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संगीत-सिनेमा

बदल चुका है सपनों का बॉलीवुड और इसका अफसाना

: भारतीय सिनेमा का कल आज और कल : इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के आगाज के साथ ही हॉलीवुड और बॉलीवुड की दूरियां सिमटी हैं। आज किसी बड़ी फिल्म के एक साथ डेढ़ से दो हजार प्रिंट रिलीज होना बड़ी बात नहीं है। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई के साथ-साथ ओवरसीज मार्केट खासकर खाड़ी के देशों, अमेरिका व इंग्लैंड में बॉलीवुड फिल्में रिलीज होती हैं। सितारों की गतिविधियां व रुचियां बदल रही हैं। वे विज्ञापनों में झलक दिखाने के साथ-साथ फेसबुक और आरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जाकर ट्विट करने लगे हैं। छोटे परदे के रियलटी शो के होस्ट, जज और गेस्ट बने नजर आ रहे हैं। छोटे परदे के धारावाहिकों के निर्माण, निर्देशन एवं अभिनय में तो वे पहले से ही संलग्न थे। एक दौर था जब किरण कुमार, धीरज कुमार, रीता भादुड़ी, परीक्षित साहनी जैसे कलाकारों ने बड़े परदे पर लंबी असफलता और गुमनामी का दौर झेलने के बाद छोटे परदे की ओर रुख किया था।

: भारतीय सिनेमा का कल आज और कल : इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के आगाज के साथ ही हॉलीवुड और बॉलीवुड की दूरियां सिमटी हैं। आज किसी बड़ी फिल्म के एक साथ डेढ़ से दो हजार प्रिंट रिलीज होना बड़ी बात नहीं है। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई के साथ-साथ ओवरसीज मार्केट खासकर खाड़ी के देशों, अमेरिका व इंग्लैंड में बॉलीवुड फिल्में रिलीज होती हैं। सितारों की गतिविधियां व रुचियां बदल रही हैं। वे विज्ञापनों में झलक दिखाने के साथ-साथ फेसबुक और आरकुट जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जाकर ट्विट करने लगे हैं। छोटे परदे के रियलटी शो के होस्ट, जज और गेस्ट बने नजर आ रहे हैं। छोटे परदे के धारावाहिकों के निर्माण, निर्देशन एवं अभिनय में तो वे पहले से ही संलग्न थे। एक दौर था जब किरण कुमार, धीरज कुमार, रीता भादुड़ी, परीक्षित साहनी जैसे कलाकारों ने बड़े परदे पर लंबी असफलता और गुमनामी का दौर झेलने के बाद छोटे परदे की ओर रुख किया था।

आज अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान, अक्षय कुमार जैसे बड़े सितारे टीवी के रियलिटी शो होस्ट करके न सिर्फ अपने दर्शकों व प्रशंसकों की तादाद बढ़ा रहे हैं बल्कि भारी मुनाफा भी वसूल रहे हैं। राजनीति में हाथ आजमाने के साथ-साथ ही ये समाजसेवी संगठनों से भी जुड़ने लगे हैं। सोशल वर्क में संलग्नता तथा एनजीओ के लिए फण्ड अरेंजिंग इनकी ताजा गतिविधियां हैं। पुराना कलेवर टूट रहा है। अब सुपर स्टार को लेकर मीडिया में कोई बहस नहीं छिड़ती है। मुंबइया फिल्मोद्योग के अंतिम सुपर स्टार शाहरुख खान माने जा सकते हैं। उनके मुकाबले यदि कोई ठहरता है तो वह हैं अमिताभ बच्चन। जिनका जादू और करिश्‍मा 67 साल की उम्र में भी कायम है। आप खान बंधुओं आमिर-सलमान-सैफ और खिलाड़ी अक्षय कुमार का भी नाम ले सकते हैं।

