भ्रष्ट आचरण ही भ्रष्टाचार हैं। यह एक शाब्दिक व्याख्या हो सकती है जिसमें हम तन, मन एवं धन किसी भी पहलू से भ्रष्ट हो सकते हैं। भ्रष्टाचार का आम समाज से आज वहीं रिश्ता हो गया है जो एक जिस्म और रूह का होता है। नकार की भाषा में कहें तो लकड़ी और दीमक का जो रिश्ता है। आज पूरा देश भ्रष्टाचार के डंक से ग्रसित हो गर्त में जा रहा है। इसमें क्या मंत्री, क्या अफसर, क्या ठेकेदार, क्या व्यापारी, क्या न्यायालय, क्या सेना सभी भ्रष्टाचार की शराब में इतने मदमस्त है कि उन्हें गांव का गरीब, आम जनता की समस्या, महंगाई, अशिक्षा, बेरोजगारी, हत्या, बलात्कार घोटाले एवं घपले जैसी बातें कभी कचोटती नहीं? आखिर कचोटें भी तो कैसे, बेहोश जो हैं? कहीं ऐसा न हो कि जनता के सब्र का बांध टूटे और भ्रष्टाचारियों को बीच चौराहों पर जनता दौड़ा-दौड़ा कर मारे? ऐसा ही कुछ, कुछ समय पहले न्यायालय भी कह चुका है।
आज राजनीति सिर्फ एक वेश्या की तरह हो गई है, जिसे सिर्फ और सिर्फ पैसा से ही पैसा से मतलब होता है। बल्कि मैं तो यह कहना चाहूंगी कि राजनीति वेश्या से भी गिरी हुई हैं, क्योंकि वेश्या के भी अपने कुछ उसूल होते हैं जो इनके नहीं? वैसे तो भ्रष्टाचार का राजनीति एवं समाज में व्याप्त होने के कई कारण है पर मेरी नजर में अहम कारण रातों-रात अमीर बनने की हवस और सपना है, फिर इसे पूरा करने के लिये चाहे कितना ही क्यों न गिरना पड़े? फिर चाहे अपराधियों, चरित्रहीन, भ्रष्टाचारियों से ही अटूट बंधन क्यों न बांधना पड़े?
भ्रष्टाचार को ले आज चारों और केवल निराशा ही निराशा छाई हुई हैं? भ्रष्टाचार पानी की तरह है, जिसमें मिला दो उसी रंग का हो जाता है, और यह सही भी है कि भ्रष्टाचार को हटाना बड़ा ही दुष्कर कार्य है। लेकिन, यदि सभी ठान लें तो नामुमकिन भी नहीं है। जब किसी आदमी में सांप काटे का जहर शरीर में फैलता है तो इसका इलाज भी जहर से ही किया जाता है।
इसी तरह भ्रष्टाचार का इलाज भी राजनीति में ही छिपा है। इसके लिए सभी संगठनों एवं राजनीतिक पार्टियों को थोड़ा कड़ा हृदय करना होगा। कड़ा इसके लिये कि कोई भी जनप्रतिनिधि या मंत्री पर किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार का दाग है या किसी भ्रष्टाचार को ले किसी भी सरकारी एजेन्सी में प्रकरण दर्ज है, तो उसे किसी भी सूरत में एवं किसी भी प्रकार के दबाव में न आए बिना, उसे राजनीतिक पदों से तब तक दूर रखना चाहिए जब तक कि उस पर लगा आरोप झूठा सिद्ध नहीं हो जाता।
ये सुचिता तो राजनीतिक पार्टियों को ही दिखाना होगी, हो सकता है कुछ कुतर्की मेरी इस बात से सहमत न हो। हो सकता है कि वे इस बाबत कई कुर्तक भी प्रस्तुत कर सकते है। मसलन राजनीति के क्षेत्र में भ्रष्टाचार के आरोप विपक्षियों द्वारा लगाना आज आम बात है। ऐसे मत के लोगों को ये नहीं भूलना चाहिये कि हाई प्रोफाइल व्यक्तियों के विरूद्ध प्रकरण दर्ज करने के पहले तमाम सबूतों की आवश्यकता पड़ती है तब कहीं जा प्रकरण दर्ज होता है।
यूं तो भ्रष्टाचार निवारण के बाबत पहले से ही ढेरों नियम एवं अधिनियम मौजूद है। लेकिन इन सभी में दोषी की सम्पत्ति को जप्त या राजसात करने का अधिकार नहीं है, बस इसी कमी के चलते सभी की मौजा ही मौजा है। आज भ्रष्टाचारियों की जमात में ईमान एवं खुद्दार का हाथ भी पसारा सा लगता है। देश की आजादी से अब तक 38 महाघोटाले हुए है, इनमें हर्षद, हवाला, चारा, तेलगी, सत्यम, मधुकोड़ा, आदर्श सोसायटी, कामनवेल्थ, होम लोन, 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला प्रमुख सुर्खियों में रहे हैं। सभी घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला (1.76 लाख करोड़) घोटालों में अपना पहला स्थान बना दमक रहा है।
