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धूमिल हो रहा हिन्‍दी का अस्तित्‍व

: सिर्फ नारों के सहारे ही किया जा रहा कोरमपूर्ति : एक दिन मैं पिज्जा हट में अपने मित्रों के साथ दावत खाने पहुंचा। वहां सभी लोग अंग्रेजी बोल रहे थे और अंग्रेजी शैली में पिज्जा खा रहे थे। मेरे एक मित्र ने वेटर से अंग्रेजी भाषा में ही पानी मांगा- एक्सक्यूज मी, कुड यू प्लीज गिव मी ए ग्लास ऑफ वाटर? उसने वेटर से तीन बार पानी मांगा, लेकिन वेटर ने कोई ध्यान नहीं दिया। उस रेस्त्रां में बैठे अन्य लोगों को भी कोई असहजता महसूस नहीं हुई, क्योंकि वे सभी भी कथित तौर पर प्रगतिशील समाज अर्थात प्रोग्रेसिव सोसाइटी के लोग थे। जब मैंने वेटर से हिंदी भाषा में पानी के लिए अनुरोध किया- महोदय, क्या मुझे एक गिलास पेयजल मिलेगा? तो सबकी नजरें मुझे घूरने लगीं।

: सिर्फ नारों के सहारे ही किया जा रहा कोरमपूर्ति : एक दिन मैं पिज्जा हट में अपने मित्रों के साथ दावत खाने पहुंचा। वहां सभी लोग अंग्रेजी बोल रहे थे और अंग्रेजी शैली में पिज्जा खा रहे थे। मेरे एक मित्र ने वेटर से अंग्रेजी भाषा में ही पानी मांगा- एक्सक्यूज मी, कुड यू प्लीज गिव मी ए ग्लास ऑफ वाटर? उसने वेटर से तीन बार पानी मांगा, लेकिन वेटर ने कोई ध्यान नहीं दिया। उस रेस्त्रां में बैठे अन्य लोगों को भी कोई असहजता महसूस नहीं हुई, क्योंकि वे सभी भी कथित तौर पर प्रगतिशील समाज अर्थात प्रोग्रेसिव सोसाइटी के लोग थे। जब मैंने वेटर से हिंदी भाषा में पानी के लिए अनुरोध किया- महोदय, क्या मुझे एक गिलास पेयजल मिलेगा? तो सबकी नजरें मुझे घूरने लगीं।

मुझे थोड़ी देर के लिए अजीब लगा, लेकिन जल्द ही मैं सहज हो गया। हालांकि तभी वेटर छह गिलास पानी लेकर हमारी मेज पर आया और मेरे सभी मित्रों को पानी दिया। मुझे फख्र इस बात का था कि मेरे हिंदी भाषा में पानी मांगने पर वेटर ने तुरंत पानी लाकर दे दिया और निराशा इस बात की कि अपने ही देश में हिंदी में बात करने वालों को समाज का एक बड़ा तबका देहाती और पिछड़ा समझता है।

एक अन्य वाकया तब मेरे सामने आया, जब मैं बैंक में हिंदी में मांगपत्र (डिमांड ड्राफ्ट) बनवाने गया। वहां बैंक की दीवारों पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था कि यहां हिंदी में काम करने में गौरव की अनुभूति की जाती है। कृपया आवेदन-पत्र भरने के लिए हिंदी भाषा का प्रयोग करें, जिससे राष्ट्रभाषा की प्रगति में हम भी भागीदार बन सकें। मांगपत्र का आवेदन प्रपत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में छपा था। मैंने भी उत्साहपूर्वक हिंदी में आवेदन प्रपत्र भरकर जमा खिड़की पर पैसे सहित हाथ बढ़ा दिया। इस पर पैसे जमा लेने वाले लिपिक ने कहा कि फार्म अंग्रेजी में भरकर लाइए।

जब मैंने उससे कहा कि मुझे जहां आवेदन करना है उसमें भुगतान पाने वाले पक्ष का नाम हिंदी में ही लिखा है, तो मैं उसे अंग्रेजी में कैसे भरूं? तो उसने कहा कि इसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता। मैं सीधा शाखा-प्रबंधक के पास पहुंचा और शिकायत की तो उसने भी हाथ खड़े कर दिए। मुझे घोर निराशा हुई कि आज जब तकनीक की दुनिया में उत्तरोत्तर प्रगति हो रही है और इंटरनेट पर सर्च इंजन तक हिंदी में आ गया है। फिर भी बैंकों में हिंदी भाषा की उपेक्षा क्यों की जा रही है।

ऐसे ही अनेक वाकयों से आए दिन सामना होता है, जब अंग्रेजी के आगे हिंदी को सर झुकाना पड़ता है। जब हिंदी अपमानित होती है और अंग्रेजियत का सम्मान किया जाता है। जब हिंदी भाषियों को पिछड़ा और अंग्रेजी बोलने वाले को प्रगतिशील का दर्जा दिया जाता है। ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान में ही हो सकता है, क्योंकि यहां के लोग हिंदी को घर की मुर्गी दाल बराबर की कहावत का अक्षरश: पालन करते हैं। पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण के चक्कर में हिंदी भाषा का अस्तित्व धूमिल होता जा रहा है। हिंदी की यह दुर्दशा देखकर काफी निराशा होती है।

लेखक चैतन्य चंदन का यह लिखा ‘भड़ास ब्लाग’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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