पचास साल के हो चुके संजू बाबा भी मुन्ना भाई एमबीबीएस की अभूतपूर्व सफलता के बाद बुलंदियों पर हैं। सितारों का नया शगल आईपीएल फ्रेंचाइजी खरीदने का है। शाहरुख खान, जूही चावला, शिल्‍पा शेट्टी, प्रीति जिंटा इस धंधे में हाथ आजमा चुके हैं। अब वह दौर नहीं रहा, जब फिल्में सौ दिनों तक चलने पर ही सफल मानी जाती थी। आज एक साथ दो हजार प्रिंट रिलीज करके दो हफ्ते 95 फीसदी से अधिक बॉक्स आफिस कलेक्‍शन पर फिल्म को हिट मान लिया जाता है। बड़े निर्माता-निर्देशक अपनी फिल्मों के प्रसारण अधिकार टीवी चैनलों को बेच रहे हैं। चैनलों के बीच नयी फिल्मों के टीवी प्रीमियर की होड़ मची हुई है।

एकल थियेटरों का जमाना लद चुका है। ये एक-एक करके बंद हो रहे हैं। मल्टी प्लेक्स ने बाजी पलट करके रख दी है। बचे खुचे दर्शक टीवी चैनलों के मोहपाश में जकड़ चुके हैं। फिल्मों की लोकप्रियता का पैमाना बदल रहा है। अब कोई स्टार सिस्टम का नहीं जिक्र करता। लोकप्रिय फिल्मी जोड़ियों का क्रेज पुराना पड़ चुका है। सिल्वर जुबली व गोल्डेन जुबली मनाने वाली फिल्में इक्का दुक्का आ पाती हैं। अधिकतम पचास दिन चलने पर फिल्म जबर्दस्त हिट मान ली जाती है। ज्यादातर फिल्में एक हफ्ते में थियेटर से उतर जाती हैं। अभिनेताओं एवं अभिनेत्रियों की सामाजिक गतिविधियों व व्यावसायिक प्राथमिकताओं के आयाम बदल गये हैं। ऐवर्य राय, सुष्मिता सेन, डायना हेडन, युक्ता मुखी, प्रियंका चोपड़ा सरीखी अभिनेत्रियां, जो मिस इण्डिया और मिस वर्ल्‍ड या यूनविर्स के जरिये मुम्बइया फिल्मों में चमकीं अब वह दौर थम चुका है।

दर्शकों की पसंद बदल रही है। हॉलीवुड की ओरिजनल लेकिन हिंदी में डब फिल्में मुनाफा वसूलने लगी हैं। रितिक रोशन और बराबरा मूरी की जोड़ी की चारों ओर चर्चा है। ऐश्वर्य राय सरीखी मुंबइया फिल्मोद्योग की चोटी की हीरोइन कई बड़ी हॉलीवुड फिल्मों में काम कर चुकी हैं। स्लमडाग मिलिनेयर का जादू आज भी छाया हुआ है। स्टीवन स्पिलबर्ग जैसे निर्देशक मुंबइया फिल्मोद्योग से खासे प्रभावित हैं और हिंदी में फिल्में बनाने जा रहे हैं। हिंदी फिल्मों की कहानी भी किसी फिल्म की तरह ही दिलचस्प और नाटकीय है।

यह शुरू हुई 1932-33 में हरिश्‍चंद्र-तारामती से। दादा साहेब फाल्के का दौर था तब। उस वक्त फिल्में मूक हुआ करती थी। बाद में सवाक फिल्मों का दौर शुरू हुआ। न्यूथियेटर्स, प्रभात, फिल्मिस्तान, मेहबूब स्टूडियो का जलवा था। पीसी बरुआ की देवदास, केएल सहगल की रतन, शाहजहां की आदमी, डाक्टर कोटनीस की अमर कहानी तथा सोहराब मोदी की पुकार, झांसी की रानी जैसी फिल्में हिट हुईं। व्‍ही शांताराम और मेहबूब ने सामाजिक सरोकार को फिल्मों से जोड़ा। स्टूडियो सिस्टम का बोलबाला था। निर्देशक सबसे ज्यादा तवज्जो पाता था। नायक-नायिकाओं को मासिक वेतन मिलता था। यही कोई डेढ़ – दो सौ रुपये महीना। अभिनेता व अभिनेत्रियां लोकल ट्रेन से सफर करते थे। वे यूनिट के साथ बैठ कर लंच लेते थे।

