अगर हम हिंदू धर्म- जिसे न्यालालय ने भी केवल एक पंथ मात्र न मान उसे एक जीवन पद्धति कहा है- की सभी मान्यताओं को मोटे तौर पर दो मुख्य बिंदुओं में समाहित करें तो वह है पुनर्जन्म में आस्था और ये मानना कि इस अखिल ब्रम्हांड, चराचर जगत का कोई नियंता है इसका विश्वास करना. शास्त्र-पुराणों से लेकर विभिन्न मिथकीय कथाओं के द्वारा भी भारतीय जीवन में यह विचार रसा-बसा है. भारतीय पद्धतियों से भी निकले अपवाद स्वरूप कुछ दर्शनों एवं विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा थोपे गए विचारों, उनके वैचारिक आक्रमणों, मुग़ल से लेकर फिरंगी गुलामियों के बावजूद सनातन धर्मावलंबियों में कभी भी इस अवधारणा के प्रति आज तक कोई अनास्था जन्म नहीं ले पाया.
तो मोटे पर सनातन आस्था इस बात को व्यक्त करता है कि जीव अपने कर्मों के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकता रहता है. जिसमें मानव जन्म सबसे श्रेयष्कर है. और यह मानव योनि में ही संभव है कि वह न केवल खुद के उद्धार के निमित्त बल्कि अपने पितरों, पूर्वजों और प्राणी मात्र के कल्याणार्थ प्रयास कर सकता है. न केवल मानव अपितु देवताओं को भी अपनी मुक्ति हेतु इस मर्त्यलोक में जन्म लेकर ही पुनः प्रयास करना होता है. जैसे गीता में भगवान ने कहा है ‘ क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोका विसंती’ यानी कुछ अच्छे कर्मों के कारण देवलोक में जगह मिल जाने के बाद भी पुण्य का प्रभाव खत्म हो जाने पर इस जीवलोक में आना ही होता है. पुनः जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति हेतु तप करना ही होता है. श्राद्ध और तर्पण की मर्यादा तो खुद भगवान ने भी रखी है. वे भी खुद को इस चक्र से वंचित नहीं रख सकते हैं. रामायण में जैसा उद्धृत किया गया है कि महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिलने पर वन में भगवान सबसे पहले उनके श्राद्ध और तर्पण को ही प्रस्तुत हुए थे. तो मोटे तौर पर मानव जीवन का एकमेव लक्ष्य है जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति. जिसे मोक्ष की संज्ञा दी गयी है. और खुद के कर्मों के अलावा अपने पुत्रों द्वारा किये गए श्राद्ध तर्पण आदि से ही यह मुक्ति संभव हो पाती है, ऐसा भारतीय मनीषा मानता है. मानव के लिए उसके पितर ऋण से उऋण होने का भी एक यही साधन है कि जैसा हमें पिता ने लालन-पालन कर बनाया वैसा नयी पीढ़ी समाज को देना साथ ही कृतज्ञता स्वरूप श्राद्ध और तर्पण के द्वारा अपने पितरों को मोक्ष दिला कर ही पुण्य का भागी बनते हुए अपने उस ऋण को भी चुकाना.
जहां तक यह पक्ष एक खास समय में ही होने का सवाल है तो ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार सूर्य जब कन्या राशि में स्थित होते हैं तब ऐसा माना जाता है कि हमारे पितर अपने पुत्र-पौत्रों के यहां विचरण करते हैं. उस समय वह अपने पुत्रों से यह अपेक्षा करते हैं कि उन्हें तर्पण के द्वारा तृप्ति प्रदान किया जाय. इस तर्पण से संतुष्ट हो पितरगण हर तरह के सौभाग्य और पुरुषार्थ को प्रदान करने का आशीष नयी पीढ़ियों को देते हैं. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं. शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार-व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है.
श्राद्ध और पितर पक्ष से जुडी एक मान्यता खास कर कौए को लेकर है. यूं तो लोकोक्ति यह है कि जब इंद्र पुत्र जयंत ने कौए का रूप धारण कर मां सीता का अपमान किया था तब ही उसे यह श्राप दिया गया कि उसे गंदगी भरे खाने, जूठनों पर ही आश्रित रहना होगा. लेकिन बाद में उसे यह राहत दी गयी थी कि केवल पितर पक्ष में ही उन्हें स्वच्छ भोजन का अवसर मिलेगा. इसलिए पूर्वजों को पिंडदान के अलावा काग के लिए भी भोजन की व्यवस्स्था की जाती है. लेकिन इस लेखक की समझ के अनुसार कौए को इस तरह से सम्मानित करने के पीछे इस लोकोक्ति से भी बड़ा एक सकारात्मक कारण रहा होगा. जैसा कि ऊपर कहा गया है कि यह पूरी अवधारणा ही मोटे तौर पर जन्म-मरण का सिद्धांत और उसके मुक्ति के सिद्धांत में समाहित है. लेकिन इस चक्र से जुड़ी दो अनिवार्यताएं भी साथ है. पहला तो यह कि जैसा तुलसी बाबा ने कहा है ‘जनमत मरत दुसह दुःख होई.’ यानी जन्म लेते और मरते हुए दुरूह कष्टों का सामना करना होता है. और दूसरा ये कि पूर्व योनियों की स्मृति नए जन्म तक कायम नहीं रहती. हालांकि अपवाद स्वरूप कभी कभार किसी शिशु को अपने पिछले जीवन की स्मृति कायम रहने की बात भी सामने आती रही है, लेकिन सभी अपने पुराने सभी जन्मों की बात याद रखने वाले एकमात्र अपवाद हुए हैं कागभुसुंडी जी.
