15वीं लोकसभा चुनावों की भारी अफरा-तफरी तथा राजनैतिक दलों की समझौतावादी उलटबासियों के बीच देश की आधी आबादी को फिर से भुला दिया गया है। महिला दिवस आया और कुछ सरकारी-गैर सरकारी संगठनों द्वारा सेमिनारों, भाषणों से हर वर्ष की भांति औपचारिकता निभाकर पुनः पितृ सत्ता को मजबूत कर चला गया। चूंकि चुनावी मौसम चल रहा है जिसमें फिर से जनता को छलने, धोखा देने और बहकाने के लिए लोक लुभावन वायदे किये जायेगें।
इसी क्रम में पूर्व की भांति इस दयनीय, पीड़ित और शोषित आधी आबादी को आरक्षण के वायदे से छला जायेगा। क्या कोई बताएगा कि देश की सबसे बड़ी पंचायत में पिछले दस वर्षों मे भाजपा और कांग्रेसनीत गठबन्धनों की सरकारों ने इस महत्पूर्ण विषय में कोई निर्णय क्यों नहीं लिया ? ये दोनों ही गठबन्धन किसी पर आरोप भी नहीं लगा सकते, क्योंकि देश का कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं बचा, जो इन दोनों गठबन्धनों की सरकारों में रहकर सत्ता की मलाई न चख चुका है। आखिर क्यों सरकारें इस बिल को लटकाये रखना चाहती हैं, जबकि सभी दल समानता का नारा देने का ढोंग करते हैं। राजनेता और उनकी पार्टियां किसी विशेष जाति, धर्म या समुदाय के मतों को अपनी और आकृष्ठ करने के लिए क्या-क्या हथकण्डे नहीं अपनाती।
यहां तक कि संविधान की मूल भावना से छेड़छाड़ और चुनाव आयोग की अनदेखी करने से भी परहेज नहीं करते। लेकिन जब महिला के अधिकारों और उन्हें समानता पर लाने की बात हो तो वह उससे कन्नी काटते नजर आते हैं। देश में महिलाओं से भेदभाव और असमानता को दर्शाने वाला सर्वेक्षण हाल ही में प्रकाशित हुआ। वर्ड इकोनोमिक फोरम के कुल 130 देशों की महिलाओं की नौकरी, शिक्षा, राजनीति तथा स्वास्थ्य में होने वाले भेदभाव पर अध्ययन निष्कर्ष में भारत का स्थान 113 वां था। सर्वेक्षण के परिणाम यह बताने के लिए काफी हैं कि आधी सदी से अधिक आजादी के बाद भी देश में महिलाओं से प्रत्येक स्तर पर भेदभाव की किए जाने की स्थिति भयावह हो चुकी है। यह संविधान की मूल भावना के विपरीत है। भारत में आर्थिक, जातीय, क्षेत्रीय और शैक्षणिक असमानता और पुरुषवादी सोच के कारण महिलाओं और बच्चों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। महिलाओं को कथित समानता का दिखावा करने वाले राजनैतिक दल भी विकृत पुरूषवादी कट्टरपन्थी सोच की परिधि से कभी बाहर नहीं निकल पाए।
महिलाओं के बारे में सभी दलों में कुण्ठित मानसिकता वाले नेताओं की सोच समय-समय पर उनके दिये बयानों और उनके कारनामों से प्रकट होती रहती है। उनमें स्त्री विरोधी सोच बहुत गहरे उतर चुकी है, जो कभी कथित भारतीय संस्कृति की वाहक पार्टी भाजपा के प्रवक्ता मुख्तार अब्बार नकवी द्वारा मुम्बई आतंकवादी हमले पर जनता द्वारा राजनेताओं के विरोध करने पर सामने आती है। वह मीडिया के सामने लिपस्टिक-पाउडर लगाने वाली महिलाओं को अपनी हदों में रहने की चेतावनी देते हैं तथा जनता दल (एकी.) के अध्यक्ष शरद यादव महिला आरक्षण में चली बहस में पूरी बेशर्मी से महिलाओं को परकटी कहकर सम्बोधित करते हैं। अश्लील सीडी बनाकर सालों तक युवती का यौन शोषण करने वाले उत्तर प्रदेश में राज्य मन्त्री के पद पर सुशोभित राम मोहन गर्ग रहे हों या मध्य प्रदेश के पर्यटन मन्त्री तुकोजीराव पंवार हों, जिन्होंने महिला निर्वाचन अधिकारी से बदसलूकी करते हुए उन्हें देख लेने की धमकी दी तथा उनके मुंह पर कागज फेंक दिया। उस महिला अधिकारी का कसूर इतना था कि मन्त्री महोदय के कहने पर कांग्रेस प्रत्याशी का पर्चा खारिज नहीं किया था। जब उनसे देख लेने के सम्बन्ध में पूछा गया तो मन्त्री महोदय ने मीडिया के सामने महिला अधिकारी का उपहास उड़ाते हुए कहा कि वे देखने की चीज ही नहीं, वह उन्हें क्यों देखेंगे?
