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पत्रकार बनने के लिए तय हो मानक

पंकजराजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.

पंकज

पंकजराजनीति के अपराधीकरण पर किये गए विभिन्न अध्ययनों के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ था, वह आज पत्रकारों के राजनीतिकरण पर भी सटीक बैठ रहा है. मोटे तौर पर विधानमंडलों में अपराधियों की बढ़ती संख्या का कारण यह था कि पहले नेताओं ने अपने प्रतिद्वंदियों को दुश्मन समझ उसे निपटाने के लिए किराए के लिए बाहुबलियों की मदद लेना शुरू किया. बाद में उन अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को लगा कि जब केवल ताकत की बदौलत ही सांसद-विधायक बना जा सकता है, तो बजाय दूसरों के लिए पिस्तौल भांजने के क्यू न खुद के लिए ही ताकत का उपयोग शुरू कर दिया जाय. फलतः वे सभी अपनी-अपनी ताकत खुद के लिए उपयोग करने लगे और ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक अपराधी ही अपराधियों की पैठ हो गयी. इस विषय पर वोहरा कमिटी ने काफी प्रकाश डाला है. तो अब चुनाव प्रणाली में नए-नए प्रयोगों के दौरान भले ही असामाजिक तत्वों पर कुछ अंकुश लगा हो लेकिन यह फार्मूला अब पत्रकारों ने भी अपनाना शुरू कर दिया है.

हाल तक पत्रकारिता के लिए भी पेड न्यूज़ चिंता का सबब बना हुआ था. लेकिन राडिया प्रकरण के बाद यह तथ्य सामने आया कि कलम को लाठी की तरह भांजने वाले लोगों ने भी यह सोचा कि अगर केवल कलम या कैमरे से ही किसी की छवि बनायी या बिगाड़ी जा सकती हो, तो क्यू न ऐसा काम केवल खुद की बेहतरी के लिए किया जाय? कल तक जो कलमकार नेताओं के लिए काम करते थे, अब वे नेता बनाने या पोर्टफोलियो तक डिसाइड करवाने की हैसियत में आ गए. अगर इस पर लगाम न लगाई गयी तो कल शायद ये भी खुद ही लोकतंत्र को चलाने या कब्जा करने की स्थिति में आ जाय. तो 2G स्पेक्ट्रम खुलासे ने यह अवसर मुहैया कराया है जब पत्रकारिता की सड़ांध को भी रोकने हेतु समय रहते ही प्रयास शुरू कर देना उचित होगा. यह सड़ांध केवल दिल्ली तक ही सिमटा नहीं है बल्कि कालीन के नीचे छुपी यह धूल, गटर के ढक्कन के नीचे की बदबू राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों तक बदस्तूर फ़ैली हुई है.

संविधान द्वारा आम जनों को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे ज्यादा उपभोग पत्रकारों को करने दे कर समाज ने शायद एक शक्ति संतुलन स्थापित करना चाहा था. अपने हिस्से की आज़ादी की रोटी उसे समर्पित कर के समाज ने यह सोचा होगा कि यह ‘वाच डाग’ का काम करते रहेगा. नयी-नयी मिली आज़ादी की लड़ाई में योगदान के बदौलत इस स्तंभ ने भरोसा भी कमाया था. लेकिन शायद यह उम्मीद किसी को नहीं रही होगी कि यह ‘डॉग’ भौंकने के बदले अपने मालिक यानी जनता को ही काटना शुरू कर देगा. हाल में उजागर मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है समाज में मीडिया की बढ़ती बेजा दखलंदाजी.

निश्चित ही कुछ हद तक मीडिया की ज़रूरत देश को है. लेकिन लोगों में पैदा की जा रही ख़बरों की बेतहाशा भूख ने अनावश्यक ही ज़रूरत से ज्यादा इस कथित स्तंभ को मज़बूत बना दिया है. यह पालिका आज ‘बाज़ार’ की तरह यही फंडा अपनाने लगा है कि पहले उत्पाद बनाओ फ़िर उसकी ज़रूरत पैदा करो. प्रसिद्ध मीडिया चिन्तक सुधीश पचौरी ने अपनी एक पुस्तक में ‘ख़बरों की भूख’ की तुलना उस कहानी ( जिसमें ज़मीन की लालच में बेतहाशा दौड़ते हुए व्यक्ति की जान चली जाती है ) में वर्णित पात्र से कर यह सवाल उठाया है कि आखिर लोगों को कितनी खबर चाहिए? तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ख़बरों की बदहजमी रोकने हेतु उपाय किया जाना समीचीन होगा.

शास्त्रों में खबर देने वाले को मोटे तौर पर ‘नारद’ का नकारात्मक रूप देकर उसे सदा झगड़े और फसाद की जड़ ही बताया गया है. इसी तरह महाभारत के कथानक में संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सबसे पहले आँखों देखा हाल सुनाने की बात आती है. लेकिन महाभारत में यह उल्लेखनीय है कि आँखों देखा हाल सुनाने की वह व्यवस्था भी केवल (अंधे) राजा के लिए की गयी थी. इस निमित्त संजय को दिव्य दृष्टि से सज्जित किया गया था. तो आज के मीडियाकर्मियों के पास भले ही सम्यक दृष्टि का अभाव हो. चीज़ों को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ कर, अपने लाभ-हानि का विचार करते हुए ख़बरों से खेल कर, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह के हिसाब से खबर बनाने, निर्माण करने की हरकतों को अब भले ही ‘पत्रकारिता’ की संज्ञा दे दी जाय. भले ही कुछ भी विकल्प न मिलने पर, अन्य कोई काम कर लेने में असफल रहने की कुंठा में ही अधिकाँश लोग पत्रकार बन गए हों, लेकिन आम जनता को आज का मीडिया धृतराष्ट्र की तरह ही अंधा समझने लगा है. तो ऐसी मानसिकता के साथ कलम या कैमरे रूपी उस्तरे लेकर समाज को घायल करने की हरकत पर विराम लगाने हेतु प्रयास किया जाना आज की बड़ी ज़रूरत है.

