दतिया जायें तो वनमाली की मसाला चाय यानी की स्पाईस्ड टी जरूर पियें। अस्सी वर्षीय वनमाली आज भी शाम चार बजे पीतल की चाय गर्म रखने वाली चमचमाती चार टंकियों में चाय भर कर घर से निकलता है और रात आठ बजे तक प्रतिदिन नगर की परिक्रमा पूरी करके पांच सौ लोगों को चाय पिलाकर लौट आता है। वैसे तो अपरान्ह तीन बजे ही अंग्रेजों का टी टाईम हो जाता है पर हम भारतीयों के लिये तो चाय का कोई वक्त नहीं अर्थात हर वक्त कम से कम चाय तो ली ही जा सकेगी। दतिया के बाजार में दुकानदार चार बजते बजते चाय के लिये वनमाली का इंतजार प्रारंभ कर देते हैं। दरअसल चाय बेचने का सिलसिला वनमाली के पिता ने आजादी से पहले शुरू किया था। तब ब्रितानी चाय कंपनी अभियान चलाकर भारतीयों को चाय पिलाती थी ताकि भारत में भी चाय की ब्रिकी और उपयोग में वृद्धि हो। अपने पिता के इस काम को आगे बढ़ाने के लिये वनमाली ने अपनी सरकारी नौकरी भी छोड़ दी और 45 बरस पूर्व उसने नगर में चाय पिलाने का जो सिलसिला प्रारंभ किया वो आज भी बदस्तूर जारी है।
यह बात अलग है कि मिट्टी का कुल्हड़, जिसमें वह ग्राहक को चाय परोसता है, पहले से छोटा होता चला गया है। वनमाली के चाय उड़ेलते हुए हाथ कांपने लगे हैं किन्तु आज भी वो एक प्याला चाय मात्र दो रूपये में सुलभ करा रहा है। उसकी चाय में पानी, दूध के साथ लौंग, अदरक, जायफल, दालचीनी आदि का संतुलित मिश्रण रहता है। इसका खास स्वाद दतिया वालों की जबान को रास आ गया है। कई ग्राहक तो वनमाली की चाय को औषधि की तरह नियमित रूप से ग्रहण करते हैं।
चाय दरअसल प्राचीन भारत में औषधि के रूप में ही स्वीकार्य थी। सन 1830 में अंग्रेजों ने देखा कि भारत वर्ष के आसाम क्षेत्र में बरसों से उत्तम चाय पैदा होती है। तब ब्रिटेन चीन से चाय खरीदता था। चीन उन दिनों दुनिया भर में चाय बेचता था। ब्रिटेन में तो तब औसतन प्रति व्यक्ति आधा सेर से भी अधिक चाय पत्ती की खपत होती थी। उन दिनों चीन देश का चाय पत्ती विक्रय पर एकाधिकार था। तभी भारत में एक अंग्रेजी कंपनी ने आसाम में चाय का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करवा दिया। सन 1870 आते-आते ब्रिटेन में आसाम की चाय पसंद की जाने लगी और सन 1900 में तो ब्रिटेन की कुल चाय पत्ती का 50 प्रतिशत भारत से और 33 प्रतिशत श्रीलंका से आने लगा। अंग्रेजी चाय कंपनी का भारत में उत्पादन लगातार बढ़ रहा था, उसने भारत सहित तमाम कॉमनवेल्थ देशों में चाय के उपयोग को बढ़ावा देने के लिये जन प्रचार अभियान प्रारंभ कर दिया।
जापान में तो वैसे भी चाय का विशेष सांस्कृतिक महत्व था। वहां चाय महोत्सव तक होते थे। परिणाम यह निकला कि आज चाय दुनिया में पानी के बाद सबसे अधिक पिया जाने वाला पेय बन चुकी है।
अंग्रेजों ने तो अपनी ही तरह से चाय, दूध और चीनी अलग अलग रखते हुए प्याले में मिलाकर पिलाना शुरू किया था। परंतु भारतीयों ने उसमें मसाला डालकर और फिर मलाई मारकर ऐसी चाय बनाना आरंभ कर दिया जो धीरे-धीरे साउथ एशिया और फिर विश्व के सभी देशों में पी जाने लगी। प्रारंभ में अंग्रेजी चाय कंपनी मसाला चाय के खिलाफ थी। उसे लगता था कि मसाला मिलाने से चाय की पत्ती के उपयोग की मात्रा प्रभावित होती है। इसलिये वे लगातार प्लेन टी की वकालत करते रहे और आज भी बहुत से लोग प्लेन टी पीना ही पसंद करते हैं। फिर भी भारतीय खुशबूदार मसाले और आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के मिश्रण से तैयार चाय भारत, बंगला देश, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की अपनी ही विश्व व्यापी पहचान बन गई है।
भारत के ग्रामीण इलाकों में आसाम की चाय विशेष पसंद की जाती है। कहीं दूध पानी के अनुपात का अंतर रहता है तो कहीं-कहीं खूब मीठा डालकर चाय पी जाती है। उनकी मीठे की पंसद भी अलग अलग है, कहीं गुड़, कहीं शक्कर कहीं खजूर का गुड़ और कहीं चाय में शहद भी डाला जाता है। लखनऊ के कई चाय वाले नमक की चुटकी चाय में डालकर उसे नमकीन कर देते हैं। मसालों में भी सबकी पसंद एक नहीं है कहीं जायफल, मुलेठी, दालचीनी, लौंग, अदरक, सौंफ के साथ-साथ जुशांदा वाली जड़ी बूटियाँ भी डाल दी जाती है। फिर अगर कश्मीर पहुँच जायें तो वहां बिना दूध पिश्ता, बादाम और केसर वाली हल्के रंग का कहवा अपना ही स्वाद देता है। पंजाब में जालन्धर पहुँच जावें तो वहां मलाई मारकर चाय पी जाती है। भारतीय हाइवे पर ट्रक ड्राईवर अधिक चाय पत्ती डलवाकर चाय को मीलों में नापने लगते हैं। इनके हिसाब से जितनी अधिक स्ट्रांग चाय उतनी अधिक दूरी तक चाय का असर।
शहर में नफासती लोग हरी अथवा सफेद चाय पत्ती का उपयोग करते हैं। उनकी चाय में दूध और चीनी की मात्रा भी कम रहती है। उनकी मसाला चाय में नीबू, गुलाब, जैसमीन सहित नाना प्रकार की चाय मंहगे टी बेग में मिलने लगी है। अमेरिका में तो कुछ लोग चाय में बर्फ डालकर पीने में ही आनंद लेते हैं।
वनमाली पुराने दिनों को याद करके सुनाते हैं कि उसने अंग्रेजों का जमाना देखा है। गामा पहलवान को दतिया छोड़कर जाते भी देखा है। फिर सन् 1947 में हिन्दुस्तानी सरकार आयी यानी अपनी सरकार आई। चुनाव दर चुनाव दतिया बदलता गया। वह भी पाँच बेटों और चार बेटियों का पिता बन गया। बस नहीं बदला तो उसका पुश्तैनी चाय का मसाला और चाय बेचने का यह सिलसिला। अब उसका बेटा संजय भी उसके काम में हाथ बंटाता है। चेहरे पर ईमानदारी की चमक और सन्तोष वाले वनमाली से विदा होते हुए एकएक मुझे पुरानी फिल्म सौतन का गीत ‘”शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है, इसीलिये मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पर बुलाया है'”…..याद आने लगा है।
लेखक सुभाष अरोड़ा पत्रकार हैं.

