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पत्‍नी और प्रेमिका भी शक के दायरे में जी रही हैं

जहाँ आज हम बात करते है महिला सशक्तिकरण की वहीं दूसरी ओर पुरुष के शक के दायरे में आ जाने से आज महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है. इधर कुछ दिनों में घटी घटनाओं ने दिल दहला कर रख दिया है और आज नारी पूरी तरह से कमज़ोर नज़र आ रही है. वो पत्नी हो या प्रेमिका सभी आज पुरुषों के शक के दायरे में जी रही हैं. आज नगर हो या महानगर सभी जगह इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है और रही बात शक की तो ये एक ऐसी बीमारी है,  जिसका कोई इलाज अब तक नहीं है. एक नारी होने के नाते मैं उस दर्द को बखूबी समझ सकती हूँ जिसके पति ने उसे कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला होगा. बीते कुछ दिनों पहले जौनपुर में भी एक ऐसी दर्द भरी दास्ताँ सुनने को मिली जिसमें पति द्वारा शक करने के कारण महिला ने ख़ुदकुशी कर ली थी.

जहाँ आज हम बात करते है महिला सशक्तिकरण की वहीं दूसरी ओर पुरुष के शक के दायरे में आ जाने से आज महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है. इधर कुछ दिनों में घटी घटनाओं ने दिल दहला कर रख दिया है और आज नारी पूरी तरह से कमज़ोर नज़र आ रही है. वो पत्नी हो या प्रेमिका सभी आज पुरुषों के शक के दायरे में जी रही हैं. आज नगर हो या महानगर सभी जगह इस बात की चर्चा ज़ोरों पर है और रही बात शक की तो ये एक ऐसी बीमारी है,  जिसका कोई इलाज अब तक नहीं है. एक नारी होने के नाते मैं उस दर्द को बखूबी समझ सकती हूँ जिसके पति ने उसे कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला होगा. बीते कुछ दिनों पहले जौनपुर में भी एक ऐसी दर्द भरी दास्ताँ सुनने को मिली जिसमें पति द्वारा शक करने के कारण महिला ने ख़ुदकुशी कर ली थी.

आज हमारा मीडिया, कई धारावाहिक सभी महिला उत्थान की बातें कर रहे हैं और दूसरी तरफ जाना माना शो इमोशनल अत्याचार ने इस शक के दायरे को और भी हवा दे दी है. उसमें बस यही दिखाया जा रहा है कि किस तरह से लोग अपने उस साथी की विश्वसनीयता का परीक्षण कराते हैं,  जिस पर उन्हें पिछले कुछ दिनों से सबसे ज्यादा भरोसा होता है, और रही बात उस शो की तो अभी तक शायद उनके यहाँ कोई ऐसा भाग नहीं दिखाया गया जिसमें वो इंसान अपने को सही साबित कर सके.

इधर कुछ दिनों में दिल्ली, नोएडा, गाज़ियाबाद, लखीमपुर जैसे बड़े नगरों में घटी कुछ घटनाओं ने मानों औरतों को बहुत ही ज्यादा कमज़ोर कर दिया है. आज माँ बाप अपनी बेटियों को पढ़ने या नौकरी करने के लिए कही भी दूर भेजने से डरते है. अगर यही स्थिति रही तो शायद आने वाला पल बहुत ही बुरा होगा. शायद मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी एक दिन ये समय आएगा जब पूरे देश की कमान सम्हालने वाली, अपने राज्य की मुख्यमंत्री, दिल्ली की मुख्यमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष सभी एक महिला हैं और इनके होते हुए भी आज महिला अपने ही देश, राज्य, शहर में पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. हर जगह तो छोड़िये खुद अपने परिवार में भी औरत आज सुरक्षित नहीं हैं. हर क्षेत्र में आगे होने के बावजूद भी आज महिला को पुरुष के वर्चस्व के आगे झुकना पड़ता है. इसके लिए मेरे हिसाब से खुद में महिला को मजबूत और समझदार होना पड़ेगा और सोचना होगा कि हम कर सकते हैं, तभी शायद हम आगे एक अच्छा, सुनहरा भविष्य देख पाएंगे.

लेखिका नेहा श्रीवास्‍तव वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्‍वविद्यालय की छात्रा हैं.

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