मौत का एक दिन तो हर एक के लिए मुअय्यन होता होता है. भारत के पिकासो कहे जाने वाले मकबूल फिदा हुसैन भी इस मामले में किसी से अलहदा नहीं थे. लेकिन ९५ वर्ष की उम्र में भी जवां दिल हुसैन इस मौत के हकदार कतई नहीं थे. भारतीय चित्रकला के इस महान चितेरे को दफ्न होने के लिए अपने वतन में दो गज जमीन भी मयस्सर नहीं हो सकी. वह लंदन में मरे और वहीं दफ्न हो गए. उनकी इस हालत पर दिल्ली सल्तनत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर याद आती है जिनका इंतकाल म्यामां (तत्कालीन बर्मा) की राजधानी यंगून (तब रंगून) की जेल में बनी काल कोठरी में हुआ था. अपनी बेदिनी और बेवतनी पर जफर ने एक गजल लिखी थी जिसका अंतिम अशआर कुछ इस तरह था, ङङ्गङङ्गहै कितना बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीं भी मिल ना सकी कुए यार में.”
आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकनेवाले बहादुरशाह जफर को अंग्रेज सरकार ने देश निकाला कर रंगून की काल कोठरी में कैद करवाया था. वहां से उनका निकलना नामुमकिन था. वहीं हुसैन को आजाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले लोकतांत्रिक भारत से ‘आत्म निर्वासन’ के लिए बाध्य होना पड़ा क्योंकि उनके माडर्न आर्ट में बनी कुछ देवी-देवताओं की नग्न आकृतियों में अश्लीलता और अपमान ढूंढने वाले तथाकथित हिंदुत्व के स्वयंभू ठेकेदारों ने वर्षों बाद जगह-जगह उनके खिलाफ हिंसक प्रदर्शन शुरू किए. उनकी पेंटिंग्स जलाने के प्रयास हुए. देश के विभिन्न हिस्सों में उनके खिलाफ सैकडों मुकदमे दायर किए गए. जान से मार देने की धमकियां दी गईं. लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कायल यह देश और यहां का शासन-प्रशासन उन्हें सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सका.
बडे ही कातर स्वर में हुसैन ने तब कहा था, ”मुझ पर हमले हुए तो सरकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, सभी चुप रहे.” अब जब उनका इंतकाल हो गया तो सरकार से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक ने कहना शुरू किया कि उन्हें भारत में उनके परिवारवालों की इच्छानुसार दफन करने की सुविधा दी जा सकती है. यह बात और है कि जीते जी, अपने अंतिम दिनों में वह भारत लौटने को बेकरार थे लेकिन तब किसी ने उन्हें बुलाने की जरूरत महसूस नहीं की थी. इसे विडंबना ही कहेंगे कि शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे और उनके भतीजे राज ठाकरे ने भी उनकी मौत को भारतीय कला के लिए अपूरणीय क्षति करार दिया है जिन्होंने भारत में रहते उनका जीना दूभर करने में कोई कसर नहीं छोडी थी.
हुसैन साहब से रूबरू होने का मौका तो कभी नहीं मिला. हालांकि छात्र-युवा अवस्था से ही समाजवादी चिंतक डा. राममनोहर लोहिया की अधिकतर पुस्तकों के आवरण पर उनकी पेंटिंग्स देख उनके प्रति कौतूहल अक्सर बने रहता था. वे डा. लोहिया के बहुत करीब रहे. उनसे प्रेरित होकर ही उन्होंने हैदराबाद में समाजवादी धनाढ्य बदरी विशाल पित्ती के मोती भवन को रामायण की डेढ़ सौ पेंटिंगों से सजा दिया था. उन्होंने महाभारत पर आधारित भी ढेर सारी पेंटिंग्स बनाई थी. एक बार युवावस्था में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पोर्ट्रेट बनाया था, उस पर टिप्पणी करते हुए डा. लोहिया ने उनसे कहा था, ‘अच्छा है कि तुमने अस्ताचल में जाते नेहरू का पोर्ट्रेट बनाया जिसमें उनके गले तक पानी भर गया है.’ जवाब में हुसैन ने कहा था, ”माडर्न आर्ट की यही तो खासियत है कि देखने वाला उसे अपनी मन मर्जी और मिजाज से देख समझ और परिभाषित कर सकता है.” हालांकि जब आपातकाल का समर्थन करते हुए हुसैन ने इंदिरा गांधी को भारत माता करार देते हुए उनकी पेंटिंग बनाई थी तब हम जैसे आपातकाल का शिकार रहे लोगों को बहुत बुरा लगा था.
