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पीता हूँ रोज-ए-अब्र ओ शबे-माहताब में

मिर्जा गालिब कितने महान शायर हैं यह जानने के लिए– या यह मानने के लिए कि वह कितनी गहरी समझ और गहरी अभिव्यक्ति के शायर हैं, उनकी सम्पूर्ण रचनावली से गुजरने की जरूरत नहीं है। इसके लिए उनका कोई एक शेर ही काफी है। आज अपने घर के ऊपर और आसपास छायी बदली को बार-बार कातर दृष्टि से देख रहा हूँ और मिर्जा गालिब के इस शेर का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हूँ–

गालिब छुटी शराब पर अब भी कभी
पीता हूँ रोज-ए-अब्र ओ शबे-माहताब में 

मिर्जा गालिब कितने महान शायर हैं यह जानने के लिए– या यह मानने के लिए कि वह कितनी गहरी समझ और गहरी अभिव्यक्ति के शायर हैं, उनकी सम्पूर्ण रचनावली से गुजरने की जरूरत नहीं है। इसके लिए उनका कोई एक शेर ही काफी है। आज अपने घर के ऊपर और आसपास छायी बदली को बार-बार कातर दृष्टि से देख रहा हूँ और मिर्जा गालिब के इस शेर का अर्थ समझने की कोशिश कर रहा हूँ–

गालिब छुटी शराब पर अब भी कभी
पीता हूँ रोज-ए-अब्र ओ शबे-माहताब में  गालिब साहब का भी कोई जवाब नहीं ! जरा गौर फरमाइए– वह शराब से तौबा कर चुके हैं और विनम्र लहजे में फरमाते हैं– ”छुटी शराब”। जरा ”छुटी शराब” पर गहराई से ध्यान दीजिए। ऐसा कहने में क्या इजहारे-मजबूरी का भाव नहीं झलकता। कई-तरफा दबाव है उन पर शराब छोड़ने का। छुट गयी– यानी इरादा करके नहीं छोड़ी। छुट गयी और छोड़ दी दोनों बातों में बहुत फर्क है।
शराब छुट तो गयी पर अब भी कभी-कभी। चल जाती है। और गौर करने की चीज यह भी है कि छुट जाने के बाद ”अब भी कभी-कभी” किन हालात में शराब को मुँह लगाते हैं– उस दिन जब आसमान में बदली छायी होती है और उस रात जब चॉंद हर ओर अपना जलवा बिखेर रहा होता है। जरा कल्पना कीजिए। इन दोनों हालात में मद्धम रोशनी कितनी खुशनुमा लगती है। अगर आप कभी बार में बैठे होंगे तो जरूर गौर किया होगा कि वहॉं मद्धम रोशनी की व्यवस्था रहती है। मद्धम रोशनी मन को खूब भाती है। यह तो हुई एक बात। दूसरा पहलू देखिए–

गालिब तौबा कर चुके हैं। मान लीजिए कसम खा चुके हैं। ऐसे में उन्हें तलब लग जाती है तो उनका क्या कसूर। ”मेरा क्या कसूर, मौसम और माहौल का कसूर”। क्या बहाना मारा है। सच बात तो यह है कि पीने को मन मचलने लगे तो घर के अन्दर ही बदली एवं चॉंदनी रात का कृत्रिम मौसम-माहौल रचा जा सकता है। गालिब की समझ जब इतनी गहरी है तो क्या वह अपने अनुकूल माहौल रचने के फन से वाकिफ न रहे होंगे।

कुल मिलाकर मामला यह बनता है कि पीनी है तो दिन क्या और रात क्या ! पीने वाले अक्सर ऐलान करते रहते हैं– मैंने छोड़ दी। चतुर पियक्कड़ कहते हैं– कम कर दी। सच कहूँ तो मुँह की लगी छुटती कहॉं है ? मेरा विनम्र सुझाव है कि गालिब पर शोध करने वाले बजरिये इस शेर उनके व्यक्तिगत जीवन पर नये सिरे से खोजबीन करें।

खैर, गालिब को लुभाने वाले इस मौसम में मुझे अपना भी एक शेर याद आ रहा है। पेश करने की गुस्ताखी कर रहा हूँ–

इक बादाकश ने तौबा करने की कसम खाई
और, इस खुशी में उम्र भर पी और पिलाई

Vinay Shrikar
[email protected]

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