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दिल्ली की जनता के लिए केजरीवाल जैसा सीएम पालना मुश्किल होता जा रहा है

अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं । इसके साथ साथ वे आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं । राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं । इन आरोपों के दो वर्ग हैं । पहले वर्ग में वे आरोप आते हैं जो किसी भी राजनैतिक दल की नीतियों और उसकी विचारधारा को लेकर लगते हों । मसलन भारतीय जनता पार्टी कहती है कि सोनिया गान्धी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा हैं और उनकी पार्टी की सरकार जो नीतियाँ लागू कर रही हैं उससे देश रसातल में चला जाएगा । इस प्रकार के आरोपों का फ़ैसला देश की जनता चुनावों में कर देती है । लेकिन आरोपों का दूसरा वर्ग व्यक्तिगत आरोपों की श्रेणी में आता है।

अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं । इसके साथ साथ वे आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष भी हैं । राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते हैं । इन आरोपों के दो वर्ग हैं । पहले वर्ग में वे आरोप आते हैं जो किसी भी राजनैतिक दल की नीतियों और उसकी विचारधारा को लेकर लगते हों । मसलन भारतीय जनता पार्टी कहती है कि सोनिया गान्धी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्षा हैं और उनकी पार्टी की सरकार जो नीतियाँ लागू कर रही हैं उससे देश रसातल में चला जाएगा । इस प्रकार के आरोपों का फ़ैसला देश की जनता चुनावों में कर देती है । लेकिन आरोपों का दूसरा वर्ग व्यक्तिगत आरोपों की श्रेणी में आता है।

जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर उसकी ईमानदारी को लेकर आरोप लगाता है , या फिर वह कहता है कि अमुक व्यक्ति ने अमुक प्रकल्प में इतने लाख का घोटाला कर लिया है , तो ये व्यक्तिगत आरोप होते हैं । राजनैतिक दलों के व्यक्ति इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप भी एक दूसरे पर लगाते रहते हैं । लेकिन सामान्य नैतिकता का तक़ाज़ा है कि इस प्रकार के आरोप लगाने से पहले इस बात की जाँच कर लेनी चाहिए कि आरोप सही हों और उसके पुख़्ता सबूत उपलब्ध हों । अरविन्द केजरीवाल का स्वभाव है कि वे सभी पर इस प्रकार के व्यक्तिगत आरोप लगाते रहते हैं । कुछ लोग चुपचाप उनकी गालियाँ सुन लेते हैं लेकिन जो ज़्यादा संवेदनशील होते हैं वे इस अपमान को सह नहीं पाते । केन्द्रीय मंत्री अरुण जेतली के साथ भी यही हुआ । केजरीवाल ने उन पर दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के मामलों में आर्थिक भ्रष्टाचार का आरोप लगाया । जेतली ने इन आरोपों को नकारा । उन्होंने कहा कि इन झूठे आरोपों की बजह से उनकी साख और छवि को धक्का लगा है । उनके सम्मान को ठेस पहुँची है । अपने इस अपमान के हर्ज़ाने के रूप में उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में केजरीवाल पर दिसम्बर 2015 में दस करोड़ का मानहानि का दावा ठोंक दिया ।

स्वभाविक है कि केजरीवाल अपने बचाव में कोई वक़ील खड़ा करते । जिस प्रकार केजरीवाल की बिना प्रमाण के आरोप लगाने की आदत है , उसी प्रकार राम जेठामलानी को भी विवादों से जुड़े मुक़द्दमे लड़ने की आदत है । इन्दिरा गान्धी हत्याकांड से जुड़ा मुक़द्दमा भी राम जेठामलानी के कारण अभी तक याद किया जाता है । जेठामलानी द्वारा लड़े गए इस प्रकार के मुक़द्दमों की फ़ेहरिस्त लम्बी है। ज़ाहिर है जेठमलानी से अच्छा वक़ील केजरीवाल को भला और कहाँ से मिल सकता था ? इस प्रकार जेठामलानी केजरीवाल के भी वक़ील हो गए ।

