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पत्रकार भूखंड आवंटन में करोड़ों की जमीन का घोटाला होने का अंदेशा

नाथद्वारा : राज्य सरकार द्वारा पत्रकारों को भूखंड आवंटन हेतु पूर्व में उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई थी। नगरपालिका के बाबुओं द्वारा आवेदनों की जाँच के नाम फोरी लीपापोती कर जम कर मनमर्जी करते हुए 25 आवेदकों में से कई संपादको व पत्रकारों को नजरअंदाज कर नाथद्वारा के 4 पत्रकार व 3 अधिस्वीकृत पत्रकारों (राजसमंद के भी शामिल)के नाम करोडों रुपयों की कीमत वाली सुखाड़िया नगर की जमीन गोटियां डाल बाँट दी गई थी।

नाथद्वारा : राज्य सरकार द्वारा पत्रकारों को भूखंड आवंटन हेतु पूर्व में उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई थी। नगरपालिका के बाबुओं द्वारा आवेदनों की जाँच के नाम फोरी लीपापोती कर जम कर मनमर्जी करते हुए 25 आवेदकों में से कई संपादको व पत्रकारों को नजरअंदाज कर नाथद्वारा के 4 पत्रकार व 3 अधिस्वीकृत पत्रकारों (राजसमंद के भी शामिल)के नाम करोडों रुपयों की कीमत वाली सुखाड़िया नगर की जमीन गोटियां डाल बाँट दी गई थी।

पत्रकार भूखंड आवंटन में पिछली नगरपालिका में लिए गए गलत फैसले को वंचित आवेदकों द्वारा शिकायत कर देने पर एकबारगी तो पत्रावलियां रोक दुबारा आवेदनों की जाँच होनी थी। वह जाँच न तो कांग्रेस की पालिका करा सकी और न ही वर्तमान भाजपा की नगरपालिका और इसके जन सेवक । पूर्व विधिक सलाहकार ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए अपने हाथ बचाये रखे व कोई टिप्पणी नहीं की थी।

दुबारा जाँच अगर होती तो सब पोल खुल जाती सो दुबारा जाँच ही नहीं होने दी गई। लोकायुक्त में प्रकरण तत्कालीन आयुक्त शांतिलाल आमेटा के नामजद होंते हुए भी हौसले देखो साहब वर्तमान आयुक्त आमेटा भी दबाव में है और अपने पुराने कारनामों पर पर्दा डालते हुए पत्रकार भूखंड मामले को सदन में पास करवाने में लग गए। हालांकि अकेले यह उनका प्लान नहीं हो सकता – लाभान्वित वर्ग निरंतर दबाव बनाए रखे है और उपेक्षित वर्ग खुले आम चल रही लूट को मूकदर्शक की भांति देख रहा है। अगर वर्तमान विधिक सलाहकार की सलाह पर इतना बड़ा भ्रष्टाचार हो सकता है तो निःसंदेह कानून के प्रति श्रद्धा बढ़ती है और न्याय अन्याय की यह जंग अब 2 साल बाद ही सही न्यायालय की शरण में लड़ी जानी है।

अब तो खुल कर लूट मची है साहब ….. लगता है कि खुद नगरपालिका अध्यक्ष व आयुक्त मिलकर चंद बड़े बैनर वाले पत्रकारों से मीडिया मैनेजमेंट करते हुए अपने कारनामों पर पर्दा डालने में लग गए है। भ्रष्टाचार का यह शर्मनाक उदाहरण है। अध्यक्ष स्वयं दबाव झेल पाने में अब असमर्थ दिखाई दे रहे है। एक तरफ बड़े बड़े बैनर और उनके जमे पड़े पत्रकार चाहे उनके पास पहले से ही सारी व्यवस्थाएं हो – दूसरी तरफ छोटे छोटे दैनिक साप्ताहिक पाक्षिक अख़बार के संपादक व पत्रकार ।।। अब देखना यह है कि सत्यमेव जयते का आदर्श वाक्य कितना महत्त्व रखता है भ्रष्ट मानसिकता के सामने।

Kamal Kishor
[email protected]

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