: अंग्रेजी मीडिया के समक्ष हिन्दी को बौना साबित करने की कोशिश : मीडिया में “पीपली लाइव” का हंगामा देखने के बाद उसे देखने का मन बहुत हुआ था, लेकिन मैं इसे मीडिया में आ रही समीक्षा के प्रभाव में देखना नहीं चाहता था, लिहाजा फिल्म रिलीज़ के दो सप्ताह बाद 27 अगस्त को तबियत ठीक न होने को बावजूद पत्नी के साथ पीपली लाइव देखने पहुंचा। बहुत दिनों बाद बिना सिर-पैर की किसी फिल्म को देखने का दुर्भाग्य मिला। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे ना… जब पांच सौ रुपये खर्च करने के बाद भी कुछ खास देखने को न मिले। पूरी फिल्म एक कुंठित डायरेक्टर की उपज भर थी, जिसे समर्पित किया गया था- एक अंग्रेजी चैनल के मालिक और मालकिन को। ये संयोग आपको आगे खुद-ब-खुद मिल जाएगा।
फिल्म का टारगेट ऑडियेंस टीवी चैनल में काम करने वाले गिने चुने लोग ही थे। उसमें भी हिंदी न्यूज़ चैनल को टारगेट करने का षड़यंत्र ज्यादा दिखाई दिया। कथित तौरपर फिल्म की कहानी जरुर किसानों की आत्महत्या पर थी…जिन्होंने गुरबत में आकर, कोई दूसरा चारा ना देखकर खुदकुशी कर ली। अगर कोई टीवी चैनल में काम नहीं करता है और जिसे उसके अंदर काम करने का तरीके का पता नहीं है, वो थियेटर में खुद को ठगा सा महसूस करता है। एक कम बजट की फिल्म पेश करने और अपने मन की भड़ास निकालने का आमिर खान को भी मौका मिल गया, बाक़ी कसर मीडिया ने खुद ही मुफ्त में पीपली लाइव की मार्केटिंग करके पूरी कर दी। पहले ही फिल्म कम बजट की थी…उपर से छप्पड़ फाड़ मुनाफा अलग से हो गया।
ये फिल्म न तो शोले फिल्म की कैटेगरी में आती है और न ही जाने भी दो यारों की…अनुषा रिज़वी की ये पहली फिल्म है, इसलिए डायरेक्शन की बात करना बेमानी होगा। यहां अगर फ्रांस के एक फिल्म मेकर का जिक्र किया जाए तो पीपली लाइव के पीछे की कहानी को समझने में आसानी होगी। फ्रांस के एक फिल्म समीक्षक त्रूफो को फिल्म बनाने का भूत सवार हुआ। उसने भी एक बिना सिर-पैर की फिल्म बना डाली…जिसे उसके दोस्त पत्रकारों ने एक के बाद एक ने उसकी पहली बकवास फिल्म को बेहतरीन फिल्म बता डाला। लिहाजा थियेटरों पर देखने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा। पेशे से गद्दारी ने फिल्म को कामयाब बना दिया…पीपली लाइव में भी इतिहास खुद को दोहराता हुआ दिख रहा है।
इसके अलावा पीपली लाइव के बाद जो समस्या अपना मुंह खोल सकती है…उस आशंका की एक बानगी देखने को भी मिल गई। पीपली लाइव के बाद नेताओं की जमात टीवी पत्रकारों के वाजिब सवालों का जवाब भी बड़ी बेशर्मी से टाल देंगे। इसका एक जलवा कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी दिखा भी चुके हैं। हुआ यूं कि आईबीएन सेवन के एक एंकर ने जब मनीष तिवारी से पूछा कि आपकी सरकार ने विश्वनाथन आनंद के भारतीय होने पर क्यों सवाल उठाया है। जब मनीष तिवारी को कोई जवाब नहीं सूझा तो कांग्रेस इस प्रवक्ता ने तपाक से एंकर से कह डाला कि आप हर चीज को पीपली लाइव मत बनाया कीजिए। हालांकि विश्वनाथन आनंद के मुद्दे पर उन्हीं की सरकार के एचआरडी मंत्री कपिल सिब्बल माफी मांग चुके हैं।
ये है पीपली लाइव का आफ्टर इफैक्ट। अब नेताओं की जमात को जब कोई जवाब नहीं सूझेगा, तब उनके लिए मनीष तिवारी आदर्श साबित होंगे। फिल्म की मार्केटिंग के लिए सोची समझी रणनीति के तहत महंगाई डायन खाए जात है गाना फिल्म में घुसेड़ा गया। दो-ढाई महीने पहले गाने को आम जनता के दर्द को तौर पर पेश किया गया। फिल्म में गाना किसलिए आता है और कब चला जाता है…पता ही नहीं चलता। हिंदी मीडिया की मारक क्षमता किसी से छिपी नहीं हैं। इसी क्षमता को लगातार कुंद करने का, भोथरा करने का षड़यंत्र चलता रहता है। इसमें अंग्रेजी मीडिया तो पहले से शामिल था… अपना हित साधने की खातिर आमिर खान जैसा जीनियस फिल्ममेकर भी जुड़ गए लगते हैं।पीपली लाइव उसी दिशा में बढ़ाया गया एक क़दम है, इसे केवल इसी तरह ही देखना चाहिए। ऐसा लिखने पर आपको लगे कि शंभुनाथ पगला गया है..लेकिन जब आप इसे गहराई से सोचेंगे तब आपको षड़यंत्र गंध जरुर आ जाएगी।
लेखक शंभूनाथ पत्रकार हैं.

