Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

देश-प्रदेश

देश को हथियार व्यापारियों के चंगुल में फंसने से बचाएं

Om Thanvi : बहस छिड़ी है कि सबूत हैं कि नहीं, सबूत दिखाए जाने चाहिए कि नहीं? ये बातें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं, इसलिए हम मान लें कि राष्ट्रहित में कुछ चीज़ें गोपनीय रहनी चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि भारत एक लोकतन्त्र है। और लोकतंत्र में राजनैतिक नेतृत्व को न सिर्फ़ फ़ैसले करने का अधिकार है, बल्कि उठने वाले सवालों का जवाब देने की जवाबदेही भी उसकी है। सवाल उठाने का माहौल ख़त्म करने की चेष्टा, सवाल उठाने वालों को अपराधी, देशद्रोही आदि क़रार देने की प्रथा नाज़ी दौर में रही होगी – लोकतंत्र में वह नहीं चल सकती।

Om Thanvi : बहस छिड़ी है कि सबूत हैं कि नहीं, सबूत दिखाए जाने चाहिए कि नहीं? ये बातें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं, इसलिए हम मान लें कि राष्ट्रहित में कुछ चीज़ें गोपनीय रहनी चाहिए। लेकिन यह भी सच है कि भारत एक लोकतन्त्र है। और लोकतंत्र में राजनैतिक नेतृत्व को न सिर्फ़ फ़ैसले करने का अधिकार है, बल्कि उठने वाले सवालों का जवाब देने की जवाबदेही भी उसकी है। सवाल उठाने का माहौल ख़त्म करने की चेष्टा, सवाल उठाने वालों को अपराधी, देशद्रोही आदि क़रार देने की प्रथा नाज़ी दौर में रही होगी – लोकतंत्र में वह नहीं चल सकती।
सबसे बड़ी बात: हमारे यहाँ प्रावधान है कि जब कभी भी ऐसे मुद्दे सामने आएँ जब राष्ट्रहित में उन पर सार्वजनिक तौर पर कुछ कहना सम्भव न हो, तब सरकार प्रमुख संसदीय नेताओं को बंद कमरे में ब्रीफ़ कर सकती हैं। ऐसी ब्रीफ़िंग राष्ट्रपति, राज्यसभा सभापति, प्रधानमंत्री या लोकसभा स्पीकर के कमरे में की जा सकती है। उपस्थित सभी लोगों पर गोपनीयता की बाध्यता आयद होती है। मंत्रीगण इसमें कोताही क्यों बरत रहे हैं?

लोकतंत्र में यह सरकार और विपक्ष दोनों की ज़िम्मेदारी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर तमाशा न हो। एक परिपक्व लोकतंत्र की तरह स्थिति का बंद कमरे में सही, मिलकर आपसी भरोसे में जायज़ा लिया जाय। फिर पक्ष-विपक्ष के विमर्श के बाद जो ज़रूरी लगे उसकी तैयारी करें। मगर वैसी कोई तैयारी ज़रूरी न हो तो आग को भड़काने की नहीं, बुझाने की जुगत करें, लोगों के रोष और उन्माद को मिल कर ठंडा करें, देश को विकास के रास्ते से भटकने और हथियारों के व्यापारियों के चंगुल में फँसने से बचाएँ।

(एक मित्र से चर्चा में बने नोट्स)

xxx

प्रधानमंत्री मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाले केजरीवाल ने प्रधानमंत्री को सैल्यूट किया। पहले एक भाजपा नेता ने इस बात का मज़ाक़ उड़ाया। अब केंद्रीय मंत्री और अन्य भाजपा नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री को इसलिए घेर रहे हैं कि उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर पाकिस्तान के दुष्प्रचार (प्रोपेगैंडा) को बेनक़ाब करने की माँग सरकार से क्यों की। यह भाजपा की छिछली राजनीति है। दरअसल, यह वार केजरीवाल पर नहीं उन सब लोगों पर है जो सामरिक मामले में सेना और मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन कुछ सवाल कर रहे हैं या कुछ अपेक्षाएँ ज़ाहिर कर रहे हैं। इसमें क्या बुरा है? यह तो कोई लोकतांत्रिक माहौल नहीं हुआ; ऐसा तानाशाही में होता है।

उन टीवी चैनलों पर भी शर्म आती है जो सत्ताधारी पार्टी से भी आगे जाकर पाकिस्तान में केजरीवाल के बयान के इस्तेमाल की ख़बरों पर उन्हें “पाकिस्तान का हीरो” क़रार दे रहे हैं। यानी देश का ग़द्दार? अजीबोग़रीब तमाशा है। बात-बात पर राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र्द्रोह की जुमलेबाज़ी इस सरकार के राज में जैसे बच्चों का खेल हो गई है! (भक्तों को आगाह कर दूँ कि अब मुझे तुरंत ‘आप’ पार्टी का बंदा न कह दें! कल ही तो उन्होंने – मनमोहन सिंह की संजीदगी और मोदी की ढिंढोरापीट राजनीति पर टीप साझा करने पर – मुझे कांग्रेस समर्थक होने का ख़िताब अता फ़रमाया था!)

लेखक ओम थानवी वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...