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नरसिंहगढ़ के फुन्सुक वांगडू ‘हर्ष गुप्ता’

[caption id="attachment_2619" align="alignleft" width="96"]लोकेंद्र लोकेंद्र [/caption]खूबसूरत और व्यवस्थित खेती का उदाहरण है नरसिंहगढ़ के हर्ष गुप्ता का फार्म। वह खेती के लिए अत्याधुनिक, लेकिन कम लागत की तकनीक का उपयोग करते हैं। जैविक खाद इस्तेमाल करते हैं। इसे तैयार करने की व्यवस्था उन्‍होंने अपने फार्म पर ही कर रखी है। किस पौधे को किस मौसम में लगाना है। पौधों के बीच कितना अंतर होना चाहिए। किस पेड़ से कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। किस पौधे को कितना और किस पद्धति से पानी देना है। इस तरह की हर छोटी-बड़ी, लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी उनके दिमाग में है। जब वह पौधों के पास खड़ा होकर सारी जानकारी देते हैं तो लगता है कि उन्‍होंने जरूर एग्रीकल्चर में पढ़ाई की होगी, लेकिन वास्‍तव में ऐसा है नहीं। हर्ष गुप्ता इंदौर के एक प्राइवेट कॉलेज से फर्स्‍ट क्लास टेक्सटाइल इंजीनियर हैं। उन्‍होंने इंजीनियरिंग जरूर की थी, लेकिन रुझान बिल्कुल भी न था।

लोकेंद्र

लोकेंद्र

लोकेंद्र

खूबसूरत और व्यवस्थित खेती का उदाहरण है नरसिंहगढ़ के हर्ष गुप्ता का फार्म। वह खेती के लिए अत्याधुनिक, लेकिन कम लागत की तकनीक का उपयोग करते हैं। जैविक खाद इस्तेमाल करते हैं। इसे तैयार करने की व्यवस्था उन्‍होंने अपने फार्म पर ही कर रखी है। किस पौधे को किस मौसम में लगाना है। पौधों के बीच कितना अंतर होना चाहिए। किस पेड़ से कम समय में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। किस पौधे को कितना और किस पद्धति से पानी देना है। इस तरह की हर छोटी-बड़ी, लेकिन महत्वपूर्ण जानकारी उनके दिमाग में है। जब वह पौधों के पास खड़ा होकर सारी जानकारी देते हैं तो लगता है कि उन्‍होंने जरूर एग्रीकल्चर में पढ़ाई की होगी, लेकिन वास्‍तव में ऐसा है नहीं। हर्ष गुप्ता इंदौर के एक प्राइवेट कॉलेज से फर्स्‍ट क्लास टेक्सटाइल इंजीनियर हैं। उन्‍होंने इंजीनियरिंग जरूर की थी, लेकिन रुझान बिल्कुल भी न था।

सन 2004 में वह पढ़ाई खत्म करके घर वापस आए। फावड़ा-तसल्ल उठाए और पहुंच गए अपने खेतों पर। यह देख स्थानीय लोग उनका उपहास उड़ाने लगे। लो भैया अब इंजीनियर भी खेती करेंगे। नौकरी नहीं मिल रही इसलिए बैल हाकेंगे। वहीं इससे बेफिक्र हर्ष ने अपने खेतों को व्यवस्थित

हर्ष

हर्ष गुप्‍ता

करना शुरू कर दिया। इसमें उसके पिता का भरपूर सहयोग मिला। पिता के सहयोग ने हर्ष के उत्साह को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया। बेटे की लगन देख पिता का जोश भी जागा। खेतीबाड़ी से संबंधित जरूरी ज्ञान इंटरनेट, पुराने किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से जुटाया।

नतीजा थोड़ी-बहुत मुश्किलों के बाद सफलता के रूप में सामने आया। उनके फार्म पर आंवला, आम, करौंदा, शहतूत, गुलाब सहित शीशम, सागौन, बांस और भी विभिन्न किस्म के पेड़-पौधे 21 बीघा जमीन पर लगे हैं। हर्ष की कड़ी मेहनत ने उन सबके सुर बदल दिए जो कभी उनका उपहास उड़ाते थे। उसके फार्म को जिले में जैव विविधता संवर्धन के लिए पुरस्कार भी मिल चुका है। इतना ही नहीं कृषि पर शोध और अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों को फार्म से सीखने के लिए संबंधित संस्थान भेजते हैं।

हर्ष का कहना है कि मेहनत तो सभी किसान करते हैं, लेकिन कई छोटी-छोटी बातों का ध्यान न रखने से उनकी मेहनत बेकार चली जाती है। मेहनत व्यवस्थित और सही दिशा में हो तो सफलता सौ फीसदी तय है। मैं इंजीनियर की अपेक्षा किसान कहलाने में अधिक गर्व महसूस करता हूं। हर्ष कहते हैं कि खेती के जिस मॉडल को मैं समाज के सामने रखना चाहता हूं, उस तक पहुंचने में कुछ वक्त लगेगा।

हर्ष गुप्ता और उसके फार्म के बारे में बात करने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना सा ही है कि कामयाबी के लिए जरूरी नहीं कि अच्छी पढ़ाई कर बड़ी कंपनी में मोटी तनख्वाह पर काम करना है। लगन हो तो कामयाबी तो झक मारके आपके पीछे आएगी। यह कर दिखाया छोटे-से कस्बे नरसिंहगढ़ के फुन्सुक वांगडू ‘हर्ष गुप्ता’ ने।

लेखक लोकेन्‍द्र सिंह राजपूत पत्रिका, ग्‍वालियर में सब एडिटर हैं.

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