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दस जनपथ को खटकने लगे हैं मनमोहन सिंह!

: नियामगिरी के एक तीर से कई शिकार किए राहुल ने : एक अजीब सी घटना है। जिस दिन राहुल गांधी अपने आप को उड़ीसा में आदिवासियों के सिपाही घोषित करते है, उसके अगले दिन ही एक खबर छपती है। खबर लीड है, जिसमें कहा गया है कि भारत युवाओं का देश है, पर प्रधानमंत्री बुजुर्ग हैं। साथ ही दुनिया के कई देशों का उदाहरण दिया गया है, जहां युवा लोग प्रधानमंत्री के तौर पर विराजमान है। इसे सामान्य घटना कहेंगे या एक संयोग या एक राजनीतिक खेल। जो युवराज अभी तक कॉरपोरेट हैं, वही एकाएक आदिवासियों के सिपाही हो जाते है। उस मांग को मनवा लेते हैं जिसके लिए अरूंधति राय ने मोर्चा संभाला और नक्सलियों ने नाको दम कर दिया। क्या यह खेल इतना सामान्य है, जितना दिख रहा है। सवाल कई हैं, जिसका जवाब ढूंढा जा सकता है। इस अदा से एक तीर से कई शिकार हुए हैं। इसके शिकार मनमोहन सिंह भी हुए, पी चिंदबरम भी हुए। नक्सलियों का दबाव भी है। महंगाई के बाद राजस्थान में हुई हार भी एक कारण है। यानी की खेल उतना सीधा नहीं, जितना दिख रहा है।

: नियामगिरी के एक तीर से कई शिकार किए राहुल ने : एक अजीब सी घटना है। जिस दिन राहुल गांधी अपने आप को उड़ीसा में आदिवासियों के सिपाही घोषित करते है, उसके अगले दिन ही एक खबर छपती है। खबर लीड है, जिसमें कहा गया है कि भारत युवाओं का देश है, पर प्रधानमंत्री बुजुर्ग हैं। साथ ही दुनिया के कई देशों का उदाहरण दिया गया है, जहां युवा लोग प्रधानमंत्री के तौर पर विराजमान है। इसे सामान्य घटना कहेंगे या एक संयोग या एक राजनीतिक खेल। जो युवराज अभी तक कॉरपोरेट हैं, वही एकाएक आदिवासियों के सिपाही हो जाते है। उस मांग को मनवा लेते हैं जिसके लिए अरूंधति राय ने मोर्चा संभाला और नक्सलियों ने नाको दम कर दिया। क्या यह खेल इतना सामान्य है, जितना दिख रहा है। सवाल कई हैं, जिसका जवाब ढूंढा जा सकता है। इस अदा से एक तीर से कई शिकार हुए हैं। इसके शिकार मनमोहन सिंह भी हुए, पी चिंदबरम भी हुए। नक्सलियों का दबाव भी है। महंगाई के बाद राजस्थान में हुई हार भी एक कारण है। यानी की खेल उतना सीधा नहीं, जितना दिख रहा है।

सारा कुछ एकाएक कुछ दिनों में ही होता है। सक्सेना कमेटी की रिपोर्ट आती है। जयराम रमेश अड़ते है। और वेदातां का बाक्साइट खनन संबंधी आवेदन को रद्द कर दिया जाता है। यह वही नियामगिरि हिल्स है, जहां पर बाक्साइट खनन को लेकर अरूंधति राय ने मुद्दा बनाया। कहा था कि इससे जहां पर्यावरण को नुकसान होगा, डूंगरिया-कोंध जैसी जनजातियां समाप्त हो जाएगी। अरूंधति राय की इस राय को भारतीय अखबारों ने प्रमुखता से नहीं छापा था। लेकिन जब यही बात राहुल गांधी ने की तो मीडिया ने जोरदार कुलांचे मारी। सारा श्रेय राहुल गांधी को दिया गया, वेदांता प्रोजेक्ट को रद्द करने को लेकर। लेकिन इसके बाद ही सवाल उठने खड़े हो गए। क्योंकि वेदांता भी उसी कॉरपोरेट राजनीति का एक हिस्सा है, जिस पर केंद्र की कांग्रेस सरकार चल रही है। अगर मुकेश अंबानी की नजदीकियां मुरली देवड़ा समेत कई और मंत्रियों से है तो वेदांता भी गृह मंत्री पी चिंदबरम की नजदीकी है।

