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प्रयोग की जगह कमियों को दूर करने की पहल हो

[caption id="attachment_2331" align="alignleft" width="85"]सतीश सिंहसतीश सिंह[/caption] : सरकारी स्कूलों में तकरीबन 18 लाख शिक्षकों का जरुरत है : राज्यों के बीच आम सहमति बनना आसान नहीं होगा : गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों को नहीं दे पा रहे हैं : नये प्रयोग के खतरों के प्रति चिंता स्वाभाविक है। शिक्षा के मामले में ये खतरे और भी संवेदनशील हो जाते हैं। पर इन खतरों से अनभिज्ञ केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल शिक्षा के क्षेत्र में विगत 1 वर्ष से अपने प्रयोगों को जारी रखे हुए हैं। उनके लगातार सुधारात्मक प्रयोगों के बरक्स नया शिगुफा है आईआईटी के प्रतियोगिता परीक्षा में बदलाव लाना। वे चाहते हैं कि आईआईटी में दाखिले के लिए 12 वीं और राष्ट्रीय एप्टीट्यूड परीक्षा को आधार बनाया जाए। इसके तहत 70 फीसदी मान 12 वीं की परीक्षा का होगा और 30 फीसदी राष्ट्रीय एप्टीट्यूड परीक्षा का। इस परिवर्तन को अमलीजामा पहनाने के लिए श्री सिब्बल ने पहल कर दी है, लेकिन इस मुद्दे पर आईआईटी द्वारा गठित समिति की सिफारिश आनी अभी बाकी है। इस बदलाव के पीछे श्री सिब्बल का मकसद कैपिटेशन फीस और कोचिंग के रैकेट को खत्म करना है।

सतीश सिंह

सतीश सिंह

सतीश सिंह

: सरकारी स्कूलों में तकरीबन 18 लाख शिक्षकों का जरुरत है : राज्यों के बीच आम सहमति बनना आसान नहीं होगा : गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों को नहीं दे पा रहे हैं : नये प्रयोग के खतरों के प्रति चिंता स्वाभाविक है। शिक्षा के मामले में ये खतरे और भी संवेदनशील हो जाते हैं। पर इन खतरों से अनभिज्ञ केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल शिक्षा के क्षेत्र में विगत 1 वर्ष से अपने प्रयोगों को जारी रखे हुए हैं। उनके लगातार सुधारात्मक प्रयोगों के बरक्स नया शिगुफा है आईआईटी के प्रतियोगिता परीक्षा में बदलाव लाना। वे चाहते हैं कि आईआईटी में दाखिले के लिए 12 वीं और राष्ट्रीय एप्टीट्यूड परीक्षा को आधार बनाया जाए। इसके तहत 70 फीसदी मान 12 वीं की परीक्षा का होगा और 30 फीसदी राष्ट्रीय एप्टीट्यूड परीक्षा का। इस परिवर्तन को अमलीजामा पहनाने के लिए श्री सिब्बल ने पहल कर दी है, लेकिन इस मुद्दे पर आईआईटी द्वारा गठित समिति की सिफारिश आनी अभी बाकी है। इस बदलाव के पीछे श्री सिब्बल का मकसद कैपिटेशन फीस और कोचिंग के रैकेट को खत्म करना है।

इस कवायद का परिणाम सकारात्मक हो या नकारात्मक, किन्तु इसके मूल में समस्या यह है कि फिलहाल सभी राज्यों में 12 वीं के लिए एक समान सिलेबस नहीं हैं। ऐसे में श्री सिब्बल का यह प्रयोग ख्याली पुलाव साबित हो सकता है, क्योंकि सभी राज्यों में 12 वीं में एक समान सिलेबस को लागू करना आसान काम नहीं है। इस बाबत एनसीआरटी के सिलेबस को लागू किया जा सकता है, लेकिन जबतक यह सिलेबस रोजगार परक नहीं होगा, तब तक इस मुद्दे पर राज्यों के बीच आम सहमति बनना आसान नहीं होगा। इसी क्रम में श्री सिब्बल जल्द ही विदेशी संस्थान विधेयक भी लाने जा रहे हैं। उनका मानना है कि विदेशी संस्थान रोजगार परक शिक्षा को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनका इरादा 12 वीं में वोकेशनल कोर्स की शुरुआत करने का भी है।

