अन्ना ने नयी बहस छेड़ दी है। भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना को लेकर अन्ना के साथ देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग फिर से गांधी को याद कर रहे हैं। फेस बुक और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोग उलझ रहे हैं। अन्ना का साथ फैशन स्टेटमेंट है, इसीलिए बंद कमरों में तेज एसी के बीच चिंतन मनन करने वाले बुद्धिजीवी बिसलरी की बोतल लिए जंतर मंतर पर कड़ी धूप में आ पहुंचे हैं। एक अंग्रेजी न्यूज चैनल ने जंतर मंतर को भारत का तहरीर स्कावयर बताया है। लग रहा है कि बस अब सब कुछ बदलने वाला है। देश, हम और आप भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएंगे। वाकई अच्छा लग रहा है।
इन सुर्खियों की भीड़ में एक खबर दब गयी है। खबर है झारखंड से। एक निजी कंपनी का अधिकारी मनोज ओझा बिजली परियोजना के लिए जगह देखने गया। 15 से 19 वर्ष के दो किशोर जंगल से निकलते हैं। ऑटोमेटिक राइफल है। कुछ बोलते नहीं। गोलियों की बौछार करते हैं। मनोज ओझा बेमौत मारे गए। कुछ अखबारों में खबर छपी। टीवी पर खास जिक्र नहीं। इंडियन एक्सप्रेस ने फोटो छापी। फोटो में मनोज का मृत शरीर और उसके बगल में विधवा और बच्चे दिखायी दे रहे हैं। अच्छा नहीं लग रहा है।
मनोज को किसने मारा? स्थानीय लोगों की माने तो हरी वर्दी में दो किशोर माओवादी थे। एक दो अखबारो ने लिखा, नक्सल थे। पुलिस अभी तय नहीं कर पा रही है कि इन हत्यारों को क्या कहे। अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हो गया है। हालांकि पुलिस को लगता है कि गोली चलाने वालों का मकसद हत्या करना नहीं था। बस खौफ पैदा करना था। पता नहीं लोग खौफजदा हुए या नहीं, लेकिन एक परिवार जरूर उजड़ गया।
हम मीडिया वाले इस पर चर्चा नहीं करना चाहते। हमें इसमें ग्लैमर फैक्टर नजर नहीं आ रहा। हमें नहीं लगता कि ये टीआरपी मसाला है। वो तो मनोज रिलायंस पावर के अधिकारी थे तो मीडिया में कुछ जगह पा गए। खबरें भी इस अंदाज में छपी कि रिलायंस का एक वरिष्ठ अधिकारी मारा गया, मनोज तो वो बाद में था।
आखिरकार मनोज का दोष ही क्या था? बस इतना ही नहीं कि वो एक कंपनी की परियोजना के लिए जमीन तलाशने गए थे। उन्हें देखना था कि क्या वाकई में वहां सयंत्र लग सकता है या नहीं। 20 हजार करोड़ रुपये की तिलैया बिजली परियोजना का मामला है। परियोजना चालू हो हजारों को सीधे और कई हजारों को अप्रत्य़क्ष रूप से रोजगार मिलेगा। बिजली बनेगी। उद्योग पनपेगा। राज्य का भला होगा। देश का भला होगा।
लेकिन कुछ लोगों को विकास की इस थ्योरी पर संदेह है। इसीलिए तो परियोजना के लिए जमीन तलाशने गए मनोज को ही उन्होंने जमींदोज कर दिया। उन्होंने यानी वो जिन्हें कई बुद्धिजीवियों और समाज सेवकों का समर्थन मिलता रहा है। ये वो बुद्धिजीवी हैं, समाज सेवक हैं जो आज भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में अन्ना के बगल में खड़े हैं। खूब बयानबाजी कर रहे हैं, ओबी वैन की शान बने हुए हैं। पूरी व्यवस्था भ्रष्ट दिख रही है, तमाम नेता भ्रष्ट दिख रहे हैं, नहीं दिख रहा है तो बस मनोज और उसका परिवार।
यही वो बुद्धिजीवी है, समाज सेवक है जिन्हें नक्सल और माओवादियों पर पुलिस का डंडा मानवाधिकार का उल्लंघन दिखता है। यही वो लोग हैं जो बचपन बचाने के नाम पर बच्चों को पूरे फ्लैशलाइट के बीच फैक्ट्रियों से निकलवाते हैं। लेकिन बाद में भूल जाते हैं कि बच्चे अंधेरे में कहां खो गए। यही वो लोग हैं जो आज ये तय करना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का ताना बाना कौन तैयार करेगा।
व्यक्तिगत रूप से अन्ना को लेकर मन में बहुत ही सम्मान है। 71 साल की उम्र में जो जोश उन्होंने दिखाया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए, वो कम है। लेकिन नाराजगी उनके साथ खड़े होकर दुकानदारी चलाने वालों की है। ये वो दुकानदार हैं जो हर मिनट साउंड बाइट देने के लिए तैयार हैं। ये कह रहे हैं कि भ्रष्ट नेताओं की वजह से देश ने काफी कुछ सहा है, अब ऐसा नहीं होने देंगे। लेकिन इस पर चुप हैं कि मनोज की क्या गलती थी और अब उसका परिवार आगे क्या सहेगा।
हम यानी न्यूज चैनल देश के लिए चिंतित हैं। दर्जनों ओबी, सैकड़ों संवाददाता झोंक दिए हैं। हर तरफ से लोगों की प्रतिक्रिया ले रहे हैं। आम से लेकर खास लोगों से। एक ही सवाल है क्या आप अन्ना के साथ है, अन्ना की लड़ाई में साथ देंगे। उद्योगपति, फिल्मी सितारे सभी कह रहे है हां। ना कह कर मीडिया की नाराजगी थोड़े झेलनी है। अन्ना और उनके साथ खड़े दुकानदारों के बाद रनडाउन में अब आईपीएल भी आ गया है। जापान में भूकंप की भी खबर हैं। खबर नहीं है तो बस मनोज की, क्यों कोई बता सकता है
लेखक शिशिर सिन्हा आर्थिक पत्रकार हैं तथा सीएनबीसी आवाज से जुड़े हुए हैं.