यह एक अलग आंकड़ों भरा सवाल होगा कि वेदांता ने नियामगिरि को कितने में खरीदा और कितने में आगे इसे बेचना था। इस लूट में कितना वेदांता को बचना था यह भी आंकड़ों से भरा सवाल है। लेकिन यह सच्चाई भी है कि वेदांता प्रोजेक्ट को रदद हो जाने से स्थानीय आदिवासियों को राहत मिली है। पर दिलचस्प बात है कि देश के दूसरे राज्यों में जो अवैद्य खनन हो रहा है, उस पर कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी चुप है। इसलिए आदिवासियों के सिपाही होने का तमगा देना काफी जल्दी होगा। यह काफी कुछ वही राजनीतिक खेल या चाल है, जो अक्सर इस देश के राजनेता लालीपाप देकर करते हैं। राहुल गांधी अभी तक छतीसगढ़ के गोंड आदिवासियों के सिपाही दिल्ली मे नहीं बने है। वहीं आंध्र प्रदेश में हो रहे अवैध खनन को लेकर राहुल गांधी चुप है। कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं की दादागिरी के आगे भी युवराज की चुप्पी चर्चा योग्य है।

इस चुप्पी को कांग्रेस या भाजपा के बीच लूट के हिस्से के लिए एक मौन समझौता कहेंगे या कुछ और। क्योंकि रेड्डी बंधुओं के विरोध में स्थानीय कांग्रेसियों ने आंदोलन तो चलाया, पर वह दिखावा मात्र था। इसमें दिल्ली से कोई सहयोग नहीं मिला। क्या इस चुप्पी को दिल्ली में कई मसलों पर कांग्रेस को भाजपा से मिलने वाले समर्थन के एवज में देखा जाए। क्योंकि सुषमा स्वराज, एलके अडवाणी जैसे नेता कई मसलों पर कांग्रेस को पूरा सहयोग दे रहे है, इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है। ताजा मसला परमाणु करार को लेकर है। खैर, कई ताजा सहयोग के पीछे का खेल दोनों दलों की आतंरिक स्थिति की वजह से भी है। सीबीआई नरेंद्र मोदी पर हमला बोल रही है, बेशक यह सारा कुछ कांग्रेस के इशारे पर हो रहा है। पर यह भी सच्चाई है कि नरेंद्र मोदी के बढ़ते कद से एलके आडवाणी, उनके शिष्य अरूण जेटली और सुषमा स्वराज भी परेशान है।

पी चिदंबरम जैसे नेताओं को हाशिए पर लाने की तैयारी हो चुकी है। यह किसके इशारे पर हो रहा है, कांग्रेसी ज्यादा समझते है। पहले नक्सली आंदोलन को निपटने के तौर तरीकों को लेकर पी चिंदबरम की औकात मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने बतायी थी। उसके बाद चिंदबरम के खास कॉरपोरेट वेदांता के खनन प्रोजेक्ट को रद्द कर उनकी औकात बतायी गई है। इसके बाद सैफर्न टेरर को लेकर जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह ने फिर बयान देकर चिंदबरम की बोलती बंद कर दी है। कुल मिलाकर कांग्रेस के अंदर चल रहे संघर्ष को आप इन बयानों के अंदर देख सकते है। बताया जाता है कि कुछ कॉरपोरेट हाउस ने ही चिंदबरम को गृह मंत्री बनाने में अहम भूमिका अदा की थी, जिन्होंने चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते खासा फायदा उठाया। उन्हें लगता था कि चिदंबरम के पास जादू की छड़ी है, वो सारी समस्या का हल कर देंगे। लेकिन कुछ नहीं हुआ। नक्सलियों ने हर जगह चिंदबरम को मात दी है।

