हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द ‘धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ”अयोध्या पर फैसला आने के बाद ‘सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें। सेकुलर बाज़ार के लिए जरुरी होता है कि हिन्दू-मुस्लिम झगड़े होते रहें क्योंकि सेकुलरज़्म के सिपाहियों को अमन गवारा नही होता।’ उनके इस लेख में ‘सेकुलर बाज़ार’ शब्द मुझे बेहद पसंद आया क्योंकि सेकुलरज्म निश्चित रुप से बाज़ारु शब्द हो गया है, इसमें कोई दो राय नहीं कि विगत 60 वर्षों से यह शब्द भारतीय संविधान में मौलिक सिद्धांत के रुप में सुशोभित है, लेकिन वास्तविकता में यह घटिया बाज़ार की उस वस्तु के समान है, जिसे अब तक न ही ‘आईएसआई’ और न ‘आईएसओ’ प्रमाण मिल पाया है, अर्थात जिसकी न कोई गारण्टी है और न वारंटी। सच कहें तो अब इस शब्द को सुन-सुन कर और देख कर जी मतलाने लगता है और उल्टी आ जाती है।
दरअसल ये परिस्थिति इस वजह से पैदा हुई है क्योंकि हमारा देश धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है ही नहीं, हम लाख धर्म-निरपेक्ष होने और धर्म-निरपेक्षता के दावे करते रहें। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ धर्म के मामले में निरपेक्ष होना। अर्थात ऐसी व्यवस्था जिस का अपना कोई धर्म नहीं। इसलिए संविधानुसार अगर भारत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है तो उसका अर्थ यही है कि ऐसी शासन व्यवस्था जिसका अपना कोई धर्म नहीं अर्थात शासन में शामिल व्यक्तियों का व्यक्गित रुप से अपना-अपना धर्म हो सकता है, लेकिन शासन के काम काज में किसी भी धर्म का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। इस रुप में मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि स्वाधीनता के बाद केन्द्र हो या राज्य, आज तक कोई धर्म-निरपेक्ष सरकार गठित ही नहीं हो पायी। मेरे विचार में आज तक धर्म-निरपेक्षता की यह परिभाषा भी किसी ने नहीं की कि शासन का धर्म अलग है और वो अन्य धर्मों के साथ उदार रहेगी! धर्म-निरपेक्षता का अर्थ अगर सर्वधर्म सम्भाव मान लिया गया है यानी तमाम धर्मों के साथ समान व्यवहार तो इस लिहाज से भी विगत 60 वर्षों में कोई शासन व्यवस्था गठित नहीं हुयी। इसलिए मैं स्तंभकार तरुण विजय से कहना चाहूंगा कि आप जिस धर्म-निरपेक्षता को निरंतर निशाना बनाते रहे हैं, वो आज तक किसी भी सरकार के काम-काज में शामिल ही नहीं रहा है।
अगर हम निष्पक्ष होकर सरकारों के काम-काज पर नज़र डालें तो पहली ही दृष्टि में इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा कि हमारी शासन व्यवस्था सदा ही बहुसंख्यक वर्ग के धर्म का प्रतिबिम्ब रही है। इस स्थिति को हम ‘अर्ध हिन्दू राष्ट्र’ का नाम भी दे सकते हैं। अब जहां तक भारतीय समाज का सबंध है वो सदियों से सर्व धर्म सम्भाव की भावना पर चलता आया है। जिसका अर्थ है अपने धर्म पर आस्था के साथ-साथ अन्य धर्मों व सम्प्रदायों के साथ उदारता व सहिष्णुता की भावना रखना। हमारे समाज में उदारवादी भी है और कट्टरवादी भी। ‘लेकिन इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि हमारे देश का बहुसंख्यक वर्ग उदार और सहिष्णु है। इसलिए लाख प्रयासों के बावजूद उन पर संकीर्णता हावी नहीं हो पाई। इसका सीधा सा उदाहरण यही है कि 6 दिसंबर 1992, फरवरी 2002 (गुजरात) और 26 नवम्बर 2008 (मुंबई) होने के बाबजूद भारतीय साझी संस्कृति ने इन ह्दय विदारक घटनाओं को इतिहास के पन्नों में ग़र्क कर दिया। ऐसा नहीं है कि इन घटनाओं के घाव भर गए, लेकिन घावों पर मरहम लगाने वालों की संख्या अधिक हो तो दर्द का एहसास कम हो ही जाता है, जबकि तस्वीर का दूसरा रुख यह है कि हमारी शासन व्यवस्था जिसे संविधान की मूल आत्मा ‘धर्म-निरपेक्षता’ के सिद्धान्त पर चलना था वो उतनी ही साम्प्रदायिक व कट्टर हो गयी।
कहने को तो कांग्रेस और उसके विभाजन से उपजे दल धर्म-निरपेक्ष कहलाए, जबकि भारतीय जनसंघ और उससे निकले दल साम्प्रदायिक कहलाने लगे, जब इन तथाकथित धर्म-निरेपक्ष दलों ने सरकारें गठित हुयी सेकुलर सरकारें कहलायीं और भाजपा की सरकारें बनी तो उन्हें भगवा सरकारों का नाम दिया गया। दरअसल साम्प्रदायिकता और धार्मिक विद्वेष हर व्यक्ति की अपनी मानसिकता पर निर्भर करता है। भाजपा व आरएसएस में अनेक लोग खुले विचारों व धार्मिक रुप से अधिक उदार मिल जाएंगे, वहीं सेकुलर कांग्रेस में ऐसे लोगों की कमी नहीं कि अगर उनकी असलियत खुल जाए तो साम्प्रदायिकता भी शर्मिंदा हो जाए। एक साहब सुना रहे थे कि कांग्रेस के एक महामंत्री (दिगिवजय सिंह नहीं) अपने कार्याकर्ताओं को निर्देश दे रहे थे कि आप लोग दलितों व आदिवासियों में काम करें ताकि वो हमारे साथ आ जाएं! बीच में एक कार्यकर्ता ने सुझाव दिया कि हम मुसलमानों के बीच भी ऐसा करें तो उनकी नाराजगी दूर होगी तो वो महामंत्री बोले उन्हें रहने दीजिए, वो और कहीं नहीं जाएंगे जूते खाने! उन्हें पता नहीं था, वहां एक मुसलमान भी बैठे थे वो तपाक से बोले, ‘मुसलमानों को अगर जूते ही खाना है तो यहीं पर क्यों खाएं!’ इस पर वो कांग्रेसी बंगले झांकने लगे! इसलिए सरकार चाहे किसी भी दल या गठजोड़ की हो उसका कोई भी तंत्र धर्म-निरपेक्ष होने का दावा नहीं कर सकता।
कई वर्ष पहले शायद 1980 के दशक की बात है, उत्तर प्रदेश जल निगम के प्रबंध निदेशक पद पर एक आईएएस अधिकारी आये थे मुझे याद नहीं कि वो उत्तर प्रदेश कैडर के थे या प्रतिनियुक्ति पर केन्द्र से आय थे, हां वो दक्षिण भारतीय थे। कार्यभार ग्रहण करने के बाद अगले दिन कार्यालय निरीक्षण के दौरान जब वो एक प्रभाग में पहुंचे तो वहां के मुख्य लिपिक जो ब्राहण थे, उनकी सीट के पीछे दीवार पर कोई मंत्र लिखा था और एक धार्मिक कलैण्डर लटका हुआ था, उस आईएएस अधिकारी ने बड़े बाबू को तुरंत निर्देश दिया कि इस कलेण्डर को घर में लगाइए, दीवार साफ कीजिए। उन्होंने कहा कि मैं भी धर्म में विश्वास रखता हूं लेकिन अपने घर पर! आप एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र के सरकारी कार्यालय में बैठे हैं इसका ख्याल रखिए। मेरे विचारों में शायद वो पहले अधिकारी थे जिन्होंने धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र