जेठमलानी ने कचहरी में जेतली से लम्बी बहस की । लेकिन उनका ज़्यादा ज़ोर यह जानने में लगा रहा कि जेतली अपनी इज़्ज़त की क़ीमत किस आधार पर आंक रहे हैं । वैसे यदि अरविन्द केजरीवाल के ख़िलाफ़ उस तथाकथित घोटाले का कोई सबूत होता तो शायद उन्हें न तो इतनी लम्बी क़वायद करनी पड़ती और न ही जेठामलानी जैसा वक़ील करना पडता । लेकिन अब केजरीवाल के पास और कोई रास्ता बचा ही नहीं था । अब तो उन्हेँ किसी तरह से यह सिद्ध करना था कि अब्बल तो इन आरोपों से केजरीवाल का अपमान हुआ ही नहीं , यदि हुआ भी है तो उसकी क़ीमत दस करोड़ तो नहीं हो सकती । इस मोड़ पर अनेक राजनीतिज्ञों को जेठामलानी की जरुरत पड़ती है ।

लेकिन इस रुचिकर मुक़द्दमे का एक दूसरा पहलू भी है । जैसे जैसे केस आगे बढ़ता जा रहा है , वैसे वैसे राम जेठामलानी की फ़ीस का बिल बढ़ता जा रहा है ।  अब तक वह तीन करोड़ बयालीस लाख रुपए हो गया है । परन्तु अरविन्द केजरीवाल ने अभी तक उसकी अदायगी नहीं की । यदि साथ साथ अदायगी करते रहते तो शायद यह मामला तूल न पकड़ता । क्योंकि फ़ीस का मामला वक़ील और मुवक्किल का आपसी मामला है । इसमें किसी तीसरे की कोई रुचि नहीं होती । जब कोई व्यक्ति वक़ील करता है तो उसकी फ़ीस को ध्यान में रख कर ही करता होगा । फिर आख़िर केजरीवाल ने राम जेठामलानी को उनकी फ़ीस समय रहते क्यों अदा नहीं की ?

इसी में सारा रहस्य छिपा हुआ है । केजरीवाल चाहते थे कि उनके मुक़द्दमे की यह फ़ीस दिल्ली सरकार अदा करे । तर्क बिल्कुल सीधा है, जिसे केजरीवाल के मित्र मनीष सिसोदिया पूरा ज़ोर लगा कर सभी को समझा रहे हैं । उनका कहना है कि अरविन्द केजरीवाल क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री बन चुके हैं , इसलिए उन पर जो भी मुक़द्दमा बगैरह दर्ज होगा  और उस मुक़द्दमे को लड़ने में उनका जितना ख़र्चा आएगा , वह सारा दिल्ली सरकार को ही करना होगा । पंजाबी में कहा जाए तो पंगा केजरीवाल लें और भुगते दिल्ली की सरकार । सिसोदिया ने तो दिल्ली सरकार के बाबुओं को हुक्म जारी कर दिया था कि राम जेठामलानी को सरकारी ख़ज़ाने से तीन करोड़ बयालीस लाख की राशि दे दी जाए । लेकिन बाबू लोग थोड़ा चौकन्ने थे । उनका कहना था कि सरकारी ख़ज़ाने से अदायगी सरकारी मुक़द्दमों के लिए की जा सकती है , केजरीवाल के व्यक्तिगत घरेलू मामलों में हो रहे ख़र्च का भुगतान भला सरकार कैसे कर सकती है ? अत दिल्ली सरकार का विधि विभाग इसलमामले में लेफ्टीनेंट गवर्नर से अनुमति लेने पर बजिद है।