मकबूल फिदा हुसैन ने अपनी कला के जरिए दुनिया भर में भारत और भारत की कला का मान बढाया. वे दुनिया के कुछ चुनिंदा चित्रकारों में से थे जिनकी पेंटिंग्स सबसे महंगी बिकती रही. यह भी एक कारण है कि फोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत का पिकासो करार दिया था. ऐसा नहीं कि भारत ने उनकी कद्र नहीं की. उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण के प्रतीष्ठित नागरिक अलंकरणों से नवाजा गया. उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया. हुसैन सौंदर्य और सुंदरता की कद्र करते थे. उन्हें सुंदर महिलाओं का सहचर्य और नई-महंगी कारों की सवारी का शौक था. हालांकि वह नंगे पांव चलते थे. इसकी भी एक वजह थी. अपने मित्र कवि-साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध के अंतिम दिनों में इलाज के समय दिल्ली में हुसैन लगातार उनके साथ थे. जब विलिंगटन क्रीसेंट अस्पताल से मुक्तिबोध के निधन की सूचना मिली, हुसैन पहाड़गंज में अपने किसी मित्र के घर बाथरूम में थे. फोन सुनते ही तपती गर्मी में नंगे पांव वह भागे अस्पताल पहुंचे. बाद में कहा कि अपने पैरों की जलन को वह मुक्तिबोध के नाम करते हैं. तब से उन्होंने खास अवसरों को छोड़ पैरों में जूते-मोजे नहीं पहने. यहां तक कि इसे लेकर उन्होंने मुबई के होटल ताजमहल में प्रवेश पर पाबंदी के सवाल पर बवाल भी झेला.
सुंदरता को देखने का उनका अपना अलग नजरिया होता था. उनकी चहेती अभिनेत्रियों में माधुरी दीक्षित सर्वोपरि थीं जिनको लेकर उन्होंने ‘गज गामिनी’ फिल्म भी बनाई थी. हालांकि उनकी दो और फिल्मों की तरह ‘गज गामिनी’ भी बाक्स आफिस पर बुरी तरह से पिट गई थी. वे कहते थे कि सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है.किसी ने पूछा कि वह माधुरी दीक्षित में क्या देखते हैं, हुसैन ने कहा, ‘उनमें मैं अपनी मां देखता हूं.’ पुरुष और महिला का आलिंगनबद्ध प्रदर्शन प्राचीन कला का मुख्य आकर्षण रहा है. कोणार्क से लेकर खजुराहो तक के मंदिरों में इस तरह की नग्न एवं उत्तेजक मूर्तियां देखने को मिल जाएंगी लेकिन दुभार्ग्य से आज खुद को धर्म और समाज के ठेकेदार कहने वालों का एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो कलाकृतियों के सौंदर्य को अश्लीलता और देवी-देवताओं के अपमान के रूप में परिभाषित करने लगा है. हुसैन की पेंटिंग्स को अश्लील कहने वालों पर दिल्ली हाइकोर्ट में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने भी कटाक्ष करते हुए कहा था कि हुसैन के खिलाफ मामला दर्ज करने वाले लोग शायद कभी समकालीन कला के दर्शन के लिए आर्ट गैलरी नहीं गए. अगर गए होते तो उन्हें पता होता कि हुसैन ही नहीं बल्कि कई प्रमुख पेंटर नग्नता को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में पेश कर चुके हैं.
लेकिन अफसोस तो इस बात का है कि जब देश को विभाजित करने वाली एक खास विचारधारा से प्रभावित सिर-फिरे अराजक तत्वों ने उन पर हमले शुरू किए तो उनकी ढाल बनकर खड़ा होने वाला कोई नहीं था. खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली सरकार और नेताओं ने भी एक तरह से इन तत्वों के सामने समर्पण सा कर दिया था. इसके चलते ही हुसैन को जैसे यह कहते हुए निर्वासित होना पड़ा कि ‘चल उड जा रे पंक्षी कि अब ये देश हुआ बेगाना.’ देश ही नहीं पूरी दुनिया को बेगाना करके हुसैन साहब सुपुर्दे खाक हो चुके हैं. लेकिन उनकी कृतियां-स्मृतियां और उनकी पेंटिंग्स हमें और आने वाली पीढियों को भी न सिर्फ अपने होने का एहसास कराती रहेंगी बल्कि इस बात के लिए झकझोरती भी रहेंगी कि हुसैन जैसे दुनिया भर में मशहूर पेंटर को ‘आत्म निर्वासन’ के लिए बाध्य क्यों होना पडा.
लेखक जयशंकर गुप्त वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे इनदिनों लोकमत समाचार में कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

