भारत के मोबाइल क्षेत्र में तथाकथित क्रांति लाने वाली नम्बर पोर्टेबिलिटी की तकनीक वास्तव में एक हौव्वा से ज्यादा कुछ भी नहीं है। भारत एक विकासशील राष्ट्र है और हमारे पास एक ऐसी तकनीक है, जिसका पूरी दुनिया में बोलबाला है और इसे हम जुगाड़ तकनीक कहते हैं। पारंपरिक पत्र से लैण्डलाइन और तत्पश्चात सन 1990 के दशक में मोबाइल फोन की दस्तक ने देश के विभिन्न भागों में बसे परिवारजनों को और करीब महसूस कराया। धीरे-धीरे मोबाइल बात करने के एक साधन के सीमित दायरे से निकल कर एसएमएस, एमएमएस इण्टरनेट चैटिंग जैसी सुविधाओं के साथ आम जनों की एक अतिआवश्यक जरूरत बन गया। हमारे गावं में एक कहावत है कि नई दुल्हन सभी को प्यारी होती है, ठीक उसी तरह इस नई तकनीक को लोगों ने सर आखों पर बिठाया।
मुझे याद है कि 2003-2005 के समय में बीएसएनएल के सिम को लोग ब्लैक में भी खरीदने को तैयार रहते थे। फिर निजी आपरेटरों ने बाजार में दस्तक दी और पूरे मोबाइल बाजार का गणित ही बदल दिया। 250 रूपये की सिम से 5 रूपये की सिम (अब तो फ्री में भी मिल जाती है) के सफ़र ने ग्राहकों को इतने विकल्प दिए कि उन्होंने एक मोबाइल फोन और चार सिम रखना शुरू कर दिया (रखने का उद्देश्य पाठक श्रेष्ठ स्वयं जानते हैं)। कम्पनियों ने बाजार की नस को पहचान कर डयूल सिम के फोन भी बाजार में उतार दिए। लोगों ने फिर नई दुल्हन को खूब प्यार दिया। और इक्का दुक्का मोबाइल फोन कम्पनियों से आज बाजार में अनगिनत विकल्प उपल्बध हैं।
ऐसे हालात में नंबर पोर्टेबिलिटी को एक क्रान्ति कहना मेरे समझ से परे है। आज के इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में हर आपरेटर अपने उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधाएं देने की कोशिश में जुटा हुआ है। और जो नहीं दे पा रहा है उसे ग्राहक ही नहीं मिल पा रहे हैं। तो ऐसे हालात में मुझे नहीं लगता कि नंबर पोर्टेबिलिटी से बहुत बड़ा बदलाव आएगा। हां उपभोक्ता अब कस्टमर केयर फोन करके गाली-गलौज (मेरे एक मित्र जो कस्टमर केयर अधिकारी हैं, के अनुसार ज्यादातर ग्राहक कस्टमर केयर में फोन करके या तो लड़कियों से बात करना चाहते हैं या फिर लड़कों से गाली-गलौज कर के बात करते हैं) करने की आदत कम कर देंगे और आपरेटर बदल देने की आजादी का पूरा लाभ उठाते हुए एक बार फिर नई दुल्हन के स्वागत की तैयारी में लग जाएंगे।
नंबर पोर्टेबिलिटी को ज्यादा तवज्ज़ो देने के बजाय सरकार को ऐसी तकनीक विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए, जिससे लोगों को प्रदेश बदलने की सूरत में अपना नम्बर बदलने की मजबूरी से निज़ात मिल सके। आज के ग्लोबलाइजेशन के युग में पैसे की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने के लिए जहां एक तरफ लोग घर बार छोड़ कर अन्य प्रदेशों में रोज़गार की तलाश में भटकते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर पेशेवर लोग काम के विस्तार के लिए नई जगहों पर आंशिक या पूर्णकालिक रूप में स्थापित होते हैं। तो सरकारी और गैर-सरकारी सस्थाओं में ट्रांसफर होने की परंपरा के कारण लोगों को अपने नम्बरों को बार-बार बदलना पड़ता है अथवा रोंमिंग पर अतिरिक्त पैसा खर्च करना पड़ता है, जिससे उनका अपने समाज से सम्पर्क न टूट जाए।
लेखक सतीश कुमार सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