वेदांता के खेल की विवेचना करें तो पता चलेगा कांग्रेस में कई तरह के खेल शुरू हो चुके है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बढ़ते कद को कम करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। राहुल गांधी को अब देश का सबसे बड़ा नेता बताने की मुहिम चल गई है। पहले राहुल गांधी उतर प्रदेश में अलीगढ़ के पास आंदोलनरत किसानों के रहनुमा के तौर पर पेश होते है, फिर नियामगिरि के आदिवासियों के सिपाही बताए जाते है। इसके बाद एक कांग्रेसी खेमा मनमोहन सिंह को अखबारों मे काफी बुजुर्ग बताने की कवायद में शामिल हो गया है। मनमोहन सिंह की उम्र की तुलना ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के उम्र से की जाती है। इसे भी एक संयोग माने की राहुल गांधी और कैमरून की उम्र लगभग बराबर है। युवाओं के देश में बुजुर्ग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, इसका पूरा प्रचार शुरू किया जा चुका है। एक और सच्चाई है। मनमोहन सिंह लंबे समय तक राज करने वाले तीसरे प्रधानमंत्री बन गए हैं। यानी कि वे राजकाज के मामले में राजीव गांधी से आगे निकल गए हैं। क्या इसे दस जनपथ बर्दास्‍त करेगा। मनमोहन सिंह से आगे सिर्फ जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी है।

आंतरिक रुप से कांग्रेस कहीं न कहीं नक्सलियों के बढ़ते विस्तार से भयभीत है। कांग्रेस को यह भी पता है कि जहां पर नक्सलियों का प्रभाव बढ़ा है वहां पर उनके सहयोग के बिना कोई भी राजनीतिक दल चुनाव नहीं जीत सकता है। कांग्रेस को यह भी पता है कि बड़े पैमाने पर नेता, कॉरपोरेट और नौकरशाही नक्सल प्रभावित राज्यों में नक्सलियों को पैसे का भुगतान कर रहे है। कांग्रेस को यह भी पता है कि नक्सलियों ने शुरू से वेदांता के नियामगिरि हिल्स प्रोजेक्ट को रद्द करने के लिए संघर्ष छेड़ रखा था। यह भी सच्चाई है कि नक्सिलयों का सबसे ज्यादा विस्तार 2004 के बाद हुआ, जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सत्ता आयी। मनमोहन सिंह की कॉरपोरेट लूट नीति ने नक्सलियों के प्रभाव को बढ़ाया। लेकिन यह खेल कांग्रेस के युवराज समर्थक नेताओं को काफी देर के बाद समझ में आयी है।

नियामगिरि प्रोजेक्ट के रद्द होने के बाद नक्सलियों का मनोबल और बढ़ेगा। क्योंकि पहले ही वे पश्चिम बंगाल में खुलकर कई प्रोजेक्टों का विरोध कर रहे हैं और उसमें ममता बनर्जी का अपरोक्ष सहयोग उन्हें मिलता है। यहां तक कि नंदीग्राम में भी सलेम कंपनी के जमीन अधिग्रहण के विरोध में शामिल जनता में ज्यादातर नक्सली थे। कांग्रेस का एक वर्ग अभी भी संभलने की नसीहत दे रहा है। क्योंकि 2014 तक चुनाव होने है। उस समय तक देश में स्थिति और भयावह होगी। मनमोहन सिंह की नीतियों का कारण नक्सली कई और राज्यों में फैल चुके होंगे। जबकि बढ़ती महंगाई शहरी मध्यवर्ग को कांग्रेस का खिलाफ करेगा। खुद ग्रामीण विकास मंत्री सीपी जोशी ने राजस्थान के स्थानीय निकायों के चुनाव में हार का कारण महंगाई बताया है।

