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नेपाल में जारी है अधिकार का जंग

श्रीराजेशबीते सप्ताह मैं बिहार में था. वहीं मेरे एक अंतरंग मित्र मुझसे मिलने आएं. बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने हाल के नेपाल टूर के बारे में बताया और वहां मोबाइल से लिए गए कई फोटोग्राफ्स दिखाए, साथ कुछ वीडियो क्लीप भी दिखाया. मेरे उस मित्र के बदले यदि कोई दूसरा उन फोटोग्राफ्स या वीडियो को दिखाता तो मैं निश्चित तौर पर कहता कि ये सभी फोटोग्राफ्स या वीडियो बिहार के ही किसी गांव के हैं. लेकिन मैं जानता था कि मेरे मित्र वास्तव में नेपाल गए थे और मोबाइल से तस्वीरें लेना उनका शौक है. उसी वीडियो क्लीपिंग में मैंने कुछ महिलाओं को छठ का गीत गाते हुए समूह में बढ़ते देखा. ये दृश्य नेपाल के चितवन जिले के तेजापुर के तालाब के किनारे का था. इसी तरह एक और क्लीपिंग में प्यार हो गइल ओढ़निया वाली से… गीत पर थिरकते नेपाली किशोर दिखे, उन्होंने बताया कि यह दृश्य रौतहट जिले के रघुनाथपुर में एक पान की दुकान के सामने का है. दरअसल, भारत-नेपाल का संबंध सिर्फ एक पड़ोसी मुल्क का ही नहीं है और न ही दोनों देशों में बीच केवल सांस्कृतिक साझापन ही है, बल्कि बहुत कुछ अनकहा, अनदेखा और अनछुए अनुभव, भावनाएं हैं जो दोनों देशों को एकाकार करते हैं. बावजूद इस एकात्मकता के कभी-कभी कुछ अवारा हवाएं बहुत कुछ हिला जाती हैं, लेकिन उखाड़ नहीं पाती.

श्रीराजेश

श्रीराजेशबीते सप्ताह मैं बिहार में था. वहीं मेरे एक अंतरंग मित्र मुझसे मिलने आएं. बातचीत के क्रम में उन्होंने अपने हाल के नेपाल टूर के बारे में बताया और वहां मोबाइल से लिए गए कई फोटोग्राफ्स दिखाए, साथ कुछ वीडियो क्लीप भी दिखाया. मेरे उस मित्र के बदले यदि कोई दूसरा उन फोटोग्राफ्स या वीडियो को दिखाता तो मैं निश्चित तौर पर कहता कि ये सभी फोटोग्राफ्स या वीडियो बिहार के ही किसी गांव के हैं. लेकिन मैं जानता था कि मेरे मित्र वास्तव में नेपाल गए थे और मोबाइल से तस्वीरें लेना उनका शौक है. उसी वीडियो क्लीपिंग में मैंने कुछ महिलाओं को छठ का गीत गाते हुए समूह में बढ़ते देखा. ये दृश्य नेपाल के चितवन जिले के तेजापुर के तालाब के किनारे का था. इसी तरह एक और क्लीपिंग में प्यार हो गइल ओढ़निया वाली से… गीत पर थिरकते नेपाली किशोर दिखे, उन्होंने बताया कि यह दृश्य रौतहट जिले के रघुनाथपुर में एक पान की दुकान के सामने का है. दरअसल, भारत-नेपाल का संबंध सिर्फ एक पड़ोसी मुल्क का ही नहीं है और न ही दोनों देशों में बीच केवल सांस्कृतिक साझापन ही है, बल्कि बहुत कुछ अनकहा, अनदेखा और अनछुए अनुभव, भावनाएं हैं जो दोनों देशों को एकाकार करते हैं. बावजूद इस एकात्मकता के कभी-कभी कुछ अवारा हवाएं बहुत कुछ हिला जाती हैं, लेकिन उखाड़ नहीं पाती.