राजनैतिक दलों और उनके नेताओं का महिलाओं पर रवैया यहीं खत्म नहीं होता। अपने को प्रगतिशील कहलाने वाले वामपन्थी भी इस काम में पीछ नहीं रहे हैं। अभी हाल ही में सिंगूर-नन्दीग्राम में टाटा को भूमि दिये जाने के विरूद्ध उमड़े जनाक्रोश को कुचलने के लिए वाम कैडर ने ग्रामीण महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार कर अपनी कथित पुरूष सत्ता का अहसास आनदोलनरत महिलाओं और उनके परिवारों को कराया। महिलाओं पर अत्याचार पर मानों कोई भी दल पीछे नहीं रहना चाहता। चाहे वह तन्दूर काण्ड वाले कांग्रेसी नेता सुशील शर्मा रहे हों या जेसिका लाल हात्याकाण्ड अथवा नीतिश कटारा प्रकरण रहा हो। यह लिस्ट काफी लम्बी है। इन सभी दलों में अच्छी खासी संख्या में महिलाएं पदाधिकारी भी हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ कि उनके किसी नेता ने महिलाओं के प्रति अपशब्द कहा हो या उनसे गलत आचरण किया हो तो वे उसका सामूहिक प्रतिवाद करने के लिए दृढ़ता से आगे आईं हों। हां, यदि अन्य किसी दल के नेता द्वारा ऐसा किया जा रहा हो तो वे अवश्य ही मुखर दिखाई देती है। महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला समाज में हर स्तर पर है। उन्हें धर्मों की आड़ लेकर भी खूब प्रताड़ित किया जाता है। लगभग सभी धर्मों में खर-पतवार की तरह नये-नये नामों से उगे संगठनों का पहला निशाना भी महिलायें ही बनायी जाती हैं।
यह अन्दाज लगाना मुश्किल नहीं है कि जब मीडिया की परिधि में रहने वाले ये लोग सरेआम महिलाओं को अपनी दरिन्दगी तथा असमानता का शिकार बनाते है तो दूर-दराज के गांव और छोटे शहरों की महिलाओं की हालत क्या होगी। गांव और शहरों में महिलाओं की स्थिति आज भी दोयम दर्जें के नागरिक की है। महिलायें घर और दफ्तर में गहरे भेद-भाव की शिकार हैं। देश की 70 फीसदी ग्रामीण आबादी में खेती का 90 फीसदी से अधिक काम महिलायें ही करती हैं। लेकिन उनके द्वारा किये गये काम का कोई प्रतिफल उन्हें नहीं मिलता। मजदूरी साथ में काम कर रहे पुरूषों से कहीं कम मिलती है। इस चुनावी बेला में गली मोहल्ले वाले इकट्ठे होकर वोट न देने का फैसला कर लेते हैं। उनका कहना होता है कि जब तक हमारा अमुक काम नहीं होगा, तब तक नेताओं का प्रवेश वर्जित रखेंगे और किसी को वोट नहीं देगें। क्या देश की पीड़ित आधी आबादी एकजुट होकर अपने ऊपर सदियों से हो रही असमानता के विरूद्ध ऐसा नारा बुलन्द करने की पहल कर पायेंगी ? यदि ऐसा होता है तो राजनीतिक दलों की नींव दरक जायेगी। क्योंकि गांधी जी ने कहा था कि स्त्री जब सच्ची भावना से किसी काम का बीड़ा उठाती है तो वह पहाड़ को भी हिला सकती है। आज महिलाओं को एक बड़े बदलाव के लिए तथा पुरूष प्रधान व्यवस्था को तोड़ने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है।
लेखक धर्मवीर कटोच मेरठ के निवासी हैं। वे फिलहाल मानवाधिकार चेतना नामक पाक्षिक मैग्जीन के संपादक हैं। उनसे संपर्क उनके पोस्टल एड्रेस 112/ए, साबुन गोदाम, मेरठ या उनके मोबाइल नंबर 09358227289 या फिर उनकी मेल आईडी [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

