: महावीर चक्र विजेता रामउग्रह पांडेय का परिवार मुश्किल में : शहादत का कोई मोल नहीं गाजीपुर जिला प्रशासन के लिए : ‘ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख मे भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी..।’ पार्श्व गायिका लता मंगेश्कर का गाया गीत देश के लिए शहादत देने वालों की याद दिलाता है, मगर सन 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश के लिए अपनी जान गंवाने वाले महावीर चक्र विजेता शहीद रामउग्रह पाण्डेय की कुर्बानी शायद गाजीपुर के आला अधिकारी भूल गये है। अपनी शहादत देकर देश की रक्षा करने वाले शहीद का परिवार आज परेशान है। लगातार सरकारी उपेक्षा होने से नाराज शहीद रामउग्रह पांडेय की विधवा श्यामा देवी अब उस मेडल को ही वापस करना चाह रही हैं, जो हमेशा उनकी बेवसी और प्रशासन की उपेक्षा की याद दिलाता आ रहा है। सवाल है, क्या ऐसे ही मिलता है देश पर कुर्बान होने वाले शहीद के परिवार को सम्मान! तो फिर कौन अपने देश के लिए कुर्बानी देने को तैयार होगा?
जनपद गाजीपुर के जखनिया तहसील के ऐमावंशी गांव में 1 जुलाई 1942 को रामउग्रह पांडेय का जन्म हुआ था। उनके अंदर बचपन से ही देश सेवा करने का जज्बा था। इसी जज्बा के चलते युवा होते ही रामउग्रह पांडेय भारतीय सेना में भर्ती हो गए। सन 1971 में भारत-पाक लड़ाई के दौरान वे लांस नायक के पद पर पहुंच चुके थे। लांस नायक रामउग्रह पांडेय बिग्रेड आफ गार्ड बटालियन के एक सेक्शन का नेतृत्व कर रहे थे। उस दौरान दुश्मन सैनिक बंकरो मे छिप कर गोलाबारी कर रहे थे। रामउग्रह पाण्डेय जमीन पर रेंगते हुए आगे बढ़े और दुश्मनों के तीन बंकरो को हथगोले से ध्वस्त कर डाला। तीनों बंकरों में मौजूद दुश्मन सैनिकों का सफाया कर डाला लेकिन इस दौरान खुद भी घायल हो जाने के कारण वीरगति को प्राप्त हो गये। जिसके बाद तत्कालीन सरकार ने उन्हें मरणोपरान्त महावीर चक्र से नवाजा। जिस वक्त उक्त सम्मान को शहीद की विधवा ने ग्रहण किया उस वक्त श्यामा देवी महज 20 वर्ष की थी और उनकी गोद में थी महज एक साल की पुत्री संगीता।
रामउग्रह पांडेय की मृत्यु के पश्चात तत्कालीन सरकार ने उनकी विधवा श्यामा देवी को सहायता के नाम पर मात्र 1700रू और तीन बीघा बंजर जमीन दिया, जो अब जाकर खेती करने योग्य हुआ है। इसके अलावा रामउग्रह के परिवार को और कोई भी सरकारी सहायता अब तक नही मिली। इसके लिए श्यामा देवी कई मंत्री, नेता और अधिकारियों को पत्र भी लिख चुकी हैं, लेकिन कहीं भी कोई सुनवाई नही हुई। लगातार उपेक्षा से परेशान श्यामा देवी को पिछले 6 जून को तहसील कार्यालय में धरने पर भी बैठना पड़ा, बावजूद इसके अब तक कोई भी सरकरी सहायता नहीं मिल सका। इतना संघर्ष के बाद भी कोई सुनवाई न होने से आजिज श्यामा देवी महावीर चक्र के साथ ही सारे मेडल को वापस करने का ऐलान कर दिया है।
सन 1998 में तत्कालीन जिलाधिकारी राजन शुक्ला ने अपने प्रयास से शहीद रामउग्रह पांडेय के नाम पर एक पार्क बनवाया, जो आज उचित रखरखाव के अभाव में जंगल का रूप ले चुका है। सरकार से मिलने वाले सरकारी सुविधा की बात करें तो पास के ही गांव में परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के परिवार को अब तक दर्जनो नौकरी, पेट्रोल पम्प के साथ ही अनेको बार नकद रूपया देकर सम्मानित किया जा चुका है लेकिन इस शहीद के परिवार को कोई पूछने वाला भी नही। हम तुलना करके वीर अब्दुल हमीद के शहादत को की कीमत नहीं आंकना चाहते लेकिन रामउग्रह पांडेय के परिवार वालों का कहना है कि उनके भी परिवार को ये सारी सुविधाएं एक शहीद होने के चलते नहीं बल्कि अल्पसंख्यक होने के नाते सरकार की तरफ से मिली है। दूसरी ओर जब गांव के लोगो को मेडल वापस करने के ऐलान की जानकारी मिली तो वे लोग भी श्यामा देवी के इस कदम को सही बताया और दुख भी जताया।
दो शहीद सैनिक परिवारों के साथ दो तरह का व्यवहार काफी कुछ सोचने को बाध्य करता है। क्या दोनों की शहादत की कीमत अलग-अलग है या फिर घिनौनी राजनीति इसकी जड़ में है। गाजीपुर जनपद के आलाधिकारीयो के साथ ही केन्द्र व राज्य में बैठे लोगों को भी श्यामा देवी की बातों पर ध्यान देना चाहिए वरना जब इनका यह ऐलान हकीकत बनकर जब लोगों के सामने आ जायेगा, तब कोई भी जवान देश सेवा में शहीद होने की बात भी नही सोच सकेगा और कोई भी मां अपने लाल को देश की रक्षा करते हुए शहादत देने की बात नहीं करेगी।
लेखक अनिल कुमार गाजीपुर के निवासी और टीवी पत्रकार हैं.

