अन्ना हजारे व उनके कथित सिविल सोसायटी के लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का ऐलान किया और उनकी इस मुहिम में भागीदारी की तथाकथित नवधना्ढ्य और प्रोफेशनल्स ने। इस दौरान सरकारी भ्रष्टाचार की तो खुलकर बातें की गई, विदेशों में काले धन पर सरकार को कोसा गया लेकिन निजी क्षेत्र में अजगर की भांति फैल गये भ्रष्टाचार पर किसी ने चर्चा करना भी उचित नहीं समझा। क्या कारण है कि कल के मामूली व्यापारी आज करो़ड़ों और अरबों में खेल रहे हैं। शिक्षा के निजीकरण के नाम पर भ्रष्टाचाररूपी अवैध कमाई को मुनाफे का नाम दिया जा रहा है।
इसी तरह चिकित्सा को व्यापारियों के हाथों सौंपने से आम आदमी बिना इलाज के मर रहा है। सरकारी अस्पताल में तो मरीज को केवल बाहर से दवा लाने पर विवश किया जाता है लेकिन निजी अस्पताल तो मरीजों के घर और खेत बिकवा रहे हैं। किसान का आलू जब खेत में होता है तो दो रुपये किलो बिकता है, लेकिन जब वह धन्ना सेठ के गोदामों में पहुंच जाता है तो वह 15-20 रुपये क्यों हो जाता है? किसानों से कौड़ि़यों के भाव जमीन खरीदकर कौन कुबेरपति बन जाता है? अन्ना हजारे के प्रिय वकील क्या गरीब, शोषितों और ईमानदार लोगों का मुकदमा लड़कर सम्पन्नतम हुए हैं। इस आंदोलन के दौरान आरक्षण हटाओ-भ्रष्टाचार मिटाओं का नारा भी दिया गया, लेकिन सवाल यह है कि निजी क्षेत्र में तो आरक्षण नहीं है फिर वहां भ्रष्टाचार का नंगा नाच क्यों हो रहा है? अन्ना की इस सिविल सोसायटी में कोई गरीब, मजदूर, किसान, दलित, पिछड़ा या अल्पसंख्यक क्यों नहीं है? चंद सफेद कॉलर वाले व पूर्व नौकरशाह इस देश के अघोषित नियंता नहीं बन सकते। निजी क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव क्यों चुप हैं? क्या निजी क्षेत्र जनलोकपाल के दायरे में नहीं आना चाहिए?
वस्तुतः निजी क्षेत्र को भी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत लाना चाहिए, तभी देश से भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत होगी। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं। केवल लोकपाल विधेयक पास होने से देश में भ्रष्टाचार समाप्त होने की बात सोचने वाले लोग कल्पनालोक में विचरण कर रहे हैं। जब कोई बुराई कार्यालय और दुकान अथवा कार्यस्थल तक सीमित हो तो उसे रोका जा सकता है, लेकिन अब भ्रष्टाचार ने घरों में प्रवेश कर लिया है। किसी भी माता-पिता ने अपनी संतान से इस कारण रिश्ता नहीं तो़ड़ा कि उसका पुत्र अथवा पुत्री भ्रष्ट है और रिश्वत अथवा कालाबाजारी में लिप्त हैं। किसी पत्नी ने इस बात पर अपने पति को तलाक नहीं दिया है कि उसका पति भ्रष्ट तरीके से पैसे बना रहा है। घर में घुसे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए न कानून काम आयेगा और न ही अन्ना हजारे का अनशन।
जरूरत इस बात की है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन शुरू हो। इसकी शुरुआत हमें अपने घर, गली, मोहल्लों व शहर से करनी होगी। अपने मित्रों और रिश्तेदारों से करनी होगी। मेरा अभिमत है कि भ्रष्टाचार को केवल सरकारी प्रयासों से समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोकतांत्रिक पद्धति में चुनाव होते हैं और चुनाव बेहद खर्चीले होते हैं। अतः केवल राजनेताओं से भ्रष्टाचार की उम्मीद करना पर्याप्त नहीं है। वैध स्त्रोतों से अधिक अर्जित संपत्ति को अगर जब्त किया जाये। भ्रष्ट और कालाबाजारियों के साथ उनके परिजनों को भी आरोपी माना जाना चाहिए क्योंकि आदमी अपनी पत्नी, बच्चों और परिवार के लिए ही भ्रष्ट तरीके से कमाई करता है। जब उसका परिवार हराम की कमाई से गुलछर्रे उड़ा सकता है तो इस अपराध से उसे वंचित क्यों किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है कि हर पत्नी और बच्चों की निगाह अपने पति और बाप पर होगी कि उनकी गलत कमाई से उन्हें भी जेल की हवा खाना पड़ सकती है।
इस तरह का कानून बनना चाहिए कि जिसके अंतर्गतं हर व्यक्ति के आय-व्यय का हिसाब रखा जाये तो सहज ही भ्रष्टाचार दिखाई देने लगेगा। वैसे भ्रष्टाचार का मतलब केवल सरकारी रिश्वत नहीं है। अपितु जनता के दोहन की हर इकाई दोषी है। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अन्ना के अनशन से काम नहीं चलेगा और न ही पूंजीवादी मीडिया के अर्नगल प्रलाप से। हमें समाज के हर क्षे़त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना होगा। वह क्षे़त्र चाहे मीडिया का हो, एनजीओ का हो अथवा व्यापार का। अन्ना हजारे का यह जान लेना चाहिए कि जो संपन्न और सक्रिय वर्ग उनके साथ है, वह दिल से कभी नहीं चाहेगा कि भ्रष्टाचार समाप्त हो। जिस भ्रष्टाचार की बुनियाद पर वह शीर्ष पर हैं। सत्ता और धन के शिखर पर बैठे व्यक्ति कभी नहीं चाहेंगे कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आर-पार की ल़ड़ाई हो।
लेखक डा. वरिष्ठ पत्रकार, साहित्य शिल्पी तथा आगरा में जनसंदेश टाइम्स के ब्यूरोचीफ हैं.