सेट पर अनुशासन इतना सख्त था कि हीरोइन से रोमांस करना तो दूर चोरी छिपे सिगरेट पीते थे हीरो। अक्सर इनडोर शूटिंग होती थी। ज्यादातर फिल्में ब्लैक एण्ड ह्वाइट बनती थीं। फिल्मों में म्यूजिक पर खास जोर दिया जाता था। संगीत निर्देशकों व गायक-गायिकाओं को ज्यादा पैसे दिये जाते थे। संवाद अदायगी के लिए बाकायदा हिंदी व उर्दू बोलने की ट्रेनिंग दी जाती थी। हिंदी फिल्मों पर न्यू थियेटर्स, पारसी थियेटर व मराठी रंगमंच का असर पड़ा। बाद में साउथ के मद्रासी सिनेमा ने भी अलग रंग डाला। जेमिनी, एवीएम, एलवी प्रसाद की सामाजिक व पारिवारिक फिल्मों का जादू सबके सिर चढ़ करके बोला।

मुंबइया फिल्मों में स्टार सिस्टम शुरू हुआ 1940 के दशक से। देविका रानी और अशोक कुमार के फिल्म ‘अछूत कन्या’ के रिलीज होने के साथ ही हिंदी फिल्मों को मिला पहला बड़ा सितारा। बंधन, कंगन, झूला, किस्मत और महल जैसी फिल्मों के साथ अशोक कुमार छा गये बड़े परदे पर। उन दिनों कोलकाता के एक थियेटर में किस्मत लगातार साढ़े तीन साल तक चली थी। इसी दशक में दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर की तिकड़ी उभर करके सामने आयी। इस तिकड़ी ने हिंदी फिल्मों का व्याकरण ही बदल करके रख दिया।

दिलीप कुमार ट्रेजडी किंग कहलाये तो राज कपूर ग्रेटेस्ट शो मैन। देव आनंद ने सदाबाहर नायक की नई छवि गढ़ी। दिलीप कुमार पर शुरू में मार्लिन ब्राण्डो का असर था तो देव आनंद ग्रेगरी पैक और राजकपूर चार्ली चैपलिन से प्रभावित थे। बाद में इन्‍होंने अपनी स्क्रीन इमेज बनायी। दिलीप कुमार जहां अभिनय तक ही व्यस्त रहे वहीं देव आनंद तथा राज कपूर ने फिल्म निर्माण व निर्देशन में भी अविस्मरणीय योगदान दिया। राज कपूर और नरगिस की जोड़ी बनी तो दिलीप कुमार-मधुबाला व देव आनंद-सुरैया के रोमांस के किस्से देश भर में फैले।

राज कपूर ने आरके फिल्म्स तथा देव आनंद ने नवकेतन की नींव डाल करके फिल्म निर्माण को नयी पहचान दी। पचास के दशक में राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त और शम्मी कपूर जैसे नायक सामने आये तो साठ के दशक में धर्मेंद्र, मनोज कुमार, फिरोज खान, संजय खान को नयी पहचान मिली। इसी दरम्यान अपनी खलनायकी से प्राण तथा कॉमेडी भूमिकाओं से महमूद सब पर भारी पड़े। यही वह दौर था जब एण्टी हीरो की इमेज को वक्त, हमराज, पैगाम जैसी फिल्मों के दम पर राजकुमार नयी बुलंदियों तक ले गये।

1940 से1960 का दशक आते आते फिल्में श्वेत-श्‍याम से रंगीन हो चुकी थीं। आउटडोर शूटिंग के नाम पर कश्‍मीर की वादियों तक पहुंचीं। शुरू में फिल्मों के हिट होने में गानों की जबर्दस्त भूमिका होती थी, लिहाजा रेडियो सीलोन तथा विविध भारती जैसे स्टेशन श्रोताओं की पसंद बने। इसी दौर ने पहले बिनाका और बाद में सिबाका गीतमाला के जरिये अमीन सयानी को स्टार अनाउंसर बनाया। तबस्सुम को नयी पहचान दी। यही वह दौर था जब माधुरी, फिल्म फेयर, फिल्मी कलियां व फिल्मी दुनिया जैसी पत्रिकाएं घर-घर पढ़ी जाने लगीं। फिल्मी हीरो-हीरोइन परीलोक के शहजादे-शहजादियां बन करके आम आदमी के सपनों में समाने लगे। उसके दिन का चैन और रातों की नींद उड़ाने लगे। उसके लिए मसीहा बनते चले गये। उन्हें देखने व छूने की हसरत बेकाबू होने लगी। उनके बारे में सब कुछ तफसील के साथ जान लेने का नशा कमोबेश सब पर तारी था।

