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बरखा, प्रभु जैसे लोगों ने बदल दिए पत्रकारिता के मायने

पत्रकारिता के लक्ष्य के विषय में चर्चा करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि पत्रकारिता क्या है? पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं है जो किसी लाभ या धन के लोभ के लिए किया जाए। यह एक दायित्‍व है, जिसमें पत्रकार या संवाददाता समाचार पत्र अथवा टीवी के माध्यम से आम जनमानस की “जानने” की जिज्ञासा को पूरा करते हैं। यदि हम पत्रकारिता के प्रारभं का जिक्र करें तो हमारे पुराणों में देवर्षि नारद को इस विधा के प्रणेता का श्रेय जाता है। देवर्षि नारद ने बिना किसी भय और लालच के तात्कालीन लोक में समाचार का संचार किया। उन्होंने अपने अन्दर की जिज्ञासा को जन-जन की आवश्यकता मानते हुए समाचार को जानना और उसकी पुष्टि करने के बाद उसको उचित माध्यम से प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने को अपने जीवन का एकमात्र उद्वेश्य बना लिया। पत्रकारिता के इस प्रारभं काल के बाद इस विधा का विकास होता गया और यह एक साधारण संचार प्रकिया से विकसित होकर एक वृहद और समाज को एक धागे में पिरोने वाली संस्कृति के रूप में अवतरित हुई।

पत्रकारिता के लक्ष्य के विषय में चर्चा करने से पूर्व यह जानना आवश्यक है कि पत्रकारिता क्या है? पत्रकारिता कोई व्यवसाय नहीं है जो किसी लाभ या धन के लोभ के लिए किया जाए। यह एक दायित्‍व है, जिसमें पत्रकार या संवाददाता समाचार पत्र अथवा टीवी के माध्यम से आम जनमानस की “जानने” की जिज्ञासा को पूरा करते हैं। यदि हम पत्रकारिता के प्रारभं का जिक्र करें तो हमारे पुराणों में देवर्षि नारद को इस विधा के प्रणेता का श्रेय जाता है। देवर्षि नारद ने बिना किसी भय और लालच के तात्कालीन लोक में समाचार का संचार किया। उन्होंने अपने अन्दर की जिज्ञासा को जन-जन की आवश्यकता मानते हुए समाचार को जानना और उसकी पुष्टि करने के बाद उसको उचित माध्यम से प्राप्तकर्ता तक पहुंचाने को अपने जीवन का एकमात्र उद्वेश्य बना लिया। पत्रकारिता के इस प्रारभं काल के बाद इस विधा का विकास होता गया और यह एक साधारण संचार प्रकिया से विकसित होकर एक वृहद और समाज को एक धागे में पिरोने वाली संस्कृति के रूप में अवतरित हुई।

धीरे-धीरे पत्रकारिता ने खु़द को समाज के एक अभिन्न अंग के रूप में स्थापित कर लिया। वैश्विक स्तर पर दुनिया के विभिन्न देशों में इस बात के पुख्ता सबूत भी मिले हैं कि समाज को एक दिशा देने में इस विधा का योगदान अतुलनीय रहा है। तभी तो दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह नेपोलियन ने कहा –  I fear three newspapers more than a hundred thousand bayonets.

आजादी की पत्रकारिता :  यह सर्वविदित है कि भारत के आजादी के संघर्ष में पत्रकारिता का एक अहम स्थान था। अंग्रेजी हुकूमत ने भी स्‍वीकार किया था कि यदि तात्कालीन प्रकाशनों पर नियंत्रण पा लिया गया होता तो उन्हें पराजित नहीं होना पड़ता। उस समय जनमानस तक सही सूचनाएं पहुंचाना युद्व जीतने के समतुल्य माना जाता था। और पत्रों के माध्यम से ही लोग आपस में सूचनाएं बांटते थे। इसी उद्वेश्य से पर्चा बांटने की शुरुआत हुई। और जनता बिना किसी स्वार्थ के हरसभंव प्रारूप में पत्रकारिता में अपना योगदान दे रही थी। महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय, सरदार पटेल जैसे महान समाज सेवक अपने बेबाक और निडर लेखों से ही लोगों के दिलों में अपनी पहचान और अंग्रेजों में भय पैदा करने में कामयाब रहे थे। महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ कोई युद्व नहीं लड़ा था, बल्कि भारतीयों को उनसे ना डरने की कला सिखाई थी। गांधी जी ने अपने लेखों ओर प्रकाशनों से यह बता दिया था कि जो ताकत कलम में है वो बदूंक में कभी नहीं हो सकती है।

