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प्रकृति बचाने का तरह तरह का पाखंड

जुगनू शारदेयप्रकृति के साथ सबसे बड़ा पाखंड संयुक्त राष्ट्र संघ की कृपा से पूरी दुनिया में हो रहा है। दुनिया में भी यह विकासशील देशों में अधिक हो रहा है। विकासशील देशों में भी सबसे ज्यादा भारत दैट इज इंडिया में हो रहा है। मजे की बात यह भी है कि प्रकृति के खेल को सबसे पहले भारत ने समझा था। जब समझा था तब इसका नाम भारत था या कुछ और – यह इतिहास और शोध का विषय है। मुझे नहीं पता का ऋग्वेद का वास्तविक लेखन या अनुभव काल क्या रहा है। लोग मान कर चलते हैं कि यह कम से कम पांच हजार साल पुराना है। वामपंथ की दुनिया में जैसे बात बात पर मार्क्स की पूंजी का हवाला दिया जाता है, वैसे ही हमारे यहां ऋग्वेद का हवाला दिया जाता है। मेरे पास ऋग्वेद का जो हिंदी अनुवाद है वह सायण भाष्य पर आधारित है।

जुगनू शारदेय

जुगनू शारदेयप्रकृति के साथ सबसे बड़ा पाखंड संयुक्त राष्ट्र संघ की कृपा से पूरी दुनिया में हो रहा है। दुनिया में भी यह विकासशील देशों में अधिक हो रहा है। विकासशील देशों में भी सबसे ज्यादा भारत दैट इज इंडिया में हो रहा है। मजे की बात यह भी है कि प्रकृति के खेल को सबसे पहले भारत ने समझा था। जब समझा था तब इसका नाम भारत था या कुछ और – यह इतिहास और शोध का विषय है। मुझे नहीं पता का ऋग्वेद का वास्तविक लेखन या अनुभव काल क्या रहा है। लोग मान कर चलते हैं कि यह कम से कम पांच हजार साल पुराना है। वामपंथ की दुनिया में जैसे बात बात पर मार्क्स की पूंजी का हवाला दिया जाता है, वैसे ही हमारे यहां ऋग्वेद का हवाला दिया जाता है। मेरे पास ऋग्वेद का जो हिंदी अनुवाद है वह सायण भाष्य पर आधारित है।

इसकी भूमिका में अनुवादक डॉक्टर गंगा सहाय शर्मा ने लिखा है कि ऋग्वेद की एक बात ने मुझे चकित किया है। उन्नत समाज, विचारशील लोगों एवं सभ्य परिवारों की सभी सामग्री का उल्लेख करते हुए भी कहीं भी दीपक अथवा कृत्रिम प्रकाश साधन का नाम नहीं मिला। लेकिन ऐसा लगता है कि उस काल के लोगों ने अग्नि को ही कृत्रिम प्रकाश साधन समझा होगा। यह कृत्रिमता – बनावटीपन सभ्यता की खास देन है। हमारे देश में कभी किसी ने पंचतत्व की महत्ता समझ ली थी। इसमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है कि किसने समझी थी। कभी-कभी लगता है कि वेदों की परंपरा वालों ने ही इसे समझा होगा कि क्योंकि अनुभवों के इस दस्तावेज में बहुत सारी चीजों के साथ पंचत्त्व के आकार विचार पर भी बहुत चर्चा की गई है। थोड़ा बहुत गुगल ज्ञानदेव के माध्यम से भी जानकारी मिल जाती है कि अलग-अलग सभ्यताओं में यह पंचत्तव महत्चपूर्ण कारक रहा है। कुछ पाखंडी और ज्ञानी तो यहां तक हांक देते हैं कि मनुष्य का शरीर इसी पंचतत्व – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है।

सच तो यह है कि मनुष्य का शरीर ही नहीं ब्रह्मांड और उस कारण प्रकृति भी यही पंचत्तव हैं। लेकिन जिस18 वीं सदी के औद्योगिक क्रांति ने मार्क्स की पूंजी को जन्म दिया उसी औद्योगिक क्रांति ने पंचतत्व को समाप्त करना आरंभ किया। अब इसे बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ तरह तरह के पाखंड कर रहा है। इन पाखंडों में से एक पाखंड तो बहुत ही लोकप्रिय हो चुका है। इस पाखंड का नाम है पर्यावरण। बीसवीं सदी के सातवें दशक तो यह शब्द डिक्शनरी में कुछ और मतलब रखता था। लेकिन1973 से इसका आज वाला मतलब हो गया। इसी साल संयुक्त राष्ट्र संघ ने तय किया कि 5 जून को दुनिया पर्यावरण दिवस मनाएगी।

