
दिनेश
सन 1948 में नेहरू ने कहा था कि ऐसा सोचना भयावह है कि हम अपने सारे मूल्य खो देंगे और अवसरवादी राजनीति की घृणित दुनिया में गर्क हो जायेंगे। 1949 में नेहरू ने कहा था कि हमारे आर्दर्शों का काफी पतन हो गया है। शायद हमारे पास अब कोई आर्दश बचे ही नही हैं, जो दिखाई दें। 1950 में कांग्रेस में आये पतन को लेकर चिंता इस तरह जाहिर हुई- हमने कुछ खो दिया है, वह भावना ही खो दी है, जो हमें आगे बढ़ाती है, जब तक यह भावना हममें नहीं जागेगी, तब तक हमारा सारा श्रम बेकार जायेगा, उसका कोई लाभ नही होगा। अब बात करते है नेहरू की 1957 में कांग्रेस के सांसदो से की गई अपील की, जिसमें नेहरू ने कहा था कि कांग्रेस में ही नहीं बल्कि भारतीय राजनीति में ही लगातार गिरावट आ रही है। जवाहर लाल नेहरू के बाद पार्टी में नई जान फूंकने, उसे जनता से जोड़ने और भ्रष्ट नेताओं को निकाल कर पार्टी की शुद्धिकरण की कोई गंभीर कोशिश कभी नही हुई। अपनी मौत से पहले नेहरू ने ऐसी एक अंतिम कोशिश की थी, जिसे कामराज प्लान के नाम से जाना जाता है।
आज राहुल गांधी शायद नेहरू के उसी सपने को पूरा करने का ख्वाब देख रहे है और उस पर अमल करने का प्रयास कर रहे हैं। वे कांग्रेस संगठन में नई जान फूंकना चाहते है, जिसके तहत भ्रष्ट और गैर-जिम्मेदार नेताओं और कार्यकर्ताओं को निकाल कर पार्टी की सफाई करना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि नेता और कार्यकर्त्ता जनता की तकलीफ और उनकी समस्याओं को समझे और सरकार की महत्वपूर्ण योजनओं के बारे मे जानकारी देकर उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सचेत करें। राहुल गांधी गैर-कांगेसी राज्यों में कांग्रेस की सरकारों को काबिज करने की जुगत में नजर आ रहे हैं। क्या राहुल गांधी को इस मकसद में कामयाबी मिलेगी या ये सारी कवायद सिर्फ तब तक के लिये कर रहे हैं, जब तक कि सरकार में वे शामिल नहीं हो जाते या फिर देश के प्रधानमंत्री नही बन जाते? क्या राहुल गांधी अपने परनाना के उन्हीं विफल हो गये उद्देश्यों को पूरा करना चाहते है? उपरी तौर पर तो ऐसा ही लगता है, लेकिन जिस ढंग से कांग्रेस को जोड़ने की कवायद की जा रही है, उसे देख कर कहा जा सकता है कि कांग्रेसी राहुल के मिशन को सफल बनाने के बजाय खुद को सफल बनाने की कवायद कर रहे हैं।
अब बात करते हैं कांग्रेस की जन्मस्थली समझे जाने वाले इस इटावा जिले की। इस जिले में जो दुर्दशा कांग्रेस की है वह किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले इटावा जिले में जब से समाजवादियों ने घुसपैठ की तो उसके बाद कभी कांग्रेस पनप ही नहीं सकी। अब हालांकि ‘हाथी’ ने काफी हद तक इटावा में अपनी जड़ें मजबूत कर समाजवाद को कमजोर किया हैं। कांग्रेस के युवराज कहे जाने वाले पार्टी के महासचिव राहुल गांधी ने जब सक्रिय राजनीति में पदार्पण कर प्रदेश में वर्ष 2012 में होने वाले विधान सभा चुनावों को अपने मिशन का ख्वाब दिखाकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकी, तो वह कार्यकर्ता भी सक्रिय भूमिका में आ गए, जो विभिन्न कारणों से निर्जीव हो चुके थे। इतना ही नहीं साल 2008 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के अमीनाबाद मे हुये सामूहिक नरसंहार के बाद युवराज के दौरे ने भी कांग्रेसियों को उत्साहित कर दिया था। उस दौरे में राहुल गांधी ने अपने आप को राहुल गांधी के तौर पर पेश ना करके आम आदमी के तौर पर पेश किया, जिसमें राहुल गांधी का आलू के खेतों में काम कर रहे किसानों से मिलकर और एक बच्चे को अपने कंधे पर बैठाकर घुमाना राहुल गांधी को सुर्खियो मे खड़ा कर गया। परंतु पार्टी के हाल ही में हुए संगठनात्मक चुनावों ने पार्टी की ऐसी तस्वीर बना दी, जिससे युवराज का ख्वाब दरकता हुआ नजर आने लगा है।
