काश मैं एक दिन का मुख्यमंत्री बन जांऊ,
प्रदेश में प्याज़ के लिए नई-नई नीतियां बनाऊं,
जगह-जगह विशाल पार्कों का निर्माण कराऊं,
उसमे फुलवारी की जगह प्याज़ लगवाऊं,शहरों के सौंदर्यीकरण के लिए मुख्य मार्गो पर,
स्वागत मुद्रा में हाथियों की मूर्ति लगवाऊं,
उनके सर पर गमले रख कर उनमें भी प्याज़ उगाऊं,
प्रदेश की शोभा बढ़ाऊं, देश और विदेश में खूब ख्याति पाऊं,
एक ठुके-पिटे नेता की तरह चर्चित हो जाऊं,
फिर मैंने सोचा भक्क! ऎसा तो सिर्फ फिल्मों में होता है,
यहाँ का राजनेता तो सत्ता पाकर चैन से सोता है,
चलो अब प्याज़ के सब्जबाग से जागकर सब्जी मंडी की ओर रुख कर जाऊं,
लूटे-पिटे से घर पहुंचे तो बीवी बोली प्याज़ कहां है?
अब उसको कैसे समझाऊं,
क्लेश की थाली में मायूसी रोटी लेकर प्याजी ताकत का एहसास करूं,
मन ही मन प्याज़ पर आंसू बहाऊं,
एकायक बेताली सवाल मन में गूंजा हे ब्राहमण रसोई में बैठा क्या सोच रहा है?
मुँह से आवाज़ आई ब्राहमण हूं,
अब प्याज़ कभी ना खाऊं,
बीवी बोली मन ही मन क्या बड़बड़ाए जाते हो?
मैंने कहा प्याज़ की नीति बनाकर राजनीती में जाने का मन करता है,
फिर मन डरता है चुनाव चिन्ह कहां से लाऊं?
क्यों न प्याज़ को ही चुनाव चिन्ह बनाऊं और चुनाव जीत कर सत्ता पाऊं,
और फिर सुकून से प्याज़ के साथ दो वक़्त की रोटी बाल-बच्चों के संग खाऊं.

