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नोटबंदी ने निखारा राहुल गांधी का नेतृत्व!

-निरंजन परिहार-

मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने देश में और भले ही कुछ किया हो या नहीं, लेकिन कांग्रेस को सबसे सक्रिय पार्टी की शक्ल जरूर बख्श दी है। संसद चल नही पा रही है। इससे राहुल गांधी की राजनीति को लगातार चमकने का मौका मिल गया है। राज्यों में भी कांग्रेस जमकर प्रदर्शन कर रही है और जिलों तक में कांग्रेस संगठन सक्रिय हो रहे हैं। देश देख ही रहा है कि 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार के नोट बंद करने का ऐलान किया, उस दिन से आज एक महीने तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सबसे ज्यादा सक्रिय दिखे हैं। संसद में विपक्षी पार्टियों के विरोध का नेतृत्व भी राहुल गांधी ही कर रहे हैं। उन्ही की पहल पर सभी विरोधी सांसदों ने प्रदर्शन किया।

-निरंजन परिहार-

मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने देश में और भले ही कुछ किया हो या नहीं, लेकिन कांग्रेस को सबसे सक्रिय पार्टी की शक्ल जरूर बख्श दी है। संसद चल नही पा रही है। इससे राहुल गांधी की राजनीति को लगातार चमकने का मौका मिल गया है। राज्यों में भी कांग्रेस जमकर प्रदर्शन कर रही है और जिलों तक में कांग्रेस संगठन सक्रिय हो रहे हैं। देश देख ही रहा है कि 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार के नोट बंद करने का ऐलान किया, उस दिन से आज एक महीने तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सबसे ज्यादा सक्रिय दिखे हैं। संसद में विपक्षी पार्टियों के विरोध का नेतृत्व भी राहुल गांधी ही कर रहे हैं। उन्ही की पहल पर सभी विरोधी सांसदों ने प्रदर्शन किया।

साफ दिख रहा है कि बीते एक महीने में राहुल गांधी के नेतृत्व में निखार आया है। नोटबंदी के मामले में राहुल ने केंद्र सरकार के विरोध की कमान बहुत जोरदार ढंग से संभाली है। देखा जाए, तो पश्चिम बंगाल की सीएम की ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल अपने मुख्यमंत्री होने के अहंकार की वजह से राहुल गांधी के नेतृत्व को नहीं मान रहे हैं। लेकिन बाकी पार्टियां पूरी तरह से राहुल गांधी के साथ हैं। वैसे, संसद से बाहर भले ही ममता और केजरीवाल राहुल गांधी को सार्वजनिक तौर पर नोटबंदी के विरोध की मुहिम का नेता स्वीकार नहीं कर रहे हैं। लेकिन संसद के भीतर और संसद भवन परिसर में तो ममता का पार्टी तृणमूल कांग्रेस और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी उनका साथ देने को मजबूर है। सांसदों के प्रदर्शन के बाद सभी पार्टियों की ओर से मीडिया को भी राहुल गांधी ने ही संबोधित किया। साफ देखा जा सकता है कि नोटबंदी के बाद राहुल गांधी के तेवर में निखार आया है और बहुत लंबे समय से सुषुप्त अवस्था में पड़ी कांग्रेस को जैसे संजीवनी मिल गई है।

प्रदेशों की बात करें, तो राहुल गांधी के कहने पर मुंबई में भी संजय निरुपम ने नोटबंदी के खिलाफ जो विशाल मोर्चा निकाला वह कांग्रेस की मजबूती देखने के लिए काफी था। राजस्थान में भी सचिन पायलट के नेतृत्व में नोटबंदी के खिलाफ जिला स्तर पर प्रदर्शन हुए, तो सोई पड़ी कांग्रेस में एक बार फिर से जान आ गई। देश भर में इसी तरह कांग्रेस ने प्रदर्शन किए। भले ही बीजेपी ने राहुल गांधी के बैंक व एटीएम की कतार में खड़े रहने को नौटंकी बताया, लेकिन राहुल गांधी ने इसके जरिए भी लोगों के दुख को समझा और कांग्रेस की जमीनी सक्रियता दिखाई। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी बताते हैं कि आमतौर पर जब लोकसभा दिन भर के लिए स्थगित हो जाती है, तो वे फिर दूसरे कार्यों में लग जाते हैं और पलटकर संसद नहीं आते। लेकिन बीते कुछ दिनों में वे कई बार दोहपर बाद भी संसद गए हैं। इसी सप्ताह उन्होंने संसद जाकर एक बार तो पार्टी नेताओं के साथ बैठक भी की। कांग्रेस के नेताओं की राय तो है ही, और देश भी देख ही रहा है कि नोटबंदी का विरकोध कर रही सभी पार्टियों में सिर्फ राहुल गांधी ही अकेले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने नोटबंदी से आम लोगों को हो रही परेशानी को हर स्तर पर सरकार के सामने रखकर जबरदस्त विरोध किया है। जबकि केजरीवाल चतुराई भरी बयानबाजी करकेसिर्फ  खबरों में रहने के कोशिश करते रहते हैं। कांग्रेस की कमानपूरी तरह हाथ में आ जाने के बाद राहुल गांधी के तेवर भी तीखे हुए हैं और इसी आधार पर वे नोटबंदी के विरोध की मुहिम के सबसे बड़े नेता के रूप में ऊभरे है। नोटबंदी से पहले समूची कांग्रेस जैसे सोई हुई थी, जिसे राहुल गांधी की विफलता से जोड़ा जा रहा था। लेकिन अब राहुल गांधी के सिर पर सभी विपक्षी पार्टियों का नेतृत्व करने की सफलता का सेहरा है। जिसका श्रेय कांग्रेस को कम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी को ज्यादा जाता दिख रहा है।

Niranjan Parihar
Senior Journalist
Mumbai
[email protected]

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