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संगीत-सिनेमा

निर्भय गूर्जर के नाम पर चंबल में मंगल

[caption id="attachment_2623" align="alignleft" width="64"]दिनेशदिनेश[/caption]देश दुनिया मे अपराध के नये-नये तौर तरीकों के ईजाद हो जाने के बाद भी आज सिनेमा की दुनिया के निर्माता-निर्देशकों का मोह चंबल के बीहड़ों से अलग नहीं हुआ है। यह बात अलग है कि बीहड़ पर फिल्म बना कर हकीकत की तस्वीर आम दर्शकों को फिल्मकार दिखाना चाहते हों, लेकिन इससे एक बात साफ हो चली है कि कभी ऐसी फिल्मों के जरिये ही चंबल में डकैतों ने एक से एक नये-नये अपराध करके पुलिस के सामने चुनौती खड़ी की है। कभी चंबल के खूंखार डाकुओं में शुमार रहे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली फिल्म को लेकर दो सैकड़ा से अधिक छोटे-बडे़ कलाकारों की फौज चंबल के बीहड़ों मे कूद पड़ी है। जो इस समय चंबल के बीहड़ों में अपनी हकीकत की शूटिंग करने मे लगी हुई है।

दिनेश

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देश दुनिया मे अपराध के नये-नये तौर तरीकों के ईजाद हो जाने के बाद भी आज सिनेमा की दुनिया के निर्माता-निर्देशकों का मोह चंबल के बीहड़ों से अलग नहीं हुआ है। यह बात अलग है कि बीहड़ पर फिल्म बना कर हकीकत की तस्वीर आम दर्शकों को फिल्मकार दिखाना चाहते हों, लेकिन इससे एक बात साफ हो चली है कि कभी ऐसी फिल्मों के जरिये ही चंबल में डकैतों ने एक से एक नये-नये अपराध करके पुलिस के सामने चुनौती खड़ी की है। कभी चंबल के खूंखार डाकुओं में शुमार रहे निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली फिल्म को लेकर दो सैकड़ा से अधिक छोटे-बडे़ कलाकारों की फौज चंबल के बीहड़ों मे कूद पड़ी है। जो इस समय चंबल के बीहड़ों में अपनी हकीकत की शूटिंग करने मे लगी हुई है।

इस फिल्म को 1978 से 2005 तक का चंबल के डाकू दौर को बखूबी उकेरने की तैयारी की गई है। निर्भय गुर्जर की जिंदगी पर बनने वाली इस फिल्म में वैसे तो 1978 से लेकर 2005 तक चंबल में रहे सभी डाकुओं को उनके प्रभाव के मुताबिक सिनेमाई पर्दे पर उतारा जा रहा है। डाकू निर्भयनिर्भय गूर्जर के जीवन पर फिल्म बनाने का सपना देखने वाले निर्माता कृष्णा मिश्रा की मुसीबतें अब बढ़ना तय माना जा रहा है क्योंकि निर्भय की पहली बीबी सीमा परिहार ने इस फिल्म के निर्माण पर आपत्ति जाहिर करते हुये कहा है कि निर्भय की बीबी होने के नाते उसकी अनुमति के बिना कोई भी फिल्म का निर्माण नहीं किया जा सकता है। सीमा कहती हैं कि वे फिल्म के निर्माण को रूकवाने के लिये कानूनी मदद ले रही हैं। सीमा का कहना है कि निर्भय के जीवन पर फिल्म बना कर फिल्म निर्माता आखिरकार क्या साबित करना चाहते हैं?