आदिवासियों के अधिकारों को छीनने का मामला सिर्फ उड़ीसा में नहीं है। वन कानूनों का उल्लंघन सिर्फ उड़ीसा में नहीं हो रहा है। उड़ीसा के जगतसिंहपुर में पास्को के प्रस्तावित प्लांट के विरोध हो रहा है। कालाहांडी में वेदातां के प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा था। लेकिन झारखंड और छतीसगढ़ में भी कई कंपनियों ने आदिवासियों के अधिकारों को छीना है। यहां पर वन कानूनों का उल्लंघन हुआ है और अवैध तरीकों से सरकारी भूमि और आदिवासियों की भूमि पर कब्जा किया गया है। इस समय छतीसगढ़ में जिंदल ग्रुप के प्रस्तावित प्रोजेक्टों का विरोध हो रहा है। टाटा और एस्सार के प्रस्तावित प्रोजेक्ट का विरोध आदिवासी कर कर रहे है।

खुद अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी का कहना है कि बैलाडीला में खनन से स्थानीय लोगों को प्रदूषित पानी पीने को मिल रहा है और तमाम बीमारियां स्थानीय लोगों को हो रही है। डूंगरिया-कोंध के तरह ही छतीसगढ़ के गोंडों का भी हाल बुरा है। यही कुछ हाल झारखंड में भी है। कुछ कंपनियां इन इलाकों में जोरदार तरीके से संसाधन लूट में लगी हुई है। देश के कई बड़े नेताओं ने इस लूट में सहयोग देना शुरू कर दिया है और वे पार्टी के लाइन से ऊपर है। उन्होंने लूट वाली कंपनियों में अपना हिस्सा भी डाल दिया है। इसलिए राहुल गांधी सिर्फ यही नहीं बोले कि वे दिल्ली में आदिवासियों के सिपाही है। पूरे देश में वन कानूनों के उल्लंघन और आदिवासियों के अधिकारों के हनन का जो षड़यंत्र हो रहा है उसे तुरंत रोकने के लिए कदम उठाए।

नक्सल आंदोलन से केंद्र की सरकार डरी हुई है। हथियार के बल पर नक्सलियों को निपटने की सरकारी योजना फेल हो गई है। सरकार के कई मंत्री नक्सलियों से तालमेल बनाए हुए है। नक्सलियों को संदेश दिया जा रहा है कि सरकार साफ्ट है, बातचीत को तैयार है। नक्सलियों का मनोबल देश के कई राज्यों में बढ़ गया है और वे कई राज्यों में अपने आधार को बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार ने लालगढ़ के आग को देखा है। इससे पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार का किला ढहने लगा है। लालगढ़ की चिंगारी भी जिंदल ग्रुप के प्रस्तावित स्टील प्लांट से ही लगी थी। यहां पऱ भी भूमि अधिग्रहण के तौर तरीकों को लेकर आदिवासियों का विरोध था। लेकिन इस मसले पर कांग्रेस और आदिवासियों के सिपाही राहुल गांधी चुप थे। क्योंकि जिस समय जिंदल ग्रुप के स्टील प्लांट के शिलान्यास तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्वदेव भटाचार्य कर रहे थे, उस समय कांग्रेस आदिवासियों और नक्सलियों के तमाम विरोध के बावजूद चुप थी। उस चुप्पी का कारण क्या था। कारण साफ था मनमोहन की पिछली अल्पमत सरकार वामपंथियों के सहयोग से दिल्ली में चल रही थी, वहीं जिंदल ग्रुप का कनेक्शन कहीं न कहीं कांग्रेस से था।