के अधिकारी होने का इस प्रकार परिचय दिया और अपने अधीनस्थ को भी सचेत किया। सवाल यह है कि सरकार अगर धर्म-निरपेक्ष है तो उसका पालन करे। स्तंभकार तरुण विजय से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूं कि भारतीय समाज में उदारता व सहिष्णुता की जो भी भावना है उसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं का बड़ा योगदान है और यह बात भी अपनी जगह उचित है कि हिन्दू और मुसलमान अपने-अपने धर्मों का पालन करते हुए भी शांति व भाईचारे के साथ रह सकते है, भारतीय समाज की यह प्राचीन परम्परा यूं ही चलती रहेगी।
हमारी सरकारें, अदालतें और अफसरशाही कितनी भी साम्प्रदायिक और हीन मानसिकता से ग्रस्त हो जायें नफरत की राजनीति समाज को डांवाडोल तो करती है, लेकिन शीघ्र ही वो अपनी प्राचीन परंपरा पर वापस आ जाता है। तरुण विजय अपने लेख मे आगे लिखते हैं- ”जिस दिन इस देश में हिन्दू कमज़ोर, अपमानित और तिरस्कृत हुआ उस दिन यहां से भी बहुलतावाद और लोकतंत्र की क्षति हो जाएगी, पड़ोस को देख लीजिए। फ्रांस में बुर्के पर संसद के प्रस्ताव द्वारा प्रतिबंध लग गया, सारा यूरोप एक अभूतपूर्व इस्लाम विरोध से गुजर रहा है, फ्रांस में जो हुआ बाकी यूरोपीय देश भी उसे अपनाना चाहते है। स्विटजरलैंड के इतिहास मे पहली बार मस्जिदों के मीनारों को बनाने पर प्रतिबंध लग गया, वहां कहीं भी लाउडस्पीकरों पर अज़ान नहीं, लेकिन यहां इतने अत्याचार सहने और मंदिरों के विध्वंस के बाद भी कोई प्रतिरोधी कार्यवाही नहीं, उसका एक मात्र कारण हिन्दू समाज की सर्वसमावेशी और उदार चेता मानसिकता रही, जिसे वामपंथी और दामपंथी, दो तरह के सेकुलर कभी समझ नहीं पाए।” वो आगे लिखते हैं- ”वास्तव में इस देश में हिन्दू-मुस्लिम शांति और समन्वय को खतरा देवबंद या जमाअत से नहीं, पर अपने को सेकुलर कहने वाले अमन के उन सिपाहियों से है जो सिर्फ नफरत और हिन्दू से घृणा के आधार पर अपनी दुकान चलाते हैं।
देश की शांति को खतरा सेकुलरों से है, हिन्दू-मुस्लिम से नहीं। चिदम्बरम के बयान और कांग्रेस तथा अन्य अयोध्या के प्रति शर्मिंदा हिन्दुओं के शोर से तो यही पता चलता है।’’ मैं यहां तरुण विजय को ये सुनिश्िचत कराना चाहता हूं कि भारत की नई पीढ़ी अब किसी के भी बहकावे में नहीं आने वाली! साम्प्रदायिकता हो या सेकुलरवाद, सब राजनीति के शतरंज की चालें हैं, जिन्हें आम आदमी काफी हद तक समझ चुका है। इसलिए इस फ्रंट पर अब चिंता की आवश्यकता नहीं। मेरा तो तर्क यही है कि अगर हमारी सरकारें सही अर्थों में संविधान का पालन करें तो धार्मिक विवाद इस हद तक पैदा न हों। इसलिए आप जिस सेकुलरज्म पर निशाना साध रहे हैं, उस से मुसलमानों को बड़ा नुकसान हुआ है और इसके लिए वो पार्टी जि़म्मेदार है जिसने देश पर लम्बे समय तक शासन किया है। अगर पूर्व में हमारी शासन व्यवस्था संविधान सम्मत होती तो, ऐसी परिस्थितियां ही न पैदा होती जहां ‘अयोध्या’ और ‘गुजरात’ बनते और न अदालतों को आस्था के सवाल पर गौर करना पड़ता। अब जहां तक इस तथा कथित सेकुलरज्म से मुसलमानों का तुष्टीकरण होने की बात है तो उसका