वैसे तो चंबल का बीहड़ पहले से ही सिनेमाई कलाकारों की रियल शूटिंग का प्रमुख केंद्र रहा है, लेकिन इस बार डाकू निर्भय गूर्जर की जिंदगी पर बनने वाली फिल्म को लेकर चंबल के बाशिदों में खासा आकर्षण देखा जा रहा है। शुरू करते हैं फिल्म के मुर्हुत शॉट से। जब मंगलाकाली के मंदिर परिसर में सिनेमाई निर्भय ने मुन्नी पांडे से शादी के बाद गैंग के साथ मां की अर्चना करके अपने आपको बीहड़ का बादशाह साबित किया है। करीब 3 महीने से अधिक समय तक रह कर तीन सैकड़ा से अधिक छोटे-बडे़ कलाकार चंबल के आसपास के बीहड़ों में रह कर शूटिंग करेंगे।

चंबल के बीहड़ों को लेकर वैसे तो कई फिल्मों को चंबल के इन बीहड़ों ने जीवनदान दिया है। लेकिन बैंडिट क्वीन और वुंडेड की सफलता के बाद निर्भयसिने निर्देशकों ने एक बार फिर चंबल के बीहड़ की ओर रुख किया है। फिल्म में एनएसडी थियेटर के सिनेमा तथा दूरदर्शन से जुड़े कई कलाकार अभिनय के रंग दिखायेंगे। उन्होंने बताया कि फिल्म की संगीत रवीन्द्र जैन ने तैयार किया है। लेखन व निर्देशन कृष्णा मिश्रा द्वारा किया जा रहा है। मुहूर्त के बाद फिल्म के कुछ दृश्य भी फिल्माये गये। निर्देशक के लाइट कैमरा एक्शन बोलते ही फिल्म के नायक तथा नायिका ने अभिनय शुरू किया। बीहड़ में अर्से बाद हो रही फिल्म शूटिंग को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी। बताते चले कि चंबल का बीहड़ कभी सिनेमाई कलाकारों के लिये खास रहा है। बीहड़ नाम की इस फिल्म का सबसे जोरदार पक्ष यही माना जा रहा है कि फिल्म के निर्माण को लेकर पहले से रियल लोकेशन की शूटिंग की जा रही है। ऐसी शूटिंग भले ही फिल्म निर्माण के बाद हर दर्शक को ना भाये, लेकिन रियल लोकेशन वाली फिल्म देखने के शौकीनों के लिये इस फिल्म का आंनद बिल्कुल ही जुदा होगा। सबसे खास बात यही है कि वुंडेड फिल्म के निर्माण के दौरान इसी कृष्णा मिश्रा समेत वुंडेड फिल्म की सारी की सारी कलाकारों की टीम को निर्भय गूर्जर ने फिल्म निर्माण रोकने के बाद प्रसारण को रोकने की धमकी दे डाली थी, लेकिन निर्भय गूर्जर के 7 नबंवर 2005 को यूपी एसटीएफ की एक मुठभेड मे मारे जाने के बाद फिल्म आसानी से प्रसारित हो गई।

इस फिल्म में जहां फूलन देवी के पति मान सिंह को काम करने का मौका मिल रहा है, वहीं कभी खूंखार डाकुओं मे शूमार रहे मलखान सिंह से निर्भयकाम को लेकर बात चल रही है। डाकूओं की हकीकत भरी जिंदगी पर बनने वाली इस फिल्म का सबसे अधिक दिलचस्प पहलू यह है कि अब तक बड़ी हिट मानी जा रही है दंबग में मुन्नी बदनाम जैसा लोकप्रिय गाना गाने वाली ममता शर्मा पार्श्व गायन कर रही हैं। जाहिर है कि कुछ ना कुछ तो मुन्नी जैसा भी देखने और सुनने को मिलेगा। 1978 से लेकर 2005 तक चंबल मे सक्रिय रहे डाकुओं पर अध्ययन के बाद एक कहानी तैयार की गई और अब उसे फिल्म के रूप मे रूपहले पर्दे पर लाने की कोशिश की जा रही है। निर्भय का किरदार नये कलाकार विकास श्रीवास्तव के जिम्मे है, जो अपने किरदार में काफी हद तक फिट समझे जा रहे हैं और डाकू रामआसरे उर्फ फक्कड़ का किरदार फिल्म के क्रियेटिव डायरेक्टर अनिल शर्मा कर रहे हैं, जबकि कुसमा नाइन का किरदार निभा रही है अनामिका शर्मा।

