धिविनायक तक कितनी देर में पैदल चलकर पहुंचते हैं, जब यह सब सामने होता है तो तिरूपति पर कितना सोना चढ़ा या मुम्बई में गणेश उत्सव पर गणपति लगातार कितने धनवान होते जा रहे हैं।
अब हम हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान वाले हैं तो क्या फर्क पड़ता है कि धर्म के नाम पर आज भी पिछड़ों का शोषण लगातार हो रहा है। आज तक देश के पिछड़ों के लिए लगातार कितनी कल्याणकारी योजनाएं चली हों, पिछड़ों की संख्या लगातार बढ़ी है। जबकि गिनती के लोग देश की सीमाएं लांघ अन्तरराष्ट्रीय धन कुबेरों से होड़ ले रहे हैं। पिछले सालों में कितने धर्मिक चैनल खुले और उनमें कितने धर्माचार्य अपनी दीक्षा से गांठ और पेट दोनों को मुटिया रहे हैं। आप खुद ही देख लीजिए, इसीलिए तो तथाकथित भगवान के अवतार लड़कियों की दलाली में फंसने के बाद भी बेशर्मों जैसे धर्मस्थलों पर अनुयायियों के साथ धर्म का प्रचार करते विचरते हैं। कौन सा धर्म अच्छा, कौन सा बुरा, कौन धर्म गुरू सच्चा और कौन झूठा, यह पता लगाना जनता का काम नहीं, पर व्यवस्था है कि योग से शुरू करके वो दवाईयों व फूड पार्क से अन्तरराष्ट्रीय बाजार पर कब्जा करने का ख्वाब भी देखते हैं। अब मजाक है कि रोके नहीं रूकते एक मित्र ने मैसेज भेजा कि आपको पता है कि शिवजी कम्प्यूटर क्यों नहीं सीख पाए, नहीं पता ना, क्योंकि गणेश जी हमेशा माउस (चूहा) लेकर भाग जाते थे।
लेखक अरुण शर्मा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

