पत्रकार और पत्र की दुनिया! कितनी अजब है ये, आइये हम ले चलते है आपको इसी दुनियां में, इससे पहले हम आपको बता दें कि कुछ अंग्रेजी और हिन्दी के मिश्रित शब्दों की वजह से कैसे हुआ बेचारा एक पत्रकार। हम कर रहे हैं पत्रकार का शब्द विच्छेद। इसी तरह कुछ और शब्दों का यहां पर अर्थ का अनर्थ होते देखा जा सकता है। पर आप भ्रमित न हो, सिर्फ यह देखिये कि हो क्या रहा है। आधी इंग्लिस और आधी हिन्दी ने कैसे फेर दिया एक नौनिहाल पत्रकार के आशाओं पर पानी। यही है हिन्गलिश की जबानी? पत्र की दुनिया, कौतुहल चमक और ग्लैमर आदि से भरपूर है। नवागन्तुक यहीं सोचता है न, यहां आज के परिदृश्य में पत्रकार का अर्थ शायद बेचारे को यही समझ में आया।
आइये हम चलते हैं पत्र की दुनिया में, जहां पत्र के साथ आकार मिलेगा और आप बन जायेंगे पत्रकार। यह आकार क्या है? इसी के इर्द-गिर्द घूमता है पत्रकार, जिसे चाहिए पत्र यानी चिट्ठी, आकार यानी ढांचा और कार यानी कि वाहन, अब चिट्ठी की लें तो आप मानिए चेक, रुपया, ढॉंचा को लेते हैं तो समझ जायें एक घर या बंगला और कार की माने तो कार ही होगी न! जिन्हें शौक होता हैं, जिन्हें जुनून होता है, जिन्हें लिखना आता है और जिन्हें समाचार सूंघने की क्षमता होती है, वे बन सकते हैं समाचारदाता या संवाददाता। इन्हीं दो शब्दों पत्रकार एंव संवाददाता के कारण आपको मिल सकता है यश और ख्याति नाम और धन। इन्हीं सब के लिए प्रयास करते हैं पत्रकार बनने के पहले हमारे श्रीमान जी। देखते है कि किस तरह करते है श्रीमान जी पत्रकारिता में जाने के लिए क्रिया-कर्म।
अब तो श्रीमान जी इतना तो समझ ही गये होंगे कि इतना सब पाने के लिए कुछ तो खर्च करना ही पड़ता है। आप ऐसे ही पत्रकारिता में नहीं जा सकते सो उसके लिए आपको सबसे पहले चाहिए पत्रकारिता में डिग्री या डिप्लोमा। घबराइये नहीं, यह आसान है आप पैसे खर्च करो और ले लो इन चीजों को। जी हां, क्यों कि यह साधना से नहीं आप को पैसे से मिलती सकती है, क्योंकि हम चीजों को आसानी से पैसे से खरीद सकते हैं न। हां पर इसके लिए पैसे थोड़े मोटे चाहिए। क्योकि आप कोई ऐसी-वैसी चीज थोड़े ही खरीद रहे हैं, ये पत्रकारिता है बन्धु।
श्रीमान जी कुछ जमीन, कुछ जेवर बेचकर और कुछ कर्ज लेकर तो डिग्री ले लिए। अब शुरू हो गई कैरियर को लेकर जद्दोजहद। शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी न, नहीं तो प्रक्टिकल नॉलेज कहां से आयेगा। अब तो आपको इन्टर्नशिप करनी ही पड़ेगी। कई नामी-गिरामी पत्र समूहों में उन्होंने अपना बायोडाटा भेज दिया, पर जबाब कहीं से नहीं आया। किसी जुगाड़ से एक छोटे-मोटे समूह में इन्टर्नशिप के लिए इंट्री मिल गई पर वहां भी पैसे चाहिए न, इन्टर्नशिप करवाने के लिए। श्रीमान जी ने वो भी किया, चार हफ्ते की इन्टर्नशिप को संस्थान ने तीन महीने की ट्रेनिंग बना दी वो भी बिल्कुल मुफ्त। जैसे-तैसे यह भी पूरा हो गया। इसी बीच श्रीमान जी ने अपना पीआर भी डेवलप कर लिया, दो-चार छुटभैये नेता और छोटे-मोटे सरकारी अफसर तो उन्हें जान ही गये।