खुलासा जस्टिस राजेन्द्र सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में कर ही दिया है! मुसलमान सरकारी सेवाओं, पुलिस व सेना से गायब हो चुके है, राजनीति व शैक्षिक क्षेत्रों में भी अनुपात घटता जा रहा है। वो दो नम्बर के नागरिक भी नहीं रहे। उनकी शिक्षण संस्थाओं पर प्रतिबंध है, अपनी ही संस्थाओं को अपना साबित करने के लिए सबूत अदालतों में पड़े हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं! सरकारें अगर धर्म-निरपेक्ष होती तो संविधान की अवहेलना करने वाले शासक क्षण भर भी शासन में नहीं रह सकते थे। किसी सरकार की मदद से न कोई इबादतगाह शहीद होती और न किसी सरकार के उकसाने पर जनसंहार होता।
पश्चिम और यूरोप के उदाहरण भारतीय परिवेश में देना उचित नहीं। वहां की संस्कृति और हमारी संस्कृति में बहुत अंतर है। फिर भी अगर आप वहां की मिसाल दे रहे हैं तो सुन लीजिए। यूरोप अथवा पश्चिम के कुछ देशों में बुर्का, लाउडस्पीकर पर अज़ान और मस्जिद की मीनारें न बनाने पर प्रतिबंध अगर 9/11 का प्रतिशोध है तो 9/11 के स्थान पर भव्य मस्जिद के निर्माण का समर्थन करने वाली बड़ी आबादी भी उसी देश की है। अपने नागरिकों के मौलिक व मानवीय अधिकारों की त्वरत रक्षा में वहां की अदालतें बहुत सक्रिय हैं। आस्ट्रेलिया में भारतीय मूल के डाक्टर मो. हनीफ को आतंकवादी बताने पर पूरी सरकार को क्षमा मांगना पड़ी। अब डा. हनीफ ने आस्ट्रेलिया सरकार के विरुद्ध हर्जाने का मुकदमा दायर कर दिया। जबकि हमारे यहां आतंकवाद के नाम पर वर्षों की सजा काटकर निकले निर्दोष मुस्लिम नौजवान आज भी असहाय हैं। अभी हाल ही में जर्मनी ने घोषणा की है कि देश के अंदर मुसलमानों को ईसाइयों व यहूहियों के समान अधिकार मिलेंगे। फिर जहां तक कुछ देशों में प्रतिबंधों की बात है तो वो इस्लामी प्रतीकों पर है, धार्मिक रिवाजों पर नहीं। वहां के लोग देश में समानता रखना चाहते हैं तो उसका यह अर्थ नहीं है कि मुसलमानों की धार्मिक आज़ादी समाप्त हो गई।
तरुण जी! अगर आप भी देश के अंदर यूरोप की तरह समानता चाहते हैं तो शुरू कीजिए अभियान हम आपके साथ हैं! तमाम धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर उतरवाइये। सार्वजनिक स्थलों पर निकलने वाले धार्मिक जुलूसों को बंद कराइए, अच्छा है ऐसा करने से शांति व सौहार्द की स्थिति खुद ही बेहतर हो जाएगी और सेकुलर देश होने का वास्तविक रूप से श्री गणेश होगा। अगर आप की दृष्टि में सेकुलरज्म का अर्थ यह है कि रमज़ान में सरकारी खर्चों पर रोजा और बे-रोजादारों को इफ्तार दावत, राजनेताओं के साथ हरी टोपियां और गले में रूमाल डाले लोग, हज यात्रा में सरकारी सब्सिडी या कुछ मदरसों को सरकारी मदद, तो माफ कीजिए, मुसलमान इन सारे ढकोसलों को बंद करने के लिए खुद तैयार है! लेकिन उन्हें समान नागरिक अधिकार तो मिलें और अगर धर्म-निरपेक्षता का अर्थ यह है कि तथाकथित राजनीतिक दलों में मुसलमान चेहरे नज़ऱ आते हैं और कुछ मंत्री भी बन जाते हैं, तो इसका सेक्युलिरज्म से क्या वास्ता? ये तो राजनीतिक दलों की मजबूरी है। जाहिर है कि देश के 20 