नक्सलियों के प्रति कांग्रेस की नरमी का उदाहरण देखने लायक है। पिछले दिनों ममता बनर्जी ने लालगढ़ में रैली की। लालगढ़ की रैली में खुलेआम नक्सली आए और उन्होंने ममता बनर्जी को समर्थन किया। और तो और आंध्र प्रदेश पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मारे गए आजाद की मौत को मर्डर तक करार दिया। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। इसके बावजूद कांग्रेस की हिम्मत नहीं हुई कि ममता बनर्जी को कुछ कहा जाए। ममता बनर्जी अपने स्टैंड पर कायम है। लेकिन हद तो तब हो गई जब कैबिनेट के सबसे वरिष्ठ सदस्य और कई जगहों पर मनमोहन सिंह से भी मजबूत वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने आजाद के मसले पर ममता बनर्जी को क्लीन चिट दी। उन्होंने कहा कि ममता आजाद को लेकर ब्यान देने के लिए स्वतंत्र है और उनके बयान में वे कोई बुराई नहीं देखते है।

इन बयानों को देखकर यह लगता है कि या तो सरकार नक्सलियों को लेकर विचलन की स्थिति में है। कोई ठोस उपाय सरकार को नजर नहीं आता। या सरकार के हर घटक दल इस माहौल का फायदा उठा रहे है। लेकिन इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा फायदा नक्सलियों को हुआ है। वे अब लोकतांत्रिक नुमाइंदों को भी अपने पक्ष में लेने में कामयाब होते नजर आ रहे है। अभी तक चुने हुए विधायक और सांसद नक्सल प्रभावित एरिया में छुपकर नक्सलियों से मिलते थे, उन्हें पैसे देते थे और अपनी जान बचाते थे। चुनावों में समर्थन को लेकर उनसे विनती-चिरौरी करते थे। लेकिन अब तो राजनीतिक दल खुलकर उनसे समर्थन लेने को तैयार है। इसका ताजा उदाहरण ममता बनर्जी हैं। वे खुद माओवादियों का पक्ष सरकार में रख रही है। हालांकि ममता बनर्जी अकेली नहीं है, कुछ राज्य सरकार भी इसमे शामिल है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शीबू सोरेन तो नक्सलियों से इतने डरते है कि शुरू में उन्होंने नक्सिलयों के खिलाफ पुलिस अभियान चलाने से ही इनकार कर दिया था। और तो और सुशासन के बाबू नीतीश कुमार भी नक्सलियों से आंतरिक समझौता कर बिहार को चला रहे हैं।

आखिर पिछले पांच सालों में यह स्थिति क्यों आयी। उसका कारण साफ है, सामंती जुल्म को सहने वाले इस देश के गरीब-दलित जनजाति कॉरपोरेट जुल्म का शिकार होने लगी। देश में आठ प्रतिशत विकास दर का चमत्कार दिखा, कॉरपोरेटरों को देश का संसाधन लूटने की खुली छूट दी गई। इसमें कोई शक नहीं कि एनडीए के समय में इस लूट की शुरूआत हुई और मनमोहन सिंह के समय में खुलकर लूटने की आजादी मिल गई। इस लूट से एक तरफ कॉरपोरेट अमीर हुए. उसका कुछ हिस्सा पाकर देश के नेता अमीर हो गए, दूसरी तरफ देश का चालीस प्रतिशत हिस्सा नक्सली हिंसा के चपेट में आ गया। यह तय है कि अब कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत में लाने के लिए नक्सलियों के सहयोग की जरूरत होगी। अगर नक्सली सहयोग देंगे तो कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत केंद्र में मिलेगा। अगर नहीं सहयोग देंगे तो कांग्रेस की सरकार बहुमत में नहीं बन पाएगी। जिस कांग्रेस को आज इतना मजबूत बताया जा रहा है, वही कांग्रेस इस देश में चार सौ से ज्यादा सीटों को लेकर काबिज रही है। वर्तमान मनमोहन सिंह सरकार से ज्यादा मजबूत नरसिम्हा राव की सरकार थी। इसलिए कहीं यह सब्जबागी ताश के पत्‍ते का ढेर भरभरा कर न गिर जाए।

लेखक संजीव पांडेय पत्रकार हैं.

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