फिल्म को हकीकत के रूप मे उतारने के लिये बीहड़ और डकैतों से जुडे़ रहे लोगों को ही फिल्म में काम देने की कोशिश की जा रही है, इसीलिये जहां मंगलाकाली मंदिर परिसर में डाकू निर्भय गूर्जर और मुन्नी पांडे की शादी को फिल्माया गया, वहीं काली वाहन मंदिर परिसर मे डाकू फक्कड़ और कुसमा नाइन की शादी को दर्शाया गया। इटावा नारी निकेतन केंद्र में कभी डाकू बनने से पहले कुसमा नाइन कैद रही हैं, जहां पर कुसमा नाइन को कैद से मुक्त कराने के लिये फूलन का भाई गजोदर आता है और बीस हजार रूपये खर्च करने की बात विक्रम मल्लाह निर्भयकी ओर से करने को कहता है। इसी दरम्यान कुसमा का बाप भी आ जाता है, जिसे देख कर कुसमा फूट फूट करके रो पड़ती है, लेकिन जब बीहड़ में ले चलने की बात होती है तो कुसमा का बाप गजोदर की ओर बीस हजार रूपये फेंक करके कुसमा का पिंड छुडाने का डायलाग बोल कर दर्शकों की वाहवाही लूटता है। इटावा कलेक्ट्रेट में एसएसपी कार्यालय और उनकी गाड़ी का भी इस्तेमाल किया गया, जहां पर उनके कार्यालय में बैठ कर फिल्मी एसएसपी की शूटिंग की गई है।

दशकों से सिनेमाई फिल्मकारों के आकर्षण का केंद्र रही है चबल घाटी, यहां पर सैकड़ों की तादात में डकैतों की जिंदगी से जुड़ी हुई फिल्मों का निर्माण हो चुका है। बीहड़ का अपना एक अलग ही लुक होता है, इसी वजह से फिल्मकार बीहड़ का मोह आज तक नहीं छोड़ पाये हैं। बीहड़ नाम की इस फिल्म में एक ऐसे सीन को फिल्माया जा रहा है, जिसे आज तक डाकुओं की किसी दूसरी फिल्म मे नहीं फिल्माया गया है। यह सीन है फूलन देवी के बेहमई कांड के बदले में किये गये कुसमा नाइन नामक महिला डकैत के मई अस्ता गांव में खूनी नरसंहार का। बेहमई कांड जहां 14 फरवरी 1981 को हुआ, वहीं मई अस्ता कांड 23 मई 1984 को बेहमई कांड के बदले स्वरूप किया गया है। बेहमई कांड में जहां फूलन देवी ने 22 ठाकुरों को मौत के घाट उतारा, वहीं कुसमा नाइन ने बेहमई कांड का बदला लेने के लिये 14 मल्लाहों को मौत के घाट उतार दिया। बेहमई कांड कानुपर देहात के राजपुर के इलाके में हुआ था, तब बेहमई वारदात के समय कानपुर देहात अस्तित्व मे नहीं था। वहीं मई अस्ता कांड आज के औरैया जिले के अयाना इलाके के मईअस्ता गांव मे हुआ। वारदात के समय औरैया जिला अस्तित्व मे नहीं था, तब इटावा जिले की औरैया तहसील हुआ करती थी। पुतली बाई के बाद कुसमा नाइन को चंबल की खूंखार दस्यु सुंदरी के रूप मे जाना जाता है। कुसमा नाइन ने संतोष और राजबहादुर नाम के मल्लाह बिरादरी के दो युवको की आंखे निकाल कर कूरता का एक नमूना पेश किया था।

लेखक दिनेश शाक्‍य इटावा में टीवी पत्रकार हैं.

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