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पिछड़ा वर्ग के अम्‍बेडकर थे अर्जुनसिंह

उमेश यादवसन 1975 तक मध्‍य प्रदेश की पचासी प्रतिशत जनता शासकीय एवं सत्ता का कोई भी कार्य कराने हेतु सामान्य समुदाय के व्यक्तियों पर निर्भर थी। सामान्य समुदाय के अधिकांश लोग ही चतुर्थ श्रेणी से लेकर उच्च शासकीय पदों पर आसीन थे। पिछडे वर्ग एवं दलित से तो प्रदेश स्तर पर गिने चुने ही प्रतिनिधि थे। सन 1977 से जनता पार्टी के शासन से ग्रामीण पिछड़े एवं दलित सत्ता में प्रथम बार सीधे भागीदार हुये। प्रदेश में वास्तव में यह भागीदारी 1980 में अर्जुनसिंह के कार्यकाल से प्रारंभ हुई, क्योंकि 1980 में पहली बार कांग्रेस से करीब 70 पिछडे़ वर्ग एवं आरक्षित वर्ग से ग्रामीण इलाकों के विधायक चुन कर आये। प्रथम बार आम जनता एवं सर्वहारा वर्ग के नेता आये। इनमें मुख्य रुप से सुभाष यादव, इन्द्रजीत पटेल, वंशीलाल धृतलहरे, चौधरी चंद्रभान सिंह आदि शामिल थे।

उमेश यादवसन 1975 तक मध्‍य प्रदेश की पचासी प्रतिशत जनता शासकीय एवं सत्ता का कोई भी कार्य कराने हेतु सामान्य समुदाय के व्यक्तियों पर निर्भर थी। सामान्य समुदाय के अधिकांश लोग ही चतुर्थ श्रेणी से लेकर उच्च शासकीय पदों पर आसीन थे। पिछडे वर्ग एवं दलित से तो प्रदेश स्तर पर गिने चुने ही प्रतिनिधि थे। सन 1977 से जनता पार्टी के शासन से ग्रामीण पिछड़े एवं दलित सत्ता में प्रथम बार सीधे भागीदार हुये। प्रदेश में वास्तव में यह भागीदारी 1980 में अर्जुनसिंह के कार्यकाल से प्रारंभ हुई, क्योंकि 1980 में पहली बार कांग्रेस से करीब 70 पिछडे़ वर्ग एवं आरक्षित वर्ग से ग्रामीण इलाकों के विधायक चुन कर आये। प्रथम बार आम जनता एवं सर्वहारा वर्ग के नेता आये। इनमें मुख्य रुप से सुभाष यादव, इन्द्रजीत पटेल, वंशीलाल धृतलहरे, चौधरी चंद्रभान सिंह आदि शामिल थे।

यह  सभी अर्जुनसिंह की टीम में शामिल थे। इसके बाद पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिये 1982-83 में श्री रामजी महाजन की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया, जिसमें पिछड़े वर्ग के बच्चों को शासन द्वारा छात्रवृति दी गयी एवं मिनी पीएससी में भी आरक्षण लागू किया गया। अर्जुनसिंह के कार्यकाल में ही त्रिस्तरीय पंचायतों का विधिवत चुनाव सम्‍पन्न हुआ एवं नगरीय क्षेत्रों में महापौर एवं अध्यक्षों का भी चुनाव हुआ। जिससे प्रदेश स्तर पर चुने हुये जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ी और प्रत्येक स्तर पर जनता के चुने नुमाइंदे बैठे, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों की सत्ता में भागीदारी बढ़ी और प्रदेश में सक्षम नेतृत्व प्रदान हुआ। इसी प्रकार अल्पसंख्यकों से संबंधित शिक्षा रोजगार में भी काम किया गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि देश स्वतंत्र होने के बाद देशहित में कांग्रेस ने नीतियां तो बनाईं मगर ग्रामीण क्षेत्र एवं पिछड़े वर्ग को नहीं जोड़ पाई, न ही इनको लाभ प्रदान किया गया। फिर मध्‍य प्रदेश में तो सन 1980 तक राजनीति में बडी शून्यता थी। चूंकि कांग्रेस दलितों को अपना बड़ा वोट बैंक मानती थी और वह वर्ग कांग्रेस के साथ भी था। मगर वास्तविक सत्ता चापलूस एवं अकर्मण्‍य लोगों के हाथों में थी। बाद में यह आक्रोशित वर्ग विकल्प उपलब्ध होने पर बसपा, जनता पार्टी, गोंडवाना गणतंत्र आदि के साथ जुड़ गया और कांग्रेस कमजोर होती चली गयी। आज कांग्रेस मात्र कुछ ही प्रांतो में सत्ता में है जबकि वह 1980 के पहले पूरे देश में एकछत्र राज करती थी। आज वह उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, उत्‍तराखंड, झारखंड, छत्‍तीसगढ़, बंगाल आदि प्रातों में हाशिए पर चली गयी है। इसके पीछे पार्टी के नीति निर्धारण करने वाले तत्व दोषी हैं, क्योंकि यदि अब भारत में किसी भी पार्टी को सत्ता में रहना है तो पिछडे़, दलित, आदिवासियों को मुख्य धारा में लाना ही होगा और अब यही लोग सत्ता में काबिज भी होंगे।