मजे की बात यह है कि पंचत्तव के एक तत्व जल की खराबियों से यह पर्यावरण बचाओ जन्मा। यूरोप की राइन नदी की मछलियां जब मरने लगीं तो स्वीडेन के राजा ने स्टॉकहोम में 1972 में एक सम्मेलन ही बुला डाला। दुनिया के किसी देश का राज प्रमुख इस सम्मेलन में नहीं गया। सिर्फ भारत की तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गईं थी। उनका भाषण भी वहां सबसे बढ़िया था। यह भी कह सकते हैं कि अंधों में काना राजा वाली बात थी। मगर स्वीडेन से लौटने के बाद श्रीमती गांधी ने कुछ ऐसा नहीं किया जिससे उनका पर्यावरण प्रेम झलकता हो। उनका सारा स्नेह वन्यजीवों के बचाव पर उमड़ा। भारतीय प्रशासनिक सेवा के दो अधिकारियों समर सिंह और एमके रणजीत सिंह के सौजन्य से वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 में बना। समय के साथ 1991 में, 2003 में और 2006 में इसमें संशोधन भी हुए। लेकिन 2011 आते आते तक यह एक दिखावटी चीज ही हो कर रह गया है। वैसा ही दिखावटी – बनावटी एक्ट है फॉरेस्ट कंजरवेशन एक्ट 1980। हमारे देश में 1927 का भी बना हुआ एक वन संरक्षण अधिनियम है। लेकिन ऐसे ही एक्टों के बल पर कोई जयराम रमेश अपने को महान पर्यावरणवादी साबित कर सकता है।

जो लोग इन एक्टों का खेल खेल रहे हैं, उन्हें पता है कि यह सारे अधिनियम मनमोहन सिंह और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार की नीतियों के कारण आप्रासंगिक हो चुके हैं। जैसे राजीव गांधी के शासन काल में बंजर धरती को उपजाऊ बनाने पर बड़ा जोर था। अब लोग इसे भूल चुके हैं। बीच में रेगिस्तान की हवा भी बही थी। बड़ी परेशानी दिखा रही थी दुनिया अपने रेगिस्तानीकरण पर। यह भी एक अजीब मजाक है कि जब सब को पता है सारा का सारा विकास या विनाश कार्य इन्हीं एक्टों के बल पर होना है तो कार्य आरंभ के पहले ही सारी अनुमति क्यों नहीं ले ली जाती।

बहुत पहले 1980 के आस पास मैं जब बाघ बचाओ खेल में शामिल हुआ था तो बहुत सारे लोगों से मैंने सवाल पूछा था कि जब तक प्रोजेक्ट टाइगर नहीं उन्हें बचाने के लिए आया था तो कौन उन्हें बचा रहा था । तब भी और आज भी एक कही सुनी बात पर हम चल रहे हैं कि बीसवीं सदी की शुरुआत में इस देश ( यानी पाकिस्तान और बांग्ला देश ) 40 हजार बाघ थे । भैया किनती किसने की थी? उसके बाद 1969 में कहा गया कि सिर्फ भारत में 1927 मानी गई थी । फिर वही सवाल गिनती किसने की थी ? आज कल गिनती का कारोबारीकरण हो गया है कि भारत में 1411 बाघ हैं । जिस तारीख को यह आंकड़ा पेश हुआ था ,उसी दस्तावेज में साफ लिखा है कि यह अनुमान अधूरा है । फिर एक दिन इसे बढ़ा कर 1600 से ऊपर पहुंचा दिया जाता है । पर कारोबारीकरण में 1411 ही चल रहा है । कुछ बाघ बचाने वाले अब समुद्री तटों को बचा रहे हैं । तरह तरह के थान हो रहे हैं । उनके सच झूठ या प्रयासों पर मुझे कुछ नहीं कहना है । पर सच इतना है कि प्रकृति को बचाने का पाखंडी प्रयास बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है ।

पहले तो हमें कहा गया कि 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाओ।1980 से लगातार मनाया जा रहा है। इसी साल श्रीमती गांधी ने देश में एक नया मंत्रालय – पर्यावरण भी बना दिया। इस मंत्रालय में कृषि विभाग से काट कर वन भी दे दिया गया। वक्त के साथ तरह-तरह के नियम बने। संयुक्त राष्ट्र संघ भी तरह-तरह के दिन देता रहता है। जैसे 21 मार्च वन दिवस होता है। कोई एक दिन पृथ्वी दिवस भी होता है। पृथ्वी पर जितने अत्याचार हम कर सकते हैं, वह सब करने के बाद जिन्हें याद रखना हो रखें। 22 मई जैव विविधता दिवस होता है। यह जैव विविधता क्या होता है – मुझे नहीं मालूम। सच तो यह भी है कि बहुत सारे लोगों को नहीं मालूम है कि यह जैव विविधता क्या चीज है। अनेक राज्यों में इस जैव विविधता का जानकार भी एक वन अधिकारी ही होता है। अधिकांश मामलों में उसे भी पता नहीं होता कि जैव विविधता क्या होता है। एक सरकारी आयोजन के तौर पर इसे मनाया जाता है। जैव विविधता के तुरत बाद 5 जून को पर्यावरण को बचाया जाता है। कहीं कुछ बचता नहीं है। इन दिवसों की याद भी नहीं बचती है। बीच में कलाइमेट चेंज भी तो आ गया है।

अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र संघी दिवसीय पाखंडों से मुक्त हो कर और भारत सरकार के एक्टों की वाहियातपन से बाहर निकल कर समय के साथ नया एक्ट और नया दिवस की जरूरत है। चूंकि हिंदुवादी पाखंडी मानसिकता ने एक पूरी समझ को धार्मिक कर्मकांड और अनुष्ठान में बदल दिया है। इस कारण प्रकृति की देन मौसम के बदलाव और असली जैव विविधता के त्योहार नवरात्र को एक मौसम में रामनवमी और दूसरे मौसम में दशहरा में बदल दिया है। भारत के संदर्भ में जरूरत है फिर से कृषि सभ्यता और वन सभ्यता की एकता के के बल पर औद्योगिक सभ्यता के साथ तालमेल बनाने की।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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