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प्रकाशकों के शोषण से मिले आजादी : रमाकांत पाण्डेय अकेला

अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना को समर्पित करने वाले अद्वितीय गद्यकार व ऐतिहासिक उपन्यास, कथाओं के रचनाकार रमाकांत पांडेय अकेला को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान साहित्य भूषण से सम्मानित किया तो उनकी गुमनामी की धुंध हल्की सी छँटी मगर अब भी उन्हें वह प्रतिष्ठा और पहचान नहीं मिली जिसके वो हकदार हैं। आज बाजार के दौर में अच्छा लेखक होने के साथ साथ अच्छा प्रबंधक नहीं है उसके लिए इस साहित्यिक बाजार में कोई जगह नहीं। ऐसे ही एक लेखक हैं रमाकांत पाण्डेय अकेला जो ग्रामीण-किसान परिवेश से आने के चलते न ही तकनीक जानते हैं न ही प्रमोशन प्रचार के साहित्यिक तिकङम। वह अब तक 70 से अधिक ऐतिहासिक उपन्यास और कथा संग्रह लिख चुके हैं। 85 वष की उम्र के बावजूद यह क्रम जारी है। परन्तु इस सब पर प्रकाशकों का शोषण उन पर भारी है।

अपना संपूर्ण जीवन साहित्य साधना को समर्पित करने वाले अद्वितीय गद्यकार व ऐतिहासिक उपन्यास, कथाओं के रचनाकार रमाकांत पांडेय अकेला को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान साहित्य भूषण से सम्मानित किया तो उनकी गुमनामी की धुंध हल्की सी छँटी मगर अब भी उन्हें वह प्रतिष्ठा और पहचान नहीं मिली जिसके वो हकदार हैं। आज बाजार के दौर में अच्छा लेखक होने के साथ साथ अच्छा प्रबंधक नहीं है उसके लिए इस साहित्यिक बाजार में कोई जगह नहीं। ऐसे ही एक लेखक हैं रमाकांत पाण्डेय अकेला जो ग्रामीण-किसान परिवेश से आने के चलते न ही तकनीक जानते हैं न ही प्रमोशन प्रचार के साहित्यिक तिकङम। वह अब तक 70 से अधिक ऐतिहासिक उपन्यास और कथा संग्रह लिख चुके हैं। 85 वष की उम्र के बावजूद यह क्रम जारी है। परन्तु इस सब पर प्रकाशकों का शोषण उन पर भारी है।

उनके उपन्यासों में आचार्य चतुरसेन और व्रन्दावन लाल शर्मा की लेखकीय भव्यता और कल्पनाप्रसूनता पायेंगे तो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी  रमाकांत पाण्डेय ‘अकेला’ वीरोचित इतिहास के समर्थ रचनाकर हैं। उनकी रचनाओं में ऐतिहासिक आख्यान अपनी संपूर्ण गरिमा के साथ उपस्थित रहते हैं। रमाकांत पाण्डेय ‘अकेला’ ने 72 ऐतिहासिक उपन्यास रचना की है। वीरगाथा काल, गुप्तकाल, सुंगकाल और मौर्यकाल का जो इतिहास पाण्डेय जी ने रचा है, इतिहास के लेखकों, शोधकों और पुरोहितों ने उसे अनुपयुक्त समझकर उसकी अवहेलना की है। पाण्डेय जी के ऐतिहासिक उपन्यास आचार्य चतुरसेन शास्त्री और वृंदावनलाल वर्मा द्वारा की गयी इतिहास लेखन की परम्परा को पुष्ट कर रहे हैं। साथ ही आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की परिमार्जित- परिष्कृत संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली हिन्दी के उपयोग का हठ भी विद्यमान है। इनकी शैली ऐसी कि आप उपन्यास पढते पढते कहीं खो से जाते हैं इतिहास के उसी कोने में, मगर सिर्फ कल्पना नहीं, वह तथ्यों की ऐतिहासिकता को कहीं टूटने नहीं देते। वह एक साहित्यकार के साथ ही साथ इतिहासकार भी हैं, वह उर्दू हिन्दी और संस्कृत तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार हैं, इसीलिए वह अपने तथ्यों की प्रमाणिकता के लिए अधिकांशत: मूल पाठ का अध्ययन करते हैं।  

उनकी साहित्यिक प्रतिभा का अंदाज हम इस बात से लगा सकते हैं कि उनके अब तक प्रकाशित सभी उपन्यासों को आम पाठकों द्वारा तो सराहा गया, अमेजॉन सहित तमाम वेबसाइटस पर भी इनकी किताबें उपलब्ध हैं। परन्तु समीक्षकों-आलोचकों की नजर शायद अभी तक इन पर नहीं पड़ी। रमाकान्त पाण्डेय अकेला का जन्म 9 अप्रैल 1931  को कानपुर जिले के सखरेज नामक गाँव में हुआ। इनकी माता का नाम कुसुमा और पिता का नाम जगन्नाथ था। छोटी उम्र में ही किन्ही कारणों से यह कानपुर के मंन्धना में आकर रहना पड़ा। यहीं उर्दू व हिंदी की वर्नाक्यूलर परीक्षा उत्तीर्ण की। सन 1942 ई. के आंदोलन से पीड़ित होकर सीतापुर जिले के ब्रम्हावली गाँव में आकर रहने लगे। ब्रम्हावली में लेखक ‘अकेला’ की ससुराल और ननिहाल भी है। कुछ समय बाद अकेला ने हिन्दोस्तान टीचर परीक्षा उत्तीर्ण की। इनके सामने अर्थ की समस्या मुह बाए खड़ी थी।