यह दौर स्टार सिस्टम के बनने और लगातार पुख्ता होने का था। यहां नायिकाओं का जिक्र लाजिमी है। एक वह भी दौर था जब भले घरों की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थीं। शुरुआत में जब मूक फिल्मों का दौर था, पुरुष कलाकार ही महिलाओं के चरित्र अदा करते थे। रुबी मेयर्स, सुलोचना, दुर्गा खोटे, कामिनी कौशल, देविका रानी, लीला चिटणिस, नसीम बानो जैसी नायिकाओं ने हीरोइन के किरदार को फिल्मी परदे के साथ-साथ सामाजिक जिंदगी में भी नयी पहचान दी। नायिका को उसके भरपूर दमखम के साथ स्थापित किया नरगिस, सुरैया, मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयन्ती माला, नूतन और माला सिन्हा सरीखी अभिनेत्रियों ने। इस ट्रेण्ड को आगे बढ़ाया आशा पारेख, शर्मिला टैगोर, साधना, मुमताज, हेमा मालिनी, रेखा सरीखी नायिकाओं ने।1970 के दशक में जब कला फिल्मों का जोर था शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल जैसी नायिकाओं ने अपनी पहचान बनाई। आगे चल कर श्री देवी, जया प्रदा, ऐश्वर्य राय, प्रियंका चोपड़ा ने इसे नई बुलंदी पर पहुंचाया।

1970 के दशक में मुंबइया फिल्मों का स्टार सिस्टम सुपर स्टारडम के दौर में दिखाई दिया। 1969 में आराधना के हिट होते ही राजेश खन्ना सबको पीछे छोड़ करके हिंदी फिल्मों के पहले सुपर स्टार बन गये। उनकी सुपर स्टारडम 1971-72 तक जारी रही। 1973 में जंजीर के रिलीज होते ही राजेश खन्ना का सिंहासन डोल उठा। एक नया सुपर स्टार उभरा। अमिताभ बच्चन। आज भी बिग बी किवदंती बने हुए हैं। लगातार चार दशकों से सक्रिय और सफल। बात अगर सुपर स्टारडम की करे तो शाहरुख खान मुंबइया फिल्मों के आखिरी सुपर स्टार माने जा सकते हैं। किंग खान सचमुच बादशाह हैं। उनका अपना अलग ही अंदाज है। जो प्रोफाइल उन्होंने बनाई वह और किसी के बूते की बात नहीं। फौजी और सर्कस जैसे टीवी सीरियल्स से बड़े परदे पर आने और आकर छा जाने वाले शाहरुख खान ने रियलिटी शो और आईपीएल फ्रेंचाइजी केकेआरके के जरिये फिल्मोद्योग को नई पहचान दी है। अनगिनत विज्ञापनों में दिख चुके हैं वह।

राजनीति से फिल्मों का नाता पुराना है। सुदूर दक्षिण में एमजीआर लोकप्रिय नायक थे। जय ललिता उनकी नायिका थीं, बाद में वह अंतरंग राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं। एमजीआर ने अन्ना द्रमुक बनाई व तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन बैठे। जयललिता भी आगे चल करके तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। अन्नाद्रमुक की चिर विरोधी द्रमुक के पितामह पुरुष एम.करुणानिधि सफल पटकथा लेखक थे। इसी तरह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले एन.टी रामाराव तेलुगू फिल्मों के सुपर स्टार थे। इन दिनों आंध्र प्रदेश में प्रजा राज्यम् पार्टी के जरिये चिरंजीवी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। शिवाजी गणेशन, राजकुमार, ममूटी, रजनीकांत तथा कमल हासन भी दक्षिण भारतीय फिल्मों के बहुत बड़े स्टार हैं। यह अलग बात है कि इन्होंने राजनीति के मैदान में उतनी सक्रियता नहीं दिखायी। हां वैजयन्ती माला बाली कांग्रेस की सांसद रह चुकी हैं।

