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तेरा-मेरा कोना

पागल होना कोई आसान बात नहीं है

सुभाष राय: सुनो भाई साधो- 7 : मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो ना कोई, गाती हुई कब मीरा पगला गयी, उसे पता ही न चला। राजघराने की एक प्रेम छकी जवान लड़की गली-गली गाती, नाचती निकल पड़े तो बात-बात पर तलवार खींच लेने वालों को कैसे बर्दाश्त होगा। पर पागलपन जहर को भी मार सकता है, यह भी तो उन्हेंपता नहीं रहा होगा। उसने तो सूली ऊपर सेज सजा ली, अब क्या मरना, क्या डरना। वह जान गयी थी कि मिलन का एक ही रास्ता बचा है, खुद को मिटाना पड़ेगा। किसी ने नहीं समझा उस प्रेम दीवानी का दरद। हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय। कहते हैं दर्द जब हद से गुजर जाता है, तो दवा हो जाता है। मीरा का दर्द ही उसका कृष्ण बन गया। वह अपने भीतर ही पा गयी अपने प्रीतम को। कोई और कैसे समझ पाता उसका दर्द। जिसके भीतर उठा हो, वही तो समझेगा। जो पागल हुआ ही नहीं, वह एक पगली की पीड़ा कैसे समझेगा।

सुभाष राय

सुभाष राय: सुनो भाई साधो- 7 : मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरो ना कोई, गाती हुई कब मीरा पगला गयी, उसे पता ही न चला। राजघराने की एक प्रेम छकी जवान लड़की गली-गली गाती, नाचती निकल पड़े तो बात-बात पर तलवार खींच लेने वालों को कैसे बर्दाश्त होगा। पर पागलपन जहर को भी मार सकता है, यह भी तो उन्हेंपता नहीं रहा होगा। उसने तो सूली ऊपर सेज सजा ली, अब क्या मरना, क्या डरना। वह जान गयी थी कि मिलन का एक ही रास्ता बचा है, खुद को मिटाना पड़ेगा। किसी ने नहीं समझा उस प्रेम दीवानी का दरद। हेरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरो दरद न जाने कोय। कहते हैं दर्द जब हद से गुजर जाता है, तो दवा हो जाता है। मीरा का दर्द ही उसका कृष्ण बन गया। वह अपने भीतर ही पा गयी अपने प्रीतम को। कोई और कैसे समझ पाता उसका दर्द। जिसके भीतर उठा हो, वही तो समझेगा। जो पागल हुआ ही नहीं, वह एक पगली की पीड़ा कैसे समझेगा।

कोई रैदास हो तो कठौती में गंगा उतर सके, कोई कबीर हो तो राम को अपने पीछे चलने को मजबूर कर सके। ऐसे पगले अब कहां? मीरा के कानों में इन पगलों के शबद गूंजे और एक दिन भीतर उजियारा छा गया। दर्द छू-मंतर हो गया। जिसके लिए बेचैन थीं, उसको पाकर हंसी आ गयी। पानी बिच मीन पियासी, मोहि सुन-सुन आवत हांसी। पागल होना कोई आसान बात नहीं है। कोई नहीं होना चाहता। सब कुछ छोड़े बिना पागल होना संभव नहीं है। पागल हो गया तो सब कुछ छूट जायेगा। सब कुछ छोड़ दे तो पागल हो जायेगा। पर यहां तो सब कुछ पा लेने की होड़ मची है। धन, संपदा, यश, अधिकार, शक्ति और सत्ता का परम वैभव, परम भोग। जितना पकड़ में आ जाय, हर कोई समेटने में लगा हुआ है। साधन की परवाह नहीं। यही जीवन का युद्ध है, यही जीवन का प्यार भी। युद्ध और प्यार में सब कुछ जायज है। जैसे मिले, हासिल करो। कितना चाहिए, क्यों चाहिए, किसके लिए चाहिए, किसी को पता नहीं। कहां रखेंगे, कैसे संभालेंगे, यह सोचने की फुरसत नहीं। एक पागल को इससे क्या मतलब। वह तो चिथड़ा लपेटे, कभी-कभी नंगे गुजर जाता है, बड़बड़ाता हुआ आप के बिल्कुल पास से। वह किसी से शर्माता नहीं, लजाता नहीं। कभी रोता है, कभी गाता है, कभी मुस्कराता है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि लोग क्या कहेंगे। वह किसी की भी परवाह नहीं करता। सोचिये, इस खराब वक्त में भी कोई पागल हो जाय, दीवाना हो जाय तो? तो वह अपना कृष्ण गढ़ लेगा, जो करना चाहेगा कर लेगा। कोई भी बड़ा काम पागल हुए बगैर नहीं हो सकता।

