: मेरी विदेश डायरी : उगांडा ने पहली बार ऐसी आतंकवादी कार्रवाई देखी है। फुटबाल मैच का फाइनल देखने के लिए जो जोश और उत्साह था, उसे सोमालिया के अल शबाब के आतंकियों ने एक के बाद लगातार किए 3 बम विस्फोटों ने धोकर रख दिया। इसके साथ उसने दूसरे आतंकी संगठनों की तरह ही बेशर्म कायरों की तरह ही इसकी जिम्मेवारी भी ली और आगे भी ऐसे हमलों के लिए चेतावनी दे डाली है। अब इस पूरे मामले की जांच के लिए यहां अमरीकी खुफिया एजेंसी, एफबीआई, अपने काम में लग गए हैं और उगांडा सरकार ने दावा किया है कि वह सोमालिया के ऐसे तमाम तत्वों को कुचल कर रख देगी। यहां के लोग बताते हैं कि अफ्रीकी देशों में, ईदी अमीन के जमाने को छोड़ दें तो, उगांडा अबतक सबसे शांतिप्रिय देश रहा है।
मैं जब भारत से चला था, तब भी यहां के बारे में मुझे यही बताया गया था। अब कहा जा रहा है कि कभी कभार यहां जातीय दंगे भी होते हैं, खासतौर से चुनाव के दिनों में, तो काले लोगों के लिए सबसे पहले निशाने पर भारतीय होते हैं। असल में उगांडा की अर्थव्यवस्था पर भारतीयों का ही दबाव है। वे यहां की कुल आय का 60 फीसदी हिस्सा रखने का दावा भी करते हैं। काले लोगों को लगता है कि भारतीय उनका शोपण करते हैं, इसीलिए वे ही दंगों में पहला निशाना बनाए जाते हैं। उगांडा में भयानक गरीबी है। भूमध्य रेखा पर होने के बावजूद यहां का मौसम बेहद सुहावना रहता है। सालोंभर न दिल्ली की भयानक गर्मी, न कड़कड़ाती ढंड। दिन में अगर धूप तेज भी हई तो शाम सुहानी हो ही जाती है। और दो तीन में एकबार बारिश होना भी तय है। राजधानी कंपाला तो पूरी तरह पहाड़ों पर ही बसी है। सड़कें कुछ हद तक भारत के घाटी वाले क्षेत्रों की तरह। उपर से नीचे आने में गजब का रोमांच होता है।
कंपाला में आसपास के गावों से लोग रोज आते हैं और शाम को वापस हो जाते हैं। वे पैसे जमा नहीं करते। जो कमाते हैं, उसे सप्ताह के अंत में क्लबों में नाचकर और हल्की शराब में उड़ा देते हैं। सोमवार से फिर पैसे के लिए काम पर लग जाते हैं। यही कारण है कि यहां माइक्रोफाइनैंस कंपनियां सक्रिय हैं। वे लोगों को जमकर लोन देती हैं और 10 से लेकर 15 फीसदी ब्याज, वह भी प्रतिमाह, पर वापस ले लेती हैं। ज्यादातर माइक्रोफाइनैंस कंपनियां छोटी अवधि के लिए लोन देती हैं और जमकर कमाई करती हैं। और ऐसी कमाई करने वाली कंपनियों के ज्यादातर मालिक भारतीय हैं। यही कारण है कि जब उगांडा में दंगे होते हैं, जिसे भारत की ही तरह, कंपाला और दूसरे शहरों के गुंडे और असामाजिक तत्व ही करते हैं, तो स्थानीय काले लोगों का उनको मूक समर्थन भी मिल जाता है।
मैं जब कंपाला के एनटेबी हवाई अड्डे पर उतरा था तो मेरे मन में इस देश को लेकर थोड़ी बेचैनी जरुर थी। पर इन 15 दिनों में मैने यह भी महसूस किया है कि इन चमकीले काले लोगों के पास एक बड़ा मानवीय दिल भी है। अनेक गोरे लोगों के पास से जब मानवीय रिश्ते खत्म हो रहे हैं, तब काले लोगों में गजब का सामाजिक सरोकार है। यहां अपने बच्चों के अलावा अपने भाई के बच्चों की भी जिम्मेवारी उठाने के लिए लोग बड़े ब्याज पर भी लोन लेने को तैयार रहते हैं। गरीबी के कारण यहां की लड़कियां एक के अलावा भी विवाह करने से बिल्कुल परहेज नहीं करतीं। एक अजीब तरह का सामाजिक बंधन है, जिन्हें हम भारत जैसे मानवीय देश में भी अब भूलने लगे हैं।
मैं बार बार एक और बात जानने को बेचैन था कि यहां के लोगों के सिर पर बाल होते तो वे देखने में सुंदर भी लग सकते थे, फिर वे गंजे क्यों रहते हैं ! यहां तक कि लड़कियां और महिलाएं भी गंजी या बेहद कम बाल वाली होती हैं। बाद में पता चला कि इनके सिर पर बाल उगते ही नहीं, जबकि यहां की मिट्टी ऐसी है कि सारी सब्जियां अच्छी और ताजा होती हैं, विटामिनों भरपूर। दिल्ली की सब्जी में भले ही स्वाद न लगे, यहां है।
लेखक अंचल सिन्हा बैंक के अधिकारी रहे, पत्रकार रहे, इन दिनों उगांडा में बैंकिंग से जुड़े कामकाज के सिलसिले में डेरा डाले हुए हैं. अंचल सिन्हा भड़ास4मीडिया पर अपनी विदेश डायरी के जरिए समय-समय पर उपस्थित होते रहेंगे.