ऐसी कई घटनाएं अतीत में देखी गई है. यह घटना पुरानी जरुर है लेकिन स्मृति पटल पर अब भी बरकरार है- जब राजशाही के खात्मे के बाद वहां चुने गये देश के पहले उपराष्ट्रपति परमानंद झा ने पद व गोपनीयता की शपथ हिंदी में ली थी तो पूरे देश में इसे ले कर विवाद उभरा. मामला नेपाली सुप्रीम कोर्ट में गया और 13 महीने बाद 24 जुलाई 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि झा फिर से उपराष्ट्रपति पद की शपथ नेपाली में लें. हालांकि झा ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए इसे नेपाल के गैर नेपाली भाषी लोगों का अपमान बताया.

उसी तरह नेपाल के पवित्र हिंदू मंदिर पशुपतिनाथ में भारतीय पुजारियों की नियुक्ति के मामले पर भी भारी विवाद हुआ था. अगस्त, 2009 में मंदिर का संचालन करने वाली पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट ने दक्षिण भारतीय मुख्य पुजारी महाबलेश्वर भट्ट के नेतृत्व में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया, जिन्हें दो नये पुजारियों के नाम के बारे में सुझाव देना था. हालांकि माओवादियों ने इसका विरोध करते हुए चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा हुआ तो पूरे नेपाल में उग्र प्रदर्शन किए जाएंगे. सत्तासीन माओवादी नीत सरकार ने एक नया कानून बना कर नेपाली पुजारियों की नियुक्ति को मंजूरी दी थी. इस नियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती भी दी गई. उल्लेखनीय है कि मंदिर में भारतीय पुजारियों के रखे जाने की 300 साल पुरानी परंपरा रही है. यूं तो ये नेपाल के आंतरिक मामले हैं और कहा गया कि इनका भारत से क्या लेना-देना? लेकिन सच्चाई यह है कि ये दोनों मामले आपस में जुड़े हुए हैं. यह नेपाल के कुछ कट्टरपंथियों का भारत पर सीधा प्रहार था. बावजूद इसके नेपाल में वह पारंपरिक नेपाल-भारत साझापन अटूट बना रहा. जिसकी बानगी के रूप में उपरोक्त वीडियो क्लीपिंग है.

वास्तव में नेपाल में भोजपुरी, मैथिली बोलने वाले लोग जिनकी संपर्क भाषा हिंदी है, वे मधेशी कहलाते हैं. नेपाल के भोजपुरिया जिलों- रौतहट, बारा, पर्सा, चितवन, नवलपरासी और रूपंदेही में तकरीबन 2.5 लाख भोजपुरी भाषी है, जो नेपाल की कुल आबादी का 9 प्रतिशत है. त्रिभुवन विश्वविद्यालय के सीएनएएस के एक अध्ययन रिपोर्ट के 14 वें अंक के मुताबिक नेपाल में मैथिली भाषी 11.1 प्रतिशत, भोजपुरी भाषी 9.5 प्रतिशत और थारू भाषी 3.6 प्रतिशत हैं.

इतनी बड़ी आबादी को ध्यान में रखते हुए स्थानीय रेडियो स्टेशनों में कुछ रेडियो स्टेशन भोजपुरी में समाचार व मनोरंजन सामग्री का प्रसारण कर रहे हैं. भोजपुरी के लोकप्रिय नेपाली रेडियो स्टेशेनों में गदीमाई एफएम, इंद्राणी एफएम, विजय एफएम, रुपंदेही एफएम. समयक एफएम, रेडियो बीरगंज, नारायणी एफएम, मस्ती एफएम, नोबेल एफएम, कादंबरी एफएम, रौतहट एफएम, गौर एफएम, रेडियो नमस्ते और मध्यविंदु एफएम शामिल है. इनमें से लगभग सभी एफएम या रेडियो स्टेशन दैनिक समाचार का प्रसारण करते हैं, वहीं नेपाल में भोजपुरी में पांच समाचार पत्रों का प्रकाशन भी हो रहा है. हालांकि इनकी प्रसार संख्या बहुत कम है.