जिनके सिर पर बड़ी उपलब्धियों के सेहरे सजे दिखते हैं, वे थोड़े-बहुत पगले जरूर होते हैं। बहुत सावधान रहकर, हानि-लाभ का गणित बिठाकर, जीवन-मृत्यु के बीच खड़ी आशंकाओं के खिलाफ तैयारी करके आगे बढ़ने वाले कभी शिखर पर नहीं पहुंचते। जो पाने-खोने की चिंता छोड़ दे, जो समय की गति से स्वयं को मु्क्त कर सके, जो हमेशा मृत्यु की देहरी पर खड़ा रहने की ठान ले, समझिये वह निर्भय हो गया। पागल होते ही सारा डर गायब हो जाता है। जो किसी भी तरह के भय से मुक्त हो गया, वही सच्चा पागल है। जब कोई पागल हो जाता है, अचानक वह जीवन के मूल उत्स से जुड़ जाता है, प्रकृति के सीधे संपर्क में आ खड़ा होता है। अंतरिक्ष का गुरुत्व उसकी मदद करने लगता है। जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि, आकाश की ऊर्जा उसके लक्ष्य और संकल्प को आकार देने में जुट जाती है। जब सभी सो रहे होते हैं, पागल जागता रहता है। या निशा सर्वभूतेषुं तस्याम जागर्ति संयमी। जो संयमी है, जो संकल्पवान है, जो एक बार कदम आगे बढ़ाकर पीछे नहीं लौटता, जो पराजित होना जानता ही नहीं, समझिये वह पागल है। उसको कोई मौसम डिगा नहीं पाता, उसको किसी तूफान का डर नहीं, उसे आसमान के टूटकर गिर पड़ने से कोई खतरा नहीं।

जब कोई पर्वत सी पीर पिघलती है, तब कहीं कोई पागल पैदा होता है। ऐसे पागल ही शोषण, दमन, अन्याय और अत्याचार के कठिन कुचक्र के खिलाफ तन कर खड़े हो सकते हैं। सच मानिये एक पागल के हाथ का पत्थर आसमान में सुराख कर सकता है, हिमालय से कोई नयी गंगा धरती पर उतार सकता है। सोचिये, ऐसे पागलों की एक दुनिया बन सके तो कैसी होगी। हो सकता है, उनके शरीर पर ठीक से कपड़े न हों, हो सकता है, उनके पेट भरे हुए भी न हों, हो सकता है, जीने लायक परिस्थितियां न हों, फिर भी सब खुश होंगे, किसी को किसी से गिला-शिकवा नहीं होगा, कोई किसी से कुछ छीनना नहीं चाहेगा, कोई किसी से कुछ पाना नहीं चाहेगा, सब अपनी धुन में मगन होंगे। मोहमुक्त, भयमुक्त, द्वेषमुक्त, निर्विघ्न गाते हुए। सभी पागल होंगे तो गाते-गाते चिल्लाने के मंजर कभी सामने नहीं आयेंगे। मैं ढूंढ रहा हूं एक मौका पागल होने का। मैं किसी भी समय पागल हो सकता हूं। दर्द से छटपटाते हुए और लोग भी हैंऔर दरद न जाने कोय वाले हालात भी हैं। फिर रस्ता क्या है, पागल होने के अलावा, पत्थर लेकर दौड़ पड़ने के अलावा।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.

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