यह एक कड़वा सच है कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार की जड़े दिन-प्रतिदिन गहरी ही होती जा रही हैं। आज जज भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं हैं। जस्टिस सौमित्र सेन को भ्रष्टाचार और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का दोषी पाया गया। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे पी.डी. दिनाकरण के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला था। सी.बी.आई. जांच में गाजियाबाद जिला अदालत में पी.एफ. घोटाला में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज समेत 23 जज लिप्त पाये गये थे। देश के पूर्व चीफ जस्टिस वाय.के. सब्वरबाल पर 2006 में दिल्ली में सीलिंग के दौरान बेटों को लाभ पहुंचाने का आरोप था। यह भी सौ टका सही है कि सभी जज भ्रष्ट नहीं होते हैं। अब तो कोर्ट भी खीजकर कहने लगा है कि ‘‘भ्रष्टाचार को क्यों न वैध कर काम कराने के रेट तय कर दिये जायें ताकि मोल भाव न हो’’।
प्रशासनिक क्षेत्र में म.प्र. के प्रशासनिक अधिकारी भी भ्रष्टाचार में नित नए झण्डे गाड़ रहे हैं। इसमें प्रमुख आनंद जोशी एवं टीनू जोशी दम्पत्ति ने 350 करोड़ की अवैध कमाई कर न केवल अव्वल रहे बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों के उजले चेहरे पर कालिख भी पोती है। इनकी हवस तो देखिये पैसा बटोरने के साथ-साथ जमीन, फ्लैट, शराब एवं विभिन्न धंधों में लिप्त हो प्रशासनिक कम डान की भूमिका में ज्यादा नजर आए। यही नहीं उनका ये कृत्य अन्यों को भी प्रतिस्पर्धा के लिये उकसाता है। इसी तरह उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव को भ्रष्टाचार में न केवल जेल जाना पड़ा बल्कि 50 हजार रूपये का जुर्माना भी भरना पड़ा। प्रशासनिक अधिकारियों के इतिहास में शायद यह पहली घटना होगी चूंकि नीरा यादव पकड़ी गई इसलिए भ्रष्टाचारी और जो पकड़ में नहीं आये ईमानदार? आज देश में कितने ऐसे नौकरशाह एवं प्रशासनिक अधिकारी होंगे जो सही को सही कहने का साहस अपने विभाग के मंत्री एवं मुख्यमंत्री के सामने करने का रखते हो? सीधा सपाट उत्तर होगा कोई बिरला? जिसे दुनिया सिरफिरा भी कह सकती है।
भ्रष्टाचार को लेकर इंजीनियर एवं स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी भी पीछे नहीं है। भ्रष्टाचार को लेकर अब तो देश के उद्योगपति भी विचलित हो देश के नाम खुला पत्र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, मुख्यमंत्री पी. चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को लिखकर कह रहे है कि ‘‘संभल जाओ गर्त में जा रहा है देश’’ साथ ही भ्रष्टाचार को मिटाने की गुहार भी लगा रहे हैं। इसी तरह कारपोरेट विचौलिया नीरा राडिया ने उद्योगपति, पत्रकार, मंत्रियों, अफसरों को भ्रष्टाचार की बोतल में उतार कर बीते वर्ष तहलका मचाया जिससे मीडिया जगत की किरकिरी भी हुई।
भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एक मायने में सभी को तारीफ करना चाहिये कि उनमें सच कहने का साहस होने के साथ-साथ इसे स्वीकार करने की भी हिम्मत थी, तभी तो उन्होंने सभी के सामने यह स्वीकार किया कि केन्द्र से चला एक रूपया जरूरतमंदों तक पहुंचते-पहुंचते 15 पैसा ही रह जाता है, शेष बिचौलियों के माध्यम से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
सेना भी भ्रष्टाचार की छूत से अछूती नहीं है फिर बात चाहे आदर्श सोसायटी की हो या सुकना भूमि घोटाला जिसमें पूर्व उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल पी.के. रथ को कोर्ट मार्शल में दोषी ठहरा उनकी दो साल की वरीयता कम करने और पेंशन के लिये 15 साल सेवा में कमी का आदेश दिया गया है।
भ्रष्टाचार की पूरी परिक्रमा लगाने पर स्वस्थ नतीजा सिर्फ इतना है कि भारत ही ऐसा देश है, जहां भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज होने पर भी जनप्रतिनिधियों को मंत्री पदों से एवं अफसरशाही में प्रमोशन के अवार्ड से नवाजा जाता हैं? जब तक कानून और संविधान के पालनहारों की भ्रष्ट निकम्मी सोच होगी तो इंसान तो क्या भगवान भी इसे नहीं मिटा सकता। आज जरूरत है पौराणिक कथाओं में वर्णित ऐसे हंसों की जो दूध से पानी को अलग कर देता था। जरूरत है तो सिर्फ और सिर्फ मनस्थिति बदलने की। मनस्थिति बदलते ही परिस्थिति स्वमेव ही बदल जायेगी यह मेरा दावा है।
लेखिका डा. शशि तिवारी सूचना मंत्र पत्रिका की संपादक हैं.