ऋषि के श्रापवश चौरासी लाख योनियों तक में भ्रमण करने का श्राप कागभुसुंडी जी को बाद में कुछ राहत के साथ मिल गयी थी. वो ये कि श्राप के प्रभाव के कारण उन्हें चौरासी लाख योनियों में भ्रमण तो करना ही होगा, लेकिन जन्म मरण का कष्ट उन्हें नहीं झेलना होगा साथ ही उनकी स्मृति में पुराने योनियों की सारी बातें ताज़ा रहेंगी. इसके अलावा वो जब जितने दिन ही किसी योनि में रहना चाहें वो रह सकते हैं. फिर कथा ये है कि हर योनि में भ्रमण करते हुए सबका अनुभव लेते हुए चूंकि उन्होंने कौए की योनि में जन्म लेकर ही राम कथा को देखने का सु-अवसर प्राप्त किया अतः उन्होंने बेहतर विकल्प होते हुए भी उसी योनि में रहना पसंद किया, क्योंकि काग रूप में ही उन्हें भगवान राम के दर्शन हुए थे. अतः शायद इसलिए ही अपने पितरों के रूप में ही काग की मान्यता प्रदान की गयी होगी. वास्तव में काग भुसुंडी जी ने जिस तरह अपने श्राप को स्वयं और समाज के लिए वरदान के रूप में परावर्तित कर लिया, जिस तरह से उन्होंने बाद में गरुड़ जी को राम कथा सुनाने के बहाने समाज को कौए जैसे निंदनीय रूप में रहते हुए भी राम कथामृत पान कराया शायद इसलिए ही काग चेष्टा को समाज में सम्मानित रूप मिला और पितरों के समकक्ष उन्हें रखने का एक तार्किक कारण नज़र आता है. अस्तु.
शास्त्र कहता है ‘धर्मार्थ काम मोक्षाणाम् यस्येकोपि न विद्यते, अजागलस्त नस्यैव तस्य जन्म निरर्थकम्’ यानी मानव जीवन का हेतु ही यही है कि धर्म पूर्वक अर्थ का उपार्ज़न करते हुए कामनाओं की तृप्ति के उपरान्त मोक्ष को प्राप्त हुआ जाय. इसे ही (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को) पुरुषार्थ चतुष्टय कहा गया है. तो इस सबसे प्रमुख और अंतिम पुरुषार्थ के रूप में मानव और अंततः प्राणी मात्र के मोक्ष का यह मार्ग अपने सुपुत्रों-सुपौत्रों के द्वारा श्रद्धा पूर्वक किये गए अनुष्ठान के रास्ते ही अपने गंतव्य तक पहुचता है. इसीलिए भी हर पिता लाख दुश्वारियों बावजूद अपने पुत्रों का लालन-पालन करता है और वह इस बात के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहता कि उसका पुत्र समाज का एक अच्छा नागरिक बने. उसे अच्छा संस्कार प्रदान किया जाय. धर्म के प्रति उसकी निष्ठा मज़बूत बनायी जाय. और अंततः समाज को एक अच्छा व्यक्ति प्रदान कर अपने पितरों के उस ऋण से मुक्ति पायी जाय जिसे अंततः श्राद्ध और तर्पण के द्वारा उसकी निचली पीढ़ी फिर निभाने को उद्यत हो.
यूं तो हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह श्राद्ध और उसकी प्रासंगिकता का बखान करने में कुछ शब्द असमर्थ हैं. लेकिन निष्कर्ष के तौर पर यह अनुष्ठान कृतज्ञता की उस परंपरा के निर्वहन का मूल मंत्र भी है जिसके द्वारा हर भारतीय न केवल अपने पितरों बल्कि प्राणी मात्र और वनस्पतियों तक के प्रति उसके द्वारा किये गए उपकार हेतु उसे सादर याद करता है. उसे श्रद्धा सुमन अर्पित करता है. तो जीव और वनस्पति मात्र के प्रति विनम्र होने के इस उत्सव के न केवल धार्मिक अपितु सामजिक, वैज्ञानिक और पर्यावरणीय निहितार्थ भी हैं.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ बीजेपी के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.

