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पत्रकारिता जगत में मठाधीशों का मकड़जाल

पत्रकारिता जगत में पत्रकारों के मठाधीश छोटे पत्रकारों पर रोब गालिब करते नहीं थक रहे हैं.  देखने में आ रहा है कि पत्रकार संगठन व समाचार पत्र समूह भी इन मठाधीशों के चलते अछूता भी नहीं रहे… जनपदों में समाचार पत्रों के कार्यालयों में गुटबाजी आम हो गयी है,  चाहे वह बड़े समाचार पत्र हो या मझोले,  सभी जगहों पर पत्रकार मठाधीश की तूती बोल रही है… यदि कोई छोटा पत्रकार इन कतिपय मठाधीशों के कहने पर नहीं चल रहा तो उसके खिलाफ मठाधीश रणनीति बनाने से नहीं चूक रहे हैं,  जिस वजह से छोटे पत्रकार समाचार पत्रों के कार्यालयों में घुटन महसूस कर रहे है.  वहीं समाचार समूह के जिम्मेदार लोग मठाधीशी प्रथा को समाप्त करने में अपने को असहाय महसूस कर रहे है, अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचार पत्रों में छोटे पत्रकारों का रहना मुश्किल हो जाएगा.

पत्रकारिता जगत में पत्रकारों के मठाधीश छोटे पत्रकारों पर रोब गालिब करते नहीं थक रहे हैं.  देखने में आ रहा है कि पत्रकार संगठन व समाचार पत्र समूह भी इन मठाधीशों के चलते अछूता भी नहीं रहे… जनपदों में समाचार पत्रों के कार्यालयों में गुटबाजी आम हो गयी है,  चाहे वह बड़े समाचार पत्र हो या मझोले,  सभी जगहों पर पत्रकार मठाधीश की तूती बोल रही है… यदि कोई छोटा पत्रकार इन कतिपय मठाधीशों के कहने पर नहीं चल रहा तो उसके खिलाफ मठाधीश रणनीति बनाने से नहीं चूक रहे हैं,  जिस वजह से छोटे पत्रकार समाचार पत्रों के कार्यालयों में घुटन महसूस कर रहे है.  वहीं समाचार समूह के जिम्मेदार लोग मठाधीशी प्रथा को समाप्त करने में अपने को असहाय महसूस कर रहे है, अगर ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचार पत्रों में छोटे पत्रकारों का रहना मुश्किल हो जाएगा.

यह सिलसिला शुरू भी हो चुका है जो अब आम होता जा रहा है.. फैजाबाद सहित उत्तर प्रदेश के तमाम जनपदों के समाचार पत्र के कार्यालयों में मठाधीशों का मकड़जाल फ़ैल सा गया है, नजीर के रूप में हरदोई जनपद के हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ व वहां के पत्रकार सुधीर अवस्थी व अन्य सहयोगी पत्रकारों की जंग सतह पर पहुंच गयी है,  जो कि पत्रकारिता जगत के लिए अच्छी खबर नहीं कही जा सकती.  कमोवेश यही हाल पत्रकार संगठनों का है, जहां पर मठाधीश पत्रकारों का राज़ चल रहा है. यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि राजनीतिक पार्टी की भांति पत्रकार संगठनों में भी पद की लालसा चरम पर पहुंच गयी है, जो एक बार पत्रकार संगठन का या प्रेस क्लब का पदाधिकारी हो जाता है, वो सांसद-विधायक की तरह वर्षों तक कुर्सी नहीं छोड़ना चाहता, शायद यही वजह है कि पत्रकार मठाधीशों की हनक में कोई कमी ना आये, इसीलिए मठाधीश के कहने में न रहने वाले पत्रकारों पर अपना दबाव कायम कर रखे हैं, जो जगजाहिर है.  यहाँ तक कि इन मठाधीशों का प्रभाव समाचार पत्र कर्यालयों में भी है,  जो प्रेस क्लब व एकांत में ऐसे पत्रकारों को चिन्हित कर समीक्षा करने में मशगूल रहते हैं कि किन पत्रकारों पर उनका चाबुक चलेगा. दिलचस्प तथ्य तो यह है कि पत्रकारों को कलम तो मिल गया है किन्तु कलम के लिए संघर्षरत हैं.

लेखक विनय प्रकाश सिंह ”लल्‍ला”  फैजाबाद में तरुण मित्र के पत्रकार हैं.

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