: दयानंद पांडेय का उपन्यास : संयोग ही था कि विवेक का बड़ा भाई भी थाईलैंड में था। विवेक और मुनमुन की दोस्ती की ख़बर जब उस तक पहुंची तो उस का माथा ठनका। उस ने राहुल से बात की और कहा कि, ‘भई अपनी बहन को समझाओ, मैं भी अपने भाई को समझाता हूं। नहीं, जो कहीं ऊंच-नीच हो गई तो दोनों परिवारों की बदनामी होगी।’ राहुल विवेक के भाई की बात सुन कर बौखला गया। उस ने पहला फ़ोन विवेक को ही किया और जितना भला-बुरा उस को कह सकता था कह गया। और बोला, ‘मेरी ही बहन मिली थी तुम्हें दोस्ती करने के लिए। बाइक पर बिठा कर घुमाने के लिए? क्यों मेरी पीठ में छुरा घोंप रहे हो?’
‘बात तो सुनो!’ विवेक ने कुछ कहने की कोशिश की।
‘मुझे अब कुछ नहीं सुनना।’ राहुल बोला, ‘जो सुनना था तुम्हारे भइया से सुन चुका हूं। दोस्ती तुम्हारी मुझ से थी। मैं अब वहां नहीं हूं, सो तुम्हें मेरे घर जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। और आगे से जो तुम मेरे घर गए और मेरी बहन से मिले तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा। अभी तक तुम ने मेरी दोस्ती देखी है, अब दुश्मनी देखना। वहीं आ कर तुम्हें काट डालूंगा।’ कह कर राहुल ने फ़ोन काट दिया।बांसगांव अपने घर पर फ़ोन मिलाया तो पता चला कि फ़ोन नान पेमेंट में कट चुका था। पड़ोस के फ़ोन पर फ़ोन कर के अम्मा को बुलवाया और पूछा कि, ‘ कब से फ़ोन कटा है?’
‘बिल नहीं जमा होगा तो कट गया होगा।’ अम्मा डिटेल में नहीं गईं। फिर राहुल ने संक्षेप में मुनमुन-विवेक कथा बताते हुए अम्मा से बता दिया कि, ‘मुनमुन से कह दो कि अपनी आदतें सुधार ले। नहीं वहीं आ कर काट डालूंगा। कह दो कि बाप भाई की इज़्ज़त का खयाल रखे।’ उस ने यह भी बताया कि, ‘विवेक को ख़ूब हड़का दिया है। भरसक तो वह आएगा नहीं। और जो आए भी तो उसे दरवाज़े से कुत्ते की तरह दुत्कार कर भगा देना।’ अम्मा कुछ कहने के बजाय, ‘हूं-हां’ करती रहीं। क्यों कि पड़ोसी के घर में थीं। बात फैलने और बदनामी का डर था।
मुनक्का राय जब कचहरी से शाम को वापस आए तो मुनमुन की अम्मा ने राहुल के फ़ोन का ज़िक्र कर के सारा वाक़या बताया तो मुनक्का के होश उड़ गए। बोले, ‘बात थाईलैंड तक पहुंच गई और हमें पता तक नहीं।’ फिर अचानक पूछा कि, ‘फ़ोन तो काम नहीं कर रहा फिर कैसे बात हुई?’
‘पड़ोसी गुप्ता जी के फ़ोन पर फ़ोन आया था।’ पत्नी ने संक्षिप्त सा जवाब दिया।
‘फिर तो वह सब भी जान गए होंगे।’ वह माथा सहलाते हुए बोले, ‘और अब मुसल्लम बांसगांव जान जाएगा!’
‘जान जाएगा?’ पत्नी ने कहा, ‘जान चुका है। आखि़र बात थाईलैंड तक अगर पहुंची है तो बिना किसी के जाने तो पहुंची नहीं।’
‘हां, हमीं लोगों की आंख पर पट्टी बंध गई है। बेटी के दुलार में हम लोग अन्हरा गए हैं।’ फिर वह भड़के, ‘कहां है वह?’
‘अभी आई नहीं है पढ़ा कर।’
‘अंधेरा हो गया है और अभी तक आई नहीं है।’
थोड़ी देर बाद मुनमुन आई तो घर में कोहराम मच गया। मुनमुन किसी आरोप को मानने को तैयार नहीं थी और मुनक्का राय उस की किसी दलील को सुनने को तैयार नहीं थे। अंततः उन्हों ने किसी न्यायाधीश की तरह निर्णय सुना दिया, ‘कोई बहस, कोई जिरह, कोई गवाही नहीं। सारा मामला यहीं समाप्त। अब तुम को कल से घर से बाहर नहीं जाना है। पढ़ाने भी नहीं।’
उस रात मुनक्का राय के घर चूल्हा नहीं जला। पानी पी कर ही सब सो गए। दूसरे दिन मुनक्