अब श्रीमानजी ने जॉब के लिए अप्लाई भी कर दिया। कही से कोई रिस्पांस नहीं आया। तभी किसी तरह के जुगाड़ से फिर एक छोट-मोटे संस्थान ने उन्हें चान्स दे दिया। छोटा सा वेतन भी लग गया। श्रीमानजी खुश थे, चलो इंट्री तो हो गई। पहले ही दिन श्रीमान जी की मीटिंग संपादक महोदय से हुई। संपादक महोदय ने उन्हें थोड़े से पत्रकारिता के टिप्स भी सिखा दिये और समझाकर बोले- देखिए श्री मान जी! आप पढ़े-लिखे और समझदार है, आप के पास सम अचार लिखने और पकड़ने की क्षमता भी है, पर सम अचार से पैसे तो नहीं आते न, और पैसे नहीं आयेंगे तो सम अचार पत्र चलेगा कैसे? इसको चलाने और दौड़ाने के लिए घोड़ों की आवश्यकता तो पड़ेगी ही और इसका घोड़ा है विज्ञापन यानी ऐड। यदि इस विज्ञापन रूपी घोड़े की लगाम आपके हाथ में है तो आप रेस मे सरपट भागोगे, सो आप में सम अचार के साथ-साथ घोड़े दौड़ाने की क्षमता तो होनी ही चाहिए।
बेचारे श्रीमान जी हिन्दी-अंग्रेजी के मिश्रित वाक्यों को समझने में भूल कर गये। सम को कुछ और अचार को आम का अचार समझ गये। विज्ञापन को भूल गये, रेस लगाने के लिए घोड़ा याद आ गया। सोचे कि बात तो सही है बिना घोड़े के दौड़ कहां लग सकती है। घोड़ा तो मार्केट में है ही उसे सिर्फ लगाम ही तो लगाना हैं। फिर क्या सारी कमाण्ड हाथ में। श्री मान जी चढ़ गये घोड़े पर, लेकिन घोड़ा तो घोड़ा है न, बिदक तो जाता ही है। श्रीमान जी चढ़ते और गिरते ही रहे। साथ ही सम अचार का कुछ अचार भी तो चाहिए तभी तो पत्रकारिता मे चटपटा और चुटीलापन होगा। लेकिन घोड़ा तो घास खाता है न, अचार तो वह खायेगा नहीं। क्योकि इससे तो घोड़े का हाजमा ही बिगड़ जायेगा।
फिर भी श्रीमान जी को तो दोनों को साथ लेकर चलना ही पडे़गा। घोड़े पर सवार हो गये और अचार को रख लिया जेब में पुटकी बनाकर। अरे! पुटकी यानी कागज के टुकड़े और चल दिये सम अचार सूंघने। अपने नेटवर्क में सम्पर्क स्थापित किये, दस-पॉंच फोन कॉल किये, तभी किसी ने बताया कि सम अचार थाने में है। इसकी स्टोरी लिखनी है तो लिख लो। फटफटिया उठाये थाने पहुंचे, दरोगा से पूछा? क्या आपके पास सम अचार है? दरोगा ने मुंशी के पास भेज दिया। मुंशी बोला- अचार तो आया था पर वह खटाई बन कर दाल में चला गया है। यानी समझे, वह बड़े साहब के हाथ में है और बड़े साहब मिर्च-मसाले की डिमान्ड किये हैं। मिर्च-मसाला यानी कि पैसा-वैसा, सो आप उन्हीं से बात कर लो। श्रीमान जी बड़े साहब के पास पहुंचे। पूछे- क्या साहब आपके पास खटाई है क्या? थी तो, मगर वह तो दाल में मिल गई है और इसकी खबर हंडिया को भी है। बड़े साहब ने जवाब दिया। श्रीमान जी बोले, कोई बात नहीं हम सूंघ कर खटाई को अलग कर लेंगे आप दाल तो दिखा दे। क्योकि खटाई तो काली होती है न वह अलग ही नजर आ जायेगी।