दूसरी ओर पिछले कुछ सालों से नेपाल के मधेशी हमेशा अखबारों की सुर्खियों में रहे हैं. सवाल है कि ये मधेशी है कौन? मधेशी शब्द संस्कृत के ‘मध्य प्रदेश’ से निकला है, जिसका अर्थ है बीच का देश. चूंकि यह बोली तिरहुत की मैथिली और गोरखपुर की भोजपुरी के बीचवाले स्थानों में बोली जाती है, अत: इसका नाम मधेशी पड़ गया. यह बोली मुख्यत: बिहार के चंपारण जिले में बोली जाती है और इसकी लिपि ‘कैथी’ है. इसी तरह ‘थारू’ लोग नेपाल की तराई में रहते हैं. ये उत्तरप्रदेश के बहराइच से चंपारण तक फैले हैं और भोजपुरी बोलते हैं. यह विशेष तौर से उल्लेखनीय है कि गोंडा और बहराइच जिले के थारू लोग भी भोजपुरी बोलते हैं जबकि वहां की भाषा अवधी है. भारत में अंग्रेजों के शासन काल में इस पट्टी से भारी संख्या में लोग नेपाल के तराई क्षेत्रों में गये.

इसके पूर्व भी भारत-नेपाल के शाही परिवारों में बेहतर तालमेल होने की वजह से भी लोगों का आना-जाना और बस जाना जारी रहा. इसी क्रम में भारी संख्या में मोतीहारी से लेकर बहराइच तक के लोग नेपाल के तराई क्षेत्र में जा बसे और उसी तरह भारी संख्या में नेपाली भारत के विभिन्न हिस्सों में आ कर बसे. मधेशियों की बड़ी संख्या से तराई क्षेत्र बिहार और उत्तर प्रदेश के हिस्से जैसे लगते हैं. इन सबके बावजूद भारतीय मूल के मधेशी आज भी नेपाल की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए जंग कर रहे हैं. नेपाल की कुल 2.30 करोड़ आबादी में से मधेशियों की संख्या 1 करोड़ से भी अधिक मानी जाती है. विभिन्न इलाकों में इनके पचास से अधिक संगठन कार्यरत हैं. पड़ोसी यूपी तथा बिहार के नागरिकों को उन्होंने 1857 से 1947 के बीच लगातार आजादी के जंग में मदद की. नेपाल में आज भी 40-45 लाख मधेशी लोग नागरिकता से वंचित हैं. लोकतंत्र के नए झोंके में भी मधेशी लोग बहुत सहज नहीं हो सके क्योंकि अरसे से वे माओवादियों के निशाने पर भी रहे हैं. नेपाल की आबादी में करीब 51 फीसदी होकर भी वे यूपीवाले या बिहारी नाम से पुकारे जाते हैं. हिंदी के साथ नेपाल की तराई में मैथिली, भोजपुरी, अवधी तथा थारू बोली जाती है. मधेशी इलाका नेपाल के कुल क्षेत्रफल का 21 फीसदी है और यही इलाका नेपाल का अन्न भंडार भी है.

मधेशियों को नेपाल की मुख्यधारा में ईमानदारी से जोडऩे की कोशिश के तहत 2007 में तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला ने बातचीत की गुंजाइश बनाई थी. लेकिन इतने समय बीतने के बाद इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं हुई. कुछ मिला कर यह नेपाली माओवादियों के ऊपर निर्भर है. गौरतलब है कि नेपाल में मधेशियों की सामाजिक संरचना बिहार तथा यूपी पर आधारित हैं. मधेशी लोगों में वैसी ही जाति व्यवस्था है. भारत तथा नेपाल के बीच खुली सीमा होने के कारण पुराने जमाने से ही इन भारतीय राज्यों के लोगों से मधेशियों के शादी-ब्याह के रिश्ते रहे हैं. धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन में भी शायद ही कोई फर्क दिखाई देता हो. लेकिन मधेश या तराई की राजकीय व्यवस्था पर शुरू से ही पहाडिय़ों का एकछत्र अधिकार रहा है. वे अब काफी तादाद में यहां बस गए हैं. राजकीय व्यवस्था में मधेशी हर जगह उपेक्षित हैं और पहाड़ी सम्मानित.