उधर मनीष अडे हुए हैं कि अरविन्द केजरीवाल का सारा ख़र्चा अब सरकार को ही उठाना पड़ेगा। मामला केवल केजरीवाल का ही नहीं है। दस करोड़ की मानहानि का मुक़द्दमा केजरीवाल, आशुतोष, राघव चड्डा, संजय सिंह, कुमार विश्वास और दीपक वाजपेयी पर संयुक्त रुप से है। यदि मनीष सिसोदिया के इस तर्क को मान भी लिया जाए कि केजरीवाल के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद उनका सारा भार उठाना दिल्ली की जनता की क़ानूनी ज़िम्मेदारी बन जाती है तो भी उनके साथ की यह जो फ़ौज इस मुक़द्दमे में फँसीं हुई है, इसका ख़र्च भला दिल्ली सरकार कैसे उठा सकती है? इनका तो दिल्ली सरकार से कुछ लेना देना नहीं है। जेठमलानी की फ़ीस के बिल में एक और फ़ंडा है। मुक़द्दमा 2016 में शुरू हुआ था। एक साल में ही जेठमलानी का बिल पौने चार करोड़ तक पहुँच गया है। मुक़द्दमे के अंत तक हो सकता है बिल, अरुण जेटली द्वारा माँगे गए दस करोड़ के हर्ज़ाने से भी ज़्यादा हो जाए। दिल्ली की जनता के लिए अरविन्द केजरीवाल जैसा मुख्यमंत्री पालना मुश्किल होता जा रहा है।

मामले को तूल पकड़ता देख कर राम जेठामलानी को ख़ुद मैदान में उतरना पडा । उन्होंने कहा यदि अरविन्द केजरीवाल या दिल्ली सरकार उनकी फ़ीस का भुगतान नहीं कर पाती तो भी वे केजरीवाल का मुक़द्दमा छोड़ेंगे नहीं । वे इसे हर हालत में लड़ेंगे । वे अपने गरीब मुवक्किलों के मुक़द्दमे मुफ़्त में ही लड़ते हैं । वे केजरीवाल के मुक़द्दमे को भी इसी वर्ग का मान कर मुफ़्त केस लड़ेंगे । जेठामलानी तो जाने माने वक़ील हैं । क़ानून की रग रग से वाक़िफ़ हैं । वे इतना तो जानते ही होंगे कि केजरीवाल का जो मुक़द्दमा वे लड़ रहे हैं, वह व्यक्तिगत मुक़द्दमे की श्रेणी में आता है या सरकारी श्रेणी में ? मुक़द्दमा दिल्ली के मुख्यमंत्री पर नहीं है बल्कि अरविन्द केजरीवाल पर है ।  उसका भुगतान सरकार को करना चाहिए या केजरीवाल को अपनी जेब से करना चाहिए । यदि वे इस पर भी रोशनी डाल देते तो शायद इससे उनके इस ग़रीब मुवक्किल की आँखें भी चौंधिया जातीं और आम जनता को भी ज्ञान हो जाता कि जेठामलानी सरकारी ख़ज़ाने को लुटने से बचा गए ।

यदि उनकी नज़र में केजरीवाल ग़रीब मुवक्किल की श्रेणी में आते हैं तो उन्होंने उसे लगभग चार करोड़ रुपए का बिल भेजा ही क्यों था ? जेठामलानी की नज़र में मुक़द्दमा लेते समय तो केजरीवाल अमीर थे और फ़ीस देते समय अचानक ग़रीब हो गए हैं । इसलिए अब वे उनका मुक़द्दमा मुफ़्त लड़ेंगे । जेठामलानी की पारखी नज़र को मानना पड़ेगा । सारे देश में उन्होंने मुफ़्त मुक़द्दमा लड़ने के लिए मुवक्किल भी ढूँढा तो वह अरविन्द केजरीवाल मिला । यानि जो पौने चार करोड़ वक़ील को न अदा कर सके वह बीपीएल की श्रेणी में आता है । बिलो पावर्टी लाईन । ग़रीबी रेखा के नीचे । वैसे हिन्दुस्तान के बाक़ी लोग भी जेठामलानी की ग़रीब की इस परिभाषा को सुन कर सोचते होंगे कि वे भी केजरीवाल जैसे ग़रीब होते तो कितना अच्छा होता ।

Kuldip Agnihotri
[email protected]

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