देखिये जनाब! आप बेकार की कोशिश न करें अब तो यहां न अचार है न खटाई और न ही दाल। क्योकि दाल तो बहुत महंगी हो गई है, थोड़ी सी थी, पानी ज्यादा हो गया था तो खटाई ने पूरी दाल ही काली कर दी है। हां मैने मिर्च-मसाला मंगाया है। आ जाने दो थोड़ा सा तड़का लगा देते है फिर सारे ही मिल बांट कर खा लेंगे। उसी में भलाई भी है। हमारा भी पेट भर जायेगा और तुम्हारा भी। कहीं बन्दरबाट न हो जाये इसलिए चुप ही रहना अच्छा होगा। श्रीमान जी बैठ गये, मिर्च-मसाला भी आ गया। बड़े साहब ने तड़का लगाया, खटाई को चूस डाला और निकाल कर फेंक दिया और मिर्च-मसाले वाली सारी दाल खुद ही गटक गये। श्रीमान जी देखते ही रह गये। पेट भरा तो बड़े साहब में भी तैश आया, धमकाते हुए बोले- अब तुम जाओ यहां से। खटाई तो फेंक ही दी, अब वह अचार तो बनेगी नहीं। अब यहां न तो अचार है और न ही खटाई। पेड़ में फिर आम आने का इन्तजार करो, तभी अचार और खटाई फिर बनेगी। सम अचार बनने तक का इन्तजार करो एवं तब तक जाकर आराम करो।
बेचारे श्रीमान जी ने आग्रह किया- ठीक है साहब, मैं समझ गया फिर भी आप एक बाइट तो दे ही दीजिए। साहब ने फिर धमकाया- क्या बोले ! बाइट देकर मुझे अपनी डाइट थोड़े ही खराब करनी है। तुम्हें पता है आज कल बिना बरसात के भी कुकुरमुत्ते उग आते हैं। यानी कि नये-नये चैनल और अखबार वाले। सो तुम अकेले ही अभी जाओ जिस दिन हम दाल नहीं बनायेगे उस दिन खटाई ही नहीं हम तुम्हें अचार को ही दे देंगे। बेचारे श्रीमान जी मुंह लटकाये लौट चले सोचा चलो घोड़े को ही दौड़ा लेते है। कुछ तो कमान्ड हाथ में होगी। मार्केट में पहुंचे, इंट्रोडक्शन दिया, बोले- जनाब हमें घोड़ा चाहिए जिससे मैं अपने सम अचार पत्र को चला सकूं। यह हमारा सम अचार वाला पत्र है, आप इसमें घोड़ा दे दीजिए। व्यापारी भी तेज था, बोला- मेरा घोड़ा तो एग्रीमेन्टेड है और मैंने इसको दूसरे अस्तबल वाले को दे रखा है। सॉरी़.. आपको कैसे दे दूं। श्रीमान जी सॉरी को साड़ी समझ गये बोले- देखिए आप तो सॉरी हमें दे ही दीजिए मेरी बीवी पहन लेगी पर मुझे घोड़ा जरूर दे दीजिए। नहीं तो न तो मैं चल पॉउगा और न ही मेरा सम अचार ही दौड़ेगा। व्यापारी गुस्सा गया, बोला- भाग जा यहां से। लंगड़ा आदमी जब चलेगा नहीं तो घोड़ा क्या दौड़ायेगा।
थक हार कर बिचारे श्रीमान जी वापस आ गये। संपादक महोदय ने पूछा- क्यों भई पत्रकार महोदय, सम अचार और घोड़ा मिला। मुंह बनाये श्रीमान जी ने जवाब दिया, सर! अचार तो पेड़ में चला गया कुछ समय बाद ही मिलेगा और घोड़ा दूसरे के साथ रेस लगा रहा है। अब तो संपादक जी भी गुस्सा गये, बोले- ठीक है अब यहां से जाओ। न तो तुम्हारे पास समाचार है और न ही विज्ञापन सो इन सब को लेकर आओ तो नौकरी को फिर से पाओ, अब..जाओ। श्रीमान जी उनका मुंह ही ताकते रह गये। समझ में ही नहीं आया कि यह कुछ अचार और घोड़ा मांगने की बात बदल कैसे गई। लगी-लगाई नौकरी भी चली गई। हिन्गलिश फिर भी न समझ में आई। सारे अरमा डूब गण्। न मिला पैसा न घर और न ही कार। न हुआ पत्रकार बनने का सपना साकार।
लेखक राजेन्द्र प्रसाद दुबे अभिनव पेपर प्रोड्क्ट्स में जीएम ऑपरेशन के पद पर कार्यरत हैं.