खुद कांग्रेसी भी इन चुनावों से खासे व्यथित नजर आने लगे हैं। पार्टी में लोकतंत्र बनाने के उद्देश्य से कांग्रेस के युवराज ने ही नीचे से लेकर उच्च स्तर पर संगठनात्मक चुनाव कराने का फैसला लिया। यह निर्णय कांग्रेस के लिए बेशक प्रदेश में संजीवनी साबित रहा हो, परंतु इटावा में इस चुनाव ने युवराज के सपनों को चकनाचूर कर दिया। पार्टी हाईकमान द्वारा भेजे गए चुनाव अधिकारी मेरठ के अशोक भारती व सतीश शर्मा जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की नब्ज को नहीं भांप सके। पश्चिमी प्रांत से आए इन चुनाव अधिकारियों को पार्टी के कथित मठाधीशों ने इस प्रकार से सब्जबाग दिखा दिए कि उन्होंने धरातल की ओर देखने की जरूरत ही महसूस नहीं की।
संगठन चुनाव के नतीजों पर यदि नजर डाली जाए तो साफ होता है कि पीसीसी में ऐसे प्रतिनिधित्व को कथित तौर चुना गया, जिसे स्थानीय कांग्रेसी पहचानते तक नहीं हैं। बात की जाए तो चकरनगर निवासी सुभाष गुप्ता को ताखा ब्लॉक का प्रतिनिधित्व दे दिया गया। इटावा निवासी सलाउद्दीन अंसारी महेवा के प्रतिनिधि हो गए तो टूंडला के रहने वाले एसीसीसी सदस्य रहे अशोक सिंह चकरनगर का प्रतिनिधित्व करेंगें। भरथना ब्लॉक के अजय यादव को जसवंतनगर का कथित तौर पर प्रतिनिधि चुन लिया गया। ताज्जुब तो यह है कि चुने गए इन प्रतिनिधियों तक को यह अहसास नहीं है कि आखिर उन्हें वोट किसने दिए। कारण साफ है कि चुनाव के नाम पर सिर्फ प्रदर्शन हुआ अथवा चापलूसों को स्थान मिल गया। जबकि दिल की गहराईयों में कांग्रेस को आत्मसात किए कांग्रेसी एक बार फिर उपेक्षित होकर रह गए। हद तो तब हो गई जब चुने गए सत्तर प्रतिनिधियों को जिलाध्यक्ष के लिए मतदान करना था, परंतु ऐसा न होकर सर्वसम्मति से अजय यादव, सूरज सिंह यादव, धर्मराज वर्मा व सुनील वर्मा का जिलाध्यक्ष पद के लिए नाम भेज दिया गया। अब यह भला कांग्रेसी कैसे आत्मसात कर सकते हैं कि कथित लोग उनसे मताधिकार का भी अधिकार छीन लें।
कांग्रेस के जिलाध्यक्ष कीरत सिंह पाल स्वीकारते हैं कि जब प्रतिनिधियों की सूची जारी हुई तो उसमें कुछ भूल हुई है। भूल किसी से भी हो सकती है, परंतु इस संबंध में पार्टी हाईकमान को अवगत करा दिया गया है और वह इस गलती को सुधार लेगा। जब उनसे यह पूछा गया कि बाहरी क्षेत्रों के नेताओं को प्रतिनिधित्व कैसे मिल गया, तो उन्होंने बताया कि इसमें कुछ लोगों ने अपने मूल पते को दर्शा दिया है। अब ऐसे में यह समझा जा सकता है कि इस भूल के परिणाम तो क्या होंगें, बाहरी प्रतिनिधि स्थानीय कार्यकर्ताओं से सामंजस्य भला कैसे बना पाएंगे? इससे साफ है कि यदि कांग्रेस के आला कमान ने जनपद के संगठनात्मक चुनाव में हुई भूल को शीघ्र ही नहीं सुधारा तो यकीनन ही जनपद में तो कांग्रेस निर्जीव की निर्जीव ही बनी रह जाएगी। इटावा तो एक उदाहरण मात्र है यह हाल तो पूरे देश भर का नजर आ रहा है कि कांगेस मे ऐसे-ऐसे लोग अब आ गये है, जो राहुल के मिशन को बट्टा लगा रहे हैं, ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि कांग्रेस को शिखर पर ले जाने की राहुल की योजना, वाकई कामयाब हो पायेगी, इसमें संदेह नजर आ रहा है।
लेखक दिनेश शाक्य इटावा में टीवी पत्रकार हैं.