इन्होंने दिन में साइकल बनाना शुरू कर दिया और फिर भी काम न चला तो रात रात सिलाई का काम करने लगे। जो कुछ धन मिलता उससे घर चलाते और जो कुछ धन मिलता उससे घर चलाते और खुद के भोजन पानी से भी बचत निकालने की सोंचते रहते। जैसे ही थोडा सा धन इकठ्ठा कर पाते लेखन हेतु दवात और कलम आदि सहायक सामग्री खरीद लाते। स्वाभिमान ऐसा कि किसी के सामने हाथ फैलाना गवारा न था। जब कभी दुबारा धन इकठ्ठा कर पाते तो लेखन को यथार्थता से जोड़ने यात्रा पर निकल पड़ते। यथास्थान पहुंचकर वातावरण का अध्ययन व अवलोकन करते। कुछ समय बाद इन्होंने बीस रुपए के मासिक वेतन पर अध्यापक की नौकरी कर ली। यह पांच सौ चालीस रुपए के वेतन पर सेवानिवृत्त हो गए।
 
इन्होंने गत चालीस वर्षों के दौरान हाईस्कूल, इंटरमीडिएड और स्नातक की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। साहित्य साधक ‘अकेला’ जीवन के संघर्षों और थपेड़ों से जूझते रहे। कई लोग इनके पास शिक्षा ग्रहण करने और उर्दू सीखने आते रहते हैं पर बदले में कभी कोई शुल्क आज तक इन्हें कोई देने में सफल न हो सका। अकेला ने अर्थ की भीषण तंगी के बावजूद भी कभी किसी का कोई प्रलोभन स्वीकार नहीं किया कारण था कि यह लेखक इसे साधना में बाधक मानते रहे हैं। साहित्य लेखन के संघर्ष और तपस्या को अकेला जैसा साहित्यकार ही समझ सकता है। अकेला ने साहित्य लेखन में अपने दायित्वों का निर्वहन बखूबी किया है ठीक एक आदर्श साहित्यकार की भाँति। अकेला की दृष्टि अब कमजोर हो चुकी है। वृद्धा अवस्था का पडाव है फिर भी लेखन कार्य प्रतिदिन का नियम है। निस्वार्थ लेखन और लेखक की अर्थ दशा को देखकर बार बार निराला जी की याद बरबस ही आ जाती है। रमाकान्त पाण्डेय अकेला के अब तक बीस उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से अधिकाँश साहित्यागार जयपुर से प्रकाशित हुए हैं। इन्होंने वीरगाथा काल, गुप्तकाल, शुंग एवं मौर्य काल, स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ, आंचलिक और ऐतिहासिक ढेर सारी कहानियां भी लिखी हैं।  रमाकान्त पाण्डेय अकेला को देखकर बरबस लोग चौक पड़ते हैं और वह सोंचते हैं इतना बड़ा लेखक और इतने सामान्य और सादगी पूर्ण जीवन में रहना पसन्द करता है। बड़ी बात तो यह है कि पच्चासी वर्ष की अवस्था में भी विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन और नवीन लेखन आज भी गंगा की धार की तरह जारी है जो साहित्य की नवीन उपज की कारक है।

वह पेशे से अध्यापक और परंपरा से किसान हैं,वह किसानी को अपने जीवन का अटूट हिस्सा मानते हैं, वह बताया करते हैं कि जब जानवर चराने जाया करते थे तो खेत की मेढ पर बैठ कर लिखा पढा करते थे । ऐसे मे कभी कभी जब जानवर चरते हुये दूसरे के खेत में चले जाते तो गाली भी खानी पङती। ऐसा ही एक वाकया और बताते हैं कि एक बार बीमारी की हालत में उनकी पत्नी ने उनके लेखन पर प्रतिबंध लगा दिया तो उनके सो जाने पर टार्च जलाकर रजाई के अंदर ही चुपचाप लिखना पङा ।पर पत्नी के जाने के बाद जीवन पथ पर वह अकेला पङ गये तो अकेला उपनाम लिखकर अपनी पत्नी की स्मृतियों को हमेशा हमेशा के लिए साहित्य की संगिनी बना लिया ।

परन्तु लेखन कर्म का प्रकाशन करवाना उनके लिए दुरूह साबित हुआ ।तमाम प्रकाशनों को पत्र लिखे, फोन किये, मगर कहीं से कोई जवाब नहीं आया ,अंतत: जयपुर के साहित्यागार प्रकाशन ने प्रकाशित करने की हामी तो भरी परन्तु बदले में कांटेृक्ट में प्रकाशक को मोटी रकम देने का समझौता हुआ ।यह सिलसिला अभी तक जारी है।जब भी वह कुछ पैसा अपने से या सहयोग से जोङ बटोर पाते हैं , एक किताब प्रकाशित हो जाती है। यह एक साहित्य जगत की बड़ी विडम्बना भी है कि ऐसी पुस्तकें धनाभाव के कारण प्रकाशित नहीं हो पा रहीं। इस लेखक ने साहित्य सेवा के लिए घोर तपस्या की है। उनका बस यही कहना है कि हमें न ही पुरस्कार चाहिये न अतिरिक्त सम्मान,हमें बस प्रकाशक की वसूली से आजादी चाहिये । हम चाहते हैं कि हमारे जीते जी ही हमारी किताबें पाठकों तक पहॅुच जायें बस।
 
सुधान्शु बाजपेयी
[email protected]

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