सरदार भगत सिंह को अमरत्व दिलाने में अंग्रेजी दैनिक द ट्रिब्यून के योगदान को र्निर्भीक और सच्ची पत्रकारिता के मिसाल के तौर पर माना गया है। तात्कालीन द ट्रिब्यून की टीम ने जिस साहस से खबरों का चयन और प्रकाशन किया, उसे आज भी सलाम किया जाता है। पत्रकारिता के ऐसे और भी कई उदाहरण हैं, जिनके बिना भारत की आजादी के संघर्ष की कहानी पूरी नहीं हो सकती।

लेकिन तब की पत्रकारिता में एक स्तर था। लोग पत्रकारों को देव तुल्य मानते थे और जितना विश्वास भगवान और अल्लाह पर करते थे, उतना ही विश्वास पत्रकारों पर भी करते थे। पत्र और पत्रकार भी अपनी जिम्मेदारी को भलीभांति समझते थे। और इसी जिम्मेदारी के साथ समाचारों का प्रकाशन करते थे। तब के पत्र ऐसे खबरों से किनारा रखते थे, जो स्तरहीन होते थे और जिनसे समाज़ में गलत संस्कृति की शुरुआत होने का भय होता था। साथ ही ऐसे किसी भी ख़बर का हिस्सा नहीं बनते थे, जिनसे जनता में भय और अधंविश्‍वास फैले।

लेकिन वर्तमान संदर्भ में पत्रकारिता के अर्थ में बदलाव आ गया है। आज के राकेट युग में लोगों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। समाज और उसके विकास की जिम्मेदारी ने अपना चोला बदल कर ठेकेदारी का चोला पहन लिया है। इसीलिए लोगों की परिभाषा बदल गई और वो पाठक से दर्शक बन गए। समाचार पत्र खासकर हिन्दी समाचार पत्र अपने गौरवशाली इतिहास को बचाए रखने के लिए दिन रात संघर्षशील हैं। समाचार पत्र जगत भी टेलीविजन की राह पर अग्रसर हो रहा है। ख़बरों में तथ्य कम और मसाला ज्यादा डालने की परंपरा शनै शनै बढ़ रही है।

जनता की अंग्रेज बनने की चाहत और अमेरिका प्रेम ने पत्रकारिता को भी बदलने पर मजबूर कर दिया है। आज पत्रकारिता समाज को दिशा देने वाली संस्कृति की विशाल पदवी से नीचे गिर कर धनार्जन करने का एक सुलभ स्रोत बन कर रह गया है। आज से करीब सौ साल पहले भारत की आजादी की लड़ाई के एक अतिआवश्यक हथियार के रूप में प्रसिद्वि पाकर जनजन में एक सम्मानीय स्थान बना चुके पत्रकारों के उस जमात में, जिसमें महात्मा गांधी और भगत सिंह जैसे नाम थे, से आज बरखा दत्त, प्रभु चावला और उन जैसे अन्य प्रत्रकारों तक के सफर ने पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए हैं। आज पत्रकारिता एक जिम्मेदारी न होकर एक कारपोरेट व्यवसाय में तब्दील हो गया है। पैसा कमाने के लिए स्टिंग आपरेशन, खोजी पत्रकारिता और सच बताने के नाम पर नए नए रास्तों की खोज दिन-रात जारी है। आज की इस 3जी दुनिया में जहां लोगों के पास समय कम होता है तो न्यूज़ चैनलों के पास दर्शक रोकने के लिए मसालेदार ख़बरो का होना जरूरी बनता जा रहा है, तभी तो कभी बाबाओं और कभी बेबियों से ही चैनल अपना काम चला रहे हैं।

नेशनल ब्राडकास्टिगं चैनल के पूर्व प्रस्तुतकर्ता डेविड ब्रिकंले के अनुसार – “टेलिविज़न एक काम बखूबी करता है और वह काम है जब कोई ख़बर ना हो तो उसे भी ख़बर बना देना.” आज के परिपेक्ष में पत्रकारिता अपने मूल आधार से भटक कर नए लक्ष्य स्थापित करती जा रही है, जो पत्रकारिता की आत्मा के साथ बलात्कार करने जैसा है। पत्रकारिता का सम्मान उसकी नींव में दफन आधारभूत सिद्वान्तों में है और बिना अपने सिद्वान्त के पत्रकारिता उस नाचने वाली के नाच की तरह हो जाएगी, जहां लोग आएंगे, पैसे लुटा कर मजे भी लेंगे, लेकिन अपने घर की इज्जत कभी नहीं बनाना चाहेंगे।

लेखक सतीश कुमार सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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