अगर उत्तर भारत के अभिनेताओं की चर्चा करें तो सबसे पहले राज्य सभा में पहुंचे पृथ्वीराज कपूर। उनके बाद नरगिस राज्यसभा सदस्य बनीं। नरगिस के निधन के बाद सुनील दत्त राजनीति में आये, वे कई बार मुंबई पश्चिम से जीते। इन दिनों इस सीट से प्रिया दत्त उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। सुनील दत्त के बेटे संजय दत्त ने भी राजनीति से रिश्‍ता जोड़ा था। जब समाजवादी पार्टी में अमर सिंह का बोलबाला था, संजय दत्त ने लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहा था। वे सपा के राष्ट्रीय महासचिव भी बने और कई चुनावी सभाओं में शिरकत की। तकनीकी कारणों के चलते संजय दत्त लखनऊ लोकसभा सीट से चुनाव न लड़ सके। यह अलग बात है कि सपा से अमर सिंह के रिश्‍ते खत्म होते ही उन्होंने भी राजनीति से पल्ला झाड़ लिया।

इसी तरह 1984 में इलाहाबाद लोकसभा सीट से महानायक अमिताभ बच्चन ने चुनाव लड़ा था और हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे राजनैतिक दिग्गज को हराया था। बाद में बोफोर्स घोटाले में नाम आ जाने के बाद अमिताभ ने राजनीति से तौबा करके फिल्मों का रुख कर लिया। यह अलग बात है कि अमर सिंह से दोस्ती के चलते उन्होंने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव की मदद  की लेकिन कभी खुल करके वे राजनीति के मैदान में नहीं आये। अलबत्ता उनकी पत्नी जया बच्चन जरूर राज्यसभा सदस्य बनीं।

भाजपा ने शत्रुघ्न सिन्हा, हेमा मालिनी, विनोद खन्ना जैसे सितारों को आगे बढ़ाया। शत्रुघ्न सिन्हा तो अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में बाकायदा कैबिनेट में मंत्री भी रह चुके हैं। बिहारी बाबू के नाम से माहूर शत्रुघ्न सिन्हा की आज भी दबी हसरत है कि वे बिहार के मुख्यमंत्री बन जाएं। विनोद खन्ना को राजग कार्यकाल में राज्यमंत्री बनाया गया। राज बब्बर भी फिल्मों के बाद राजनीति के मैदान में डटे हुए हैं। इन दिनों वे कांग्रेस के टिकट पर फिरोजाबाद लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इससे पहले राज बब्बर सपा के समर्पित कार्यकर्ता व अग्रणी नेता थे।

गोविंदा और धर्मेंद्र ने भी फिल्मों के बाद राजनीति के मैदान में कदम रखा लेकिन इन्हें राजनीति रास नहीं आई। धर्मेंद्र तो इन दिनों रिटायर्ड लाइफ बिता रहे हैं अलबत्ता गोविंदा जरूर दूसरी पारी की तलाश में हैं। इन तमाम सितारों की राजनीतिक सक्रियता से एक बात तो समझ में आती है कि मुंबइया फिल्मों के नायक-नायिकाओं के बीच सामाजिक सरोकार भले ही न हो लेकिन उन्हें अपनी ग्लैमराइज्ड इमेज का भरपूर अहसास रहता है। इसे वे गाहे-बगाहे कैश  कराना भी जानते हैं। अब चाहे राजनीति का मैदान हो या फिर विज्ञापनों की दुनिया ये बढ़चढ़ कर हर रेस में शामिल होते हैं और अक्सर बाजी भी इनके हाथ लगती है। वैसे हर पल आम जनता के दु:ख दर्द से ज्यादा इन्हें अपनी स्क्रीन इमेज की परवाह सताती है।

लेखक प्रदीप उपाध्याय पत्रकार हैं.

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