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पत्रकारिता की शोषणगाथा

राजीवपत्रकारिता में शोषण का गणित समझना आसान नहीं है, क्योंकि यहाँ रिपोर्टर को थोडा सा पैसा देकर समाचार-पत्र हजारों-लाखों की कमाई करता है, वो भी बड़े तरीके से. पूंजीवाद के शोषण का तंत्र बहुत ही संगठित और दिमागी शतरंजी चाल में चतुर तंत्र है. इस चतुर तंत्र के शोषण का आधार है असंगठित और सस्ता मानवीय श्रम, जिसके कामों का सहारा लेकर चंद चतुर लोगों का यह तंत्र करोड़ों कमाता है और ऐश की जिंदगी जीता है. भारत में हिन्दी पत्रकारिता के व्यापार क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे एक समाचार-पत्र में हो रहे शोषण के तरीके का ज़िक्र करना चाहूँगा. यह समाचार-पत्र अपने साथ एक टेब्लायडनुमा अखबार अलग से देता है, जिसमें स्थानीय भ्रष्टाचार की ख़बरें संसेशनल बनाकर छापी जाती हैं. इस छोटे से टेब्लायड का यहाँ के व्यवसायी, प्रशासनिक और राजनीतिक वर्ग में काफी खौफ है. इस टेब्लायड में काम करनेवाले अधिकांश रिपोर्टरों को हर छपे रिपोर्ट के लिए दो सौ से हज़ार रूपये के आसपास दिया जाता है. अस्थाई रूप में नौकरी करनेवाले उन रिपोर्टरों से जमकर काम लिया जाता है और नौकरी छिनने के खौफ से ये रिपोर्टर दिन-रात परेशान होकर काम करने को मजबूर होते हैं.

राजीव

राजीवपत्रकारिता में शोषण का गणित समझना आसान नहीं है, क्योंकि यहाँ रिपोर्टर को थोडा सा पैसा देकर समाचार-पत्र हजारों-लाखों की कमाई करता है, वो भी बड़े तरीके से. पूंजीवाद के शोषण का तंत्र बहुत ही संगठित और दिमागी शतरंजी चाल में चतुर तंत्र है. इस चतुर तंत्र के शोषण का आधार है असंगठित और सस्ता मानवीय श्रम, जिसके कामों का सहारा लेकर चंद चतुर लोगों का यह तंत्र करोड़ों कमाता है और ऐश की जिंदगी जीता है. भारत में हिन्दी पत्रकारिता के व्यापार क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे एक समाचार-पत्र में हो रहे शोषण के तरीके का ज़िक्र करना चाहूँगा. यह समाचार-पत्र अपने साथ एक टेब्लायडनुमा अखबार अलग से देता है, जिसमें स्थानीय भ्रष्टाचार की ख़बरें संसेशनल बनाकर छापी जाती हैं. इस छोटे से टेब्लायड का यहाँ के व्यवसायी, प्रशासनिक और राजनीतिक वर्ग में काफी खौफ है. इस टेब्लायड में काम करनेवाले अधिकांश रिपोर्टरों को हर छपे रिपोर्ट के लिए दो सौ से हज़ार रूपये के आसपास दिया जाता है. अस्थाई रूप में नौकरी करनेवाले उन रिपोर्टरों से जमकर काम लिया जाता है और नौकरी छिनने के खौफ से ये रिपोर्टर दिन-रात परेशान होकर काम करने को मजबूर होते हैं.

भ्रष्ट सामाजिक वर्गों का खौफ और रिपोर्टरों के अंदर नौकरी जाने का खौफ, दोनों के इस्तेमाल से यह यह समचार-पत्र करोड़ों कमाता है. सबसे पहले रिपोर्टरों को ऐसे भ्रष्टाचार की ख़बरें जुटाने को कहा जाता है. रिपोर्टर जितनी ख़बरें जुटाकर लाता है, सबके बारे में एक-एक डिटेल्स उसे बॉस को देना पड़ता है. मसलन, रिपोर्ट में मौजूद हर व्यक्ति के नाम, मोबाइल नम्बर, घर का पता आदि-आदि. रिपोर्ट जमा करने के बाद रिपोर्टर को आगे की पैसा कमाऊ पूंजीवादी साजिशों में शामिल नहीं किया जाता. उसे अगले रिपोर्ट के काम पर लगा दिया जाता है.

आगे का असली खेल उसके बाद शुरू होता है. बॉस और उसके ऊपर के बॉसों की चतुर चौकड़ी अब उन लोगों को फोन मिलाती हैं, जिनके खिलाफ रिपोर्टें उनके पास मौजूद हैं. समाचार-पत्र में छापने का खौफ दिखाकर उन भ्रष्ट लोगों से पैसों का सौदा तय होता है. यह सौदा हजारों, लाखों या करोड़ों में भी हो सकता है. जो पैसा नहीं देता, उसकी ख़बरें छापकर पैसा देने पर मजबूर कर दिया जाता है. पैसा पाने के बाद ख़बरों को दबा दिया जाता है. रिपोर्टर तब तक अगली ख़बरों की डिटेल्स ला चुका होता है और यह खेल निरंतर चलता रहता है. इस तरह, रिपोर्टर को थोड़े से पैसे देकर समाचार-पत्र करोड़ों कमाता है.

रिपोर्टरों के शोषण के तरीके का यह मॉडल इस तरह से काम करनेवाले हर समाचार-पत्र में प्रचलित है. ऐसे अनेक तरीके हैं, जिसके बारे में जानकार पत्रकारों को लिखना चाहिए. इस शोषणगाथा को वह शोषित रिपोर्टर भी जानता है और पत्रकार बिरादरी भी, लेकिन हिंदी पत्रकारिता में आने वाले नए बच्चों को ये मालूम नहीं है. वे इस क्षेत्र में आ तो जाते हैं, लेकिन इस शोषण तंत्र में एक बार फंसने के बाद या तो जिंदगी भर छटपटाते रहते हैं या इसी शोषण तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं या पत्रकारिता छोड़ देते हैं.

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. फिलहाल पत्रकारिता के अंदर-बाहर की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

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