करोड़ से अधिक मतदाताओं को कौन अलग कर सकता है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र, राष्ट्रकुल देश और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को दिखाने के लिए भी कुछ करना होता है, क्योंकि इन संस्थाओं के मौलिक सिद्धांतों में ही धार्मिक, स्वतंत्रता, मानवीय अधिकारों की रक्षा तथा लिंग भेद के विरुद्ध राष्ट्रों के कामकाज पर नजऱ रखना है। कोई भी राष्ट्र सेकुलर हो या धार्मिक, अगर वहां अन्य मतावलम्बी भी उसके नागरिक हैं तो अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार उनकी धार्मिक आज़ादी व मानवीय अधिकारों की रक्षा ऐसी सरकारों का प्रथम दायित्व है। अगर मुसलमान भाजपा को वोट देने लगेंगे तो उस पार्टी में भी मुसलमानों का प्रतिनधित्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा।
तरुण जी! मुसलमान इस देश के नागरिक हैं, अतीत के शासकों ने क्या किया उस का बदला नई नस्ल में लेना उचित नहीं। मुसलमान बार-बार ये कह रहे हैं पूर्व के शासक बस शासक थे, वो इस्लामी शासन नहीं था। मुसलमान न ही बाबर को पूजता है और न अकबर को! वो बस अल्लाह की इबादत करता है। मस्जिद अल्लाह का घर है, वो किस के नाम से सम्बद्ध है इस का कोई अर्थ नहीं! मुसलमान उस का समर्थक नहीं। भारत का इतिहास मुसलमानों ने नहीं लिखा। अकबर ने मुसलमान होते हुए नया धर्म बना लिया तो इस कारण आप लोगों ने उन्हें अकबर महान बना दिया और उनके दादा के नाम से एक मस्जिद किसी ने सम्बद्ध कर दी तो वो ढहा दी गई। मंदिर-मस्जिद जैसे शांति स्थलों को कटुता का केंद्र बनाना कहां तक उचित है। हिन्दुओं की बड़ी आबादी स्वयंभू आस्था के विरुद्ध है, मस्जिद का स्थान न बदलने की शरीयत की बाध्यता पर मुसलमान अटल है। इसलिए दोनों ओर के धर्मगुरु ही इस मामले को हल कर सकते हैं या फिर सुप्रीमकोर्ट का जो फैसला होगा, उसे मुसलमान मान ही लेंगे। प्रतिशोध के नाम पर विगत साठ वर्षों में काफी कुछ हो चुका, अब बाकी क्या है! मुसलमान न्याय और समान अधिकार चाहता है। वो देश की प्रगति और खुशहाली में हिस्सेदारी चाहता है। वो तथाकथित सेकुलर राष्ट्र से मिले या हिन्दू राष्ट्र से! अगर आपको ये सेक्यूलिरज्म पसंद नहीं और आप दावा करें कि हिन्दू राष्ट्र में सबको न्याय मिलेगा, शांति व भाईचारा कायम होगा। धर्म के नाम पर झगड़े नहीं होंगे तो बना लीजिए हिन्दू राष्ट्र! कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा। अब तक जो कुछ हो चुका उससे ज्य़ादा और क्या होगा। वैसे भी इंसाफ शर्मा जी दे या गुप्ता जी, इंसाफ होना चाहिए, क्या आवश्यकता है सेकुलरज्म के नाम पर ऐसे मुसलमान चेहरों की जो सत्ता में पहुंचते ही काठ का टट्टू बन जाते हैं। लेकिन हम जानते हैं तरुण जी कि आप भी हिन्दू राष्ट्र बनाने का बस शोर ही मचाते हैं, बनाएंगे आप भी नहीं क्योंकि आप खुद जानते हैं कि हिन्दू राष्ट्र बनाने के बाद आपके दायित्व ज्यादा बढ़ जाएंगे, इसलिए फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा।
लेखक जफ़र नक़वी वरिष्ठ पत्रकार और उर्दू अखबार सहाफत के संयुक्त संपादक हैं.