लोकतंत्र में चूंकि सत्ता ‘लोक’ में समाहित है, अतः यह उचित ही है कि ख़बरों को प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार रहे. लेकिन ‘घटना’ और ‘व्यक्ति’ के बीच ‘माध्यम’ बने पत्रकार अगर बिचौलिये-दलाल का काम करने लगे तो ऐसे तत्वों को पत्रकारिता से बाहर का रास्ता दिखाने हेतु प्रयास किये जाने की ज़रूरत है. जनता को धृतराष्ट्र की तरह समझने वाले तत्वों के आँख खोल देने हेतु व्यवस्था को कुछ कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है. कोई पत्रकार अपने ‘संजय’ की भूमिका से अलग होकर अगर ‘शकुनी’ बन जाने का प्रयास करे, षड्यंत्रों को उजागर करने के बदले खुद ही साजिशों में संलग्न हो जाय तो समाज को चाहिये कि ऐसे तत्वों को निरुत्साहित करे.

अव्वल तो यह किया जाना चाहिए कि हर खबर के लिए एक जिम्मेदारी तय हो. अगर खबर गलत हो और उससे किसी निर्दोष का कोई नुकसान हो जाय तो उसकी भरपाई की व्यवस्था होना चाहिए. इसके लिए करना यह होगा कि ‘पत्रकार’ कहाने की मंशा रखने वाले हर व्यक्ति का निबंधन कराया जाय. कुछ परिभाषा तय किया जाय, उचित मानक पर खड़े उतरने वाले व्यक्ति को ही ‘पत्रकार’ के रूप में मान्यता दी जाय. कुछ गलत बात सामने आने पर उसकी मान्यता समाप्त किये जाने का प्रावधान हो. जिस तरह वकालत या ऐसे अन्य व्यवसाय में एक बार प्रतिबंधित होने के बाद कोई पेशेवर कहीं भी प्रैक्टिस करने की स्थिति में नहीं होता, उसी तरह की व्यवस्था मीडिया के लिए भी किये जाने की ज़रूरत है. अभी होता यह है कि कोई कदाचरण साबित होने पर अगर किसी पत्रकार की नौकरी चली भी जाती है तो दूसरा प्रेस उसके लिए जगह देने को तत्पर रहता है. राडिया प्रकरण में भी नौकरी से इस्तीफा देने वाले पत्रकार को भी अन्य प्रेस द्वारा अगले ही दिन नयी नौकरी से पुरस्कृत कर दिया गया. तो जब तक इस तरह के अंकुश की व्यवस्था नहीं हो तब तक निरंकुश हो पत्रकारगण इसी तरह की हरकतों को अंजाम देते रहेंगे.

जहां हर पेशे में आने से पहले उचित छानबीन करके उसे अधिसूचित करने की व्यवस्था है वहाँ पत्रकार किसको कहा जाय यह मानदंड आज तक लागू नहीं किया गया है. आप देखेंगे कि चाहे वकालत की बात हो, सीए, सीएस या इसी तरह के प्रोफेसनल की. हर मामले में कठिन मानदंड को पूरा करने के बाद ही आप अपना पेशा शुरू कर सकते हैं. डाक्टर-इंजीनियर की तो बात ही छोड़ दें, एक सामान्य दवा की दुकान पर भी एक निबंधित फार्मासिस्ट रखने की बाध्यता है. कंपनियों के लिए यह बाध्यता है कि एक सीमा से ऊपर का टर्नओवर होने पर वो नियत सीमा में पेशेवरों को रखे और उसकी जिम्मेदारी तय करे. लेकिन बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप लेते जा रहे मीडिया संगठनों को ऐसे हर बंधनों से मुक्त रखना अब लोकतंत्र पर भारी पड़ने लगा है. चूंकि आज़ादी के बाद, खास कर संविधान बनाते समय पत्रकारों के प्रति एक भरोसे और आदर का भाव था. तो संविधान के निर्माताओं ने इस पेशे में में आने वाले इतनी गिरावट की कल्पना भी नहीं की थी. तो ज़ाहिर है इस तन्त्र पर लगाम लगाने हेतु उन्होंने कोई खास व्यवस्था नहीं की. लेकिन अब बदली हुई परिस्थिति में यह ज़रूरी है कि पत्रकारों के परिचय, उसके नियमन के लिए राज्य द्वारा एक निकाय का गठन किया जाय, अन्यथा इसी तरह हर दलाल खुद को पत्रकार कह लोकतंत्र के कलेजे पर ‘राडिया’ दलता रहेगा.

लेखक पंकज झा छत्‍तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

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