हिन्दी भाषी राज्यों को यदि आप देखें तो बसपा, सपा, राजद आदि दल इसी गणित के चलते सत्तासीन रहे हैं। मगर कांग्रेस अभी भी इस बात को पता नहीं क्यों समझ नहीं पा रही है। एमपी में भी कांग्रेस ने जो 1980 से 2003 तक ( बीच के तीन वर्ष छोड़ कर) का लम्‍बा शासन किया वह अर्जुनसिंह के दूरगामी निणर्य से ही संभव हुआ. मध्‍य प्रदेश कांग्रेस पिछड़े और  दलितों को मुख्य धारा में लाने के फलस्वरुप ही 20 वर्ष तक सत्ता पर काबिज रही। वर्ष 2003 में कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण पिछडे़ वर्ग का कांग्रेस से अलग होना है, यदि दलित एजेंडा लागू नहीं होता तो संभव है कि कांग्रेस के दस विधायक भी नहीं आ पाते। इसमें कांग्रेस के नेता अर्जुनसिंह ही इस दूरगामी परिणाम को समझ पाए। अन्य लोग यह नहीं समझ सके कि अजुर्नसिंह का पिछड़ों के हक के लिये संघर्ष ही कांग्रेस को मध्य प्रदेश में स्थापित किये है।

जब उन्‍होंने आईआईटी, आईआईएम में 27 प्रतिशत आरक्षण को लागू करने की घोषणा की तो देश भर में उनका विरोध हुआ। सामान्य वर्ग के नेताओं एवं मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने इसे देश को बांटने की बात कही। छात्रों से आंदोलन करवाये गये। क्या प्रजातंत्र में सत्ता या प्रशासन में भागीदारी पर पिछड़ों और दलितों का अधिकार नहीं हैं? प्रजातंत्र में निर्णय बहुमत से होता है और बहुमत पिछड़ों का ज्यादा है। इसलिये उनका हक उन्हें देना ही होगा, किसी उपेक्षित वर्ग के उत्थान के प्रयासों का विरोध ही माओवाद और नक्सलवाद को जन्म देता है। अर्जुनसिंह का विरोध हुआ पर देश के सर्वोच्च न्यायालय ने मानव संसाधन मंत्री के निर्णय से सहमति जताई क्योंकि यह निर्णय बहुसंख्यिकों के हित में था। आईआईटी, आईआईएम में पिछड़ों को आरक्षण मिल गया। मुझे एक बात अभी भी खटकती है कि स्वतंत्रता के 63 वर्ष बाद भी  बहुसंख्यक वर्ग अपने अधिकारों के संबंध में कितना पिछड़ा है, यदि कोई इनको इनका अधिकार दिलाता है तो वह इस संघर्ष का मोल क्यों नही समझते। उसके साथ खडे़ क्यों नही रहते यह प्रश्न यक्ष की भाँति आज भी खड़ा है। अर्जुनसिंह द्वारा पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए किये गये प्रयास, दलितों के उत्थान के लिये बाबा साहब अंबेड़कर द्वारा किये गये प्रयासों से कमतर नहीं आँका जा सकता। अर्जुन सिंह जी को मेरी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

लेखक उमेश यादव पत्रकार एवं बुंदेलीस्‍वराज डॉट कॉम के संपादक हैं.

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