अन्ना हजारे ने बेइमानों के खिलाफ हल्ला बोल दिया है। देखते ही देखते सैकड़ों लोग उनके मुरीद हो गये हैं। अपनी बात कहने के पहले अन्ना हजारे को मेरा सलाम। इस मुहिम से जुड़े कितने लोगों का यह मालूम है कि वास्तव में भ्रष्टाचार होता क्या है? पहली बात तो यह कि जो लोग अन्ना हजारे के साथ बेइमानों के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं अथवा हो गये हैं, उनमें से ऐसे कितने लोग हैं जो राशनकार्ड बनवाने, रेल में आरक्षण पाने, टेलीफोन के बिल पटाने में बचने की कोशिश, बिजली की चोरी या ऐसे ही रोजमर्रा की जरूरत को जल्द से जल्द निपटा लेने के लिये रिश्वत नहीं दिया है?
मेरे खयाल में कुछ प्रतिशत को ऐसे लोग होंगे किन्तु इनकी संख्या मुट्ठी भर होगी और उन लोगों की तादात अधिक होगी जो कहेंगे कि बेइमानी तो अब हमारे जीवन का हिस्सा बन चुका है यानी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने और बताने वालों की संख्या अधिक है। क्या हम ऐसा सोचकर अथवा अपना समय बचाने के लिये जो बेइमानी कर रहे हैं, क्या वह इस मिशन के खिलाफ नहीं है।
दरअसल जीवन में बहुत सारी ऐसी गलतियां हम करते हैं और कर रहे हैं जिन्हें हम बेइमानी नहीं मानते हैं। अक्सर यह बात कही जाती है कि फलां अफसर बेहतरीन काम करता है। क्या किसी के पास जवाब है कि एक सरकारी मुलाजिम, भले ही वह अफसर क्यों न हो, सरकार खराब काम करने का वेतन देती है? जवाब ना में होगा तो फिर भला हम क्यों इनकी तारीफ के पुल बांधे? हमें इस बात का इल्म भी नहीं होता है कि एक आदमी की तारीफ करने से दूसरे अनेक लोगों में हीनभावना घरकर आती है, जिससे पूरा तंत्र प्रभावित होता है और कदाचित बेइमानी की शुरुआत यहीं कहीं से होती है। सिर्फ पैसा लेना ही भ्रष्टाचार नहीं है बल्कि इसकी कहानी एक बड़े केनवास पर है।
जनलोकपाल बनना चाहिए और सरकार के साथ साथ पूरे देश को इसके लिये पहल करनी चाहिए किन्तु यह जनलोकपाल कागजी घोड़ा न बन कर रह जाए। मध्यप्रदेश में लोकसेवा गारंटी अधिनियम लागू है। काम की समय-सीमा भी सरकार ने तय कर दी है किन्तु वास्तव में क्या ऐसा हो रहा है? इस बात की पड़ताल की जानी चाहिए। सरकार ने ऐलान कर दिया कि शासकीय सेवकों को भ्रष्टाचार के लिये दंडित किया जाएगा किन्तु आज तक कितने ऐसे भ्रष्टों को सजा मिली है, सरकार बताने की स्थिति में नहीं है। छापे डल रहे हैं, माल निकल रहा है और एक नया भ्रष्ट बाहर आ रहा है, किन्तु जांच पर जांच और तारीखों पर तारीख के चलते मामला जस का तस बना हुआ है। सरकार कह सकती है कि हम बेइमानों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं किन्तु दंड तो तभी मिलेगा जब अपराध साबित होगा।
मेरी अपनी निजी सोच यही है कि अन्ना हजारे जैसे इस देश में सौ-पचास नहीं बल्कि लाखों की संख्या में ईमानदार लोग हैं, जिनके लिये पैसे से बढ़कर वतन है। ऐसे लोगों को सामने लाइये और लोगों के लिये उन्हें रोल मॉडल के तौर पर प्रस्तुत कीजिये। आज की पीढ़ी तो भ्रष्टाचार में डूब चुकी है। बचाना है तो भविष्य को बचाइए। बचपन को बचाइए। उन्हें सिखायें कि ईमानदारी का फल क्या होता है। हर पिता, हर माता अपने बच्चों को नेक कथायें पढ़ायें और उनमें संयम उत्पन्न करें। धीरज रखना सिखायें न कि काम निकालने के लिये रिश्वत देकर समय बचाने की आदत डालें। उन्हें लोभ और लालच से बचायें। बच्चों को बचा लिया तो आप यकीन मानिये कि हमारा आने वाला कल बेइमान नहीं होगा। एक अन्ना हजारे के सामने आने से देश का भला नहीं होने वाला और न ही बेइमानों का पत्ता साफ होगा। यह कोशिश जारी रहना चाहिए लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है बचपन को बचाना। बचपन बचा लिया तो मान लीजिये कि भ्रष्टाचार की जंग आपने जीत ली है।
लेखक मनोज कुमार स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं. वर्ष 1981 से पत्रकारिता में हैं. फिलवक्त मीडिया की मासिक पत्रिका ‘समागम’ के प्रकाशक एवं संपादक हैं.