कपिल सिब्बल बदलते परिवेश में इस तरह की व्यवस्था करना चाहते हैं, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार राज्य सरकार को समय-समय पर बड़े भाई की तरह दिशा-निर्देशित करने का काम करे। इस संबंध में सार्वजनिक संपत्तियों का व्यावसायिक इस्तेमाल करके उसका उपयोग शिक्षा के प्रचार-प्रसार में करना सबसे अहम् मुद्दा है। चूँकि हर राज्य की अलग-अलग विशेषता होती है। अस्तु हर राज्य के लिए यह प्रयोग अलग तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि संसाधनों का अधिकतम दोहन किया जा सके। श्री सिब्बल की अगुआई में स्कूलों व कॉलेजों में शिक्षण का कार्य सत्रों में करने की भी तैयारी चल रही है। दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज में यह व्यवस्था लागू भी कर दी गई है। शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हमेशा से ही मांगपरक मुद्दा रहा है। बावजूद इसके हमारे लिए सुधार के साथ-साथ सभी को शिक्षित करना सबसे महत्वपूर्ण विषय होना चाहिए।

अभी भी भारत में साक्षरता दर बहुत कम है। इसलिए हमें शहरों के साथ-साथ गाँवों पर भी समान रुप से ध्यान देना होगा। वर्तमान में भारत में सकल नामांकन अनुपात मात्र 12.4 फीसदी है। जबकि इसी संदर्भ में विश्‍व का औसत 25 फीसदी और विकसित देशों का 50 फीसदी है। पिछड़े देशों में यह औसत 6 फीसदी है। इस तरह से देखा जाए तो इस मामले में हमारी स्थिति पिछड़े देशों के आस-पास है।
लिहाजा आज देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि हमारे घर का हर बच्चा स्कूल जाए। फिलवक्त भारतीय शिक्षा जगत कुशल और प्रशिक्षित अघ्यापकों की भारी कमी से दो-चार हो रहा है। इस समय सरकारी स्कूलों में तकरीबन 18 लाख शिक्षकों का जरुरत है। कुछ राज्यों में संविदा के आधार पर अघ्यापकों को अवश्‍य बहाल किया गया है। परन्तु संविदा पर नियुक्त शिक्षकों की तनख्वाह इतनी कम है कि वे चाहकर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों को नहीं दे पा रहे हैं।

हो सकता है कि राज्य सरकारें धन की कमी से जूझ रही हों, लेकिन शिक्षा एक मूलभूत आवश्‍यकता है और इसकी राह में हम धन की कमी को अड़चन नहीं बना सकते हैं। सर्वशिक्षा अभियान में केंद्र और राज्य सरकार को बिना किसी लाग-लपेट के एक-दूसरे का सहयोग करना चाहिए। तभी 100 प्रतिशत साक्षरता की संकल्पना मूर्त्त रुप ले सकती है। हाल ही में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने 6000 मॉडल स्कूल खोलने की घोषणा की थी। 6000 में से 3500 स्कूलों को अति पिछड़े इलाकों में खोलने का प्रस्ताव है और 2500 स्कूलों को कम पिछड़े हुए इलाकों में। 2500 स्कूलों को सरकार निजी क्षेत्र के सहयोग से खोलेगी। इस व्यवस्था के अंतर्गत 1000 छात्रों को सरकार वजीफा देगी और 1500 छात्रों को निजी निवेशक।

इसमें दो राय नहीं है कि शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र का योगदान सकारात्मक रहा है। फिलहाल अजीम प्रेमजी तथा भारती मित्तल शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। फिर भी इस दिशा में बहुत सारे सुधारों की जरुरत है। निजी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या है उनके द्वारा वसूल की जाने वाली फीस और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव। भारत में गरीबी का प्रतिशत बहुत ज्यादा है। लिहाजा शत्-प्रतिशत साक्षरता का हमारा सपना तब तक साकार नहीं हो सकता है जब तक शिक्षा सर्वसुलभ न बन जाए। हमारा उद्देश्‍य नित दिन नये प्रयोग करने की बजाए, वर्तमान में चल रही समस्याओं से शिक्षा जगत को मुक्त करवाने का होना चाहिए। सरकार को ऐसी योजनाओं को लागू करना चाहिए, जिससे सभी बच्चे स्कूल जाने के लिए प्रेरित हों। नये प्रयोगों से बच्चों की उलझनों के पेंच और भी उलझ सकते हैं।

लेखक सतीश सिंह स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और स्वतंत्र लेखन करते हैं.

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