एक तरह से नेपाल में मधेशियों या फिर भोजपुरी भाषियों की भारी संख्या को देखते हुए भोजपुरी का बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन यह समुदाय नेपाल में एक बड़ी शक्ति होने के बावजूद उपेक्षित है, नेपाली सेना में मधेशियों की भर्ती पर शुरू से ही अघोषित रोक रही है. नेपाली पुलिस में भी उनकी तादाद बेहद मामूली है. राजकीय व्यवस्था ने इस बात का पूरा इंतजाम कर रखा है कि उनका मनोबल गिरा रहे. हालांकि प्रशासनिक सेवा में उनकी स्थिति सेना और पुलिस के मुकाबले कुछ अच्छी जरूर है, लेकिन इसे न तो संतोषजनक कहा जा सकता है और न सम्मानजनक. प्रतिनिधि सभाओं में मधेशियों को उनकी आबादी के हिसाब से कभी सही प्रतिनिधित्व नहीं मिला.

70 के दशक से नागरिकता प्रमाणपत्र से वंचित होते-होते कोई 30 लाख मधेशी अपने ही देश में परायों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हो गए. अब वे न तो नौकरी के लिए आवेदन कर सकते थे और न ही जमीन-जायदाद खरीद-बेच सकते थे. शुक्र है कि कम से कम नेपाली राज्य ने इस समस्या को गंभीरता से लिया. ऐसा नहीं कि मधेशी समुदाय ने नेपाल में अपना स्तर सुधारने की कोशिश नहीं की. 1950 के दशक से ही (जब वेदानंद झा के नेतृत्व में तराई कांग्रेस की स्थापना हुई थी) मधेशी राजकीय सुविधाओं के सही बंटवारे की मांग करते रहे हैं. 1959 के पहले आम चुनाव में तराई कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत पाई. 1980 के दशक में मधेशियों की मांगें उठाने के लिए गजेंद्र नारायण सिंह की अगुआई में पहले नेपाल सद्भावना परिषद और फिर नेपाल सद्भावना पार्टी का गठन हुआ. 1991, 1996 तथा 1999 में हुए तीनों आम चुनावों में नेपाल सद्भावना पार्टी ने अपनी संसदीय उपस्थिति दिखाई. दुर्भाग्यवश सीटों की तादाद काफी कम रही. लेकिन इसके बाद से मधेशियों के पक्ष में एक राजनैतिक बयार बहने लगी. पिछले चार चुनावों में मधेशी नेकपा एमाले के लगभग दो सौ सांसदों के मतदान से बाहर रहने की वजह से सर्वाधिक 238 मत मिलने के बाद भी कामरेड प्रचंड प्रधानमंत्री नहीं बन सके. पिछले 30 जून को एमाले पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल के त्यागपत्र के बाद वहां प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव अपरिहार्य हो गया. नये प्रधानमंत्री के चुनाव के लिए 21, 23 जुलाई, 2 और 6 अगस्त को चुनाव हुआ, लेकिन इसके लिए 601 सदस्यों का आधा अर्थात 301 सांसदों का समर्थन कोई नहीं जुटा सका, इसलिए 14 अगस्त को वहां पांचवीं बार चुनाव हुए.

इसके बाद 86 सांसदों वाले मधेशी फोरम को पटाने की रणनीति शुरू हुई. बदले राजनीति माहौल को देखते हुए अब नेकपा माओवादी नेपाल में रहने वाले एक करोड़ भारतीय मूल के नेपाली अर्थात मधेशियों को पटाने का सभी अस्त्र इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके मद्देनजर भारत विरोध के लिए जगजाहिर प्रचंड की नेकपा माओवादी पार्टी अब अपने कूटनीतिक बयान से दिल्ली को दोस्ती का नया संकेत दे रही है. इसके अलावा मधेशी दलों के स्वायत्त प्रदेश की मांगों पर गंभीरता से विचार शुरू हो गया है. जो बता रहा है कि नेपाल में उपेक्षित भोजपुरिया या मधेशी समुदाय अपनी ताकत से अपना अधिकार लेने में सफल हो रहे हैं.

लेखक श्रीराजेश पत्रकार हैं तथा हिंदी साप्‍ताहिक द संडे इंडियन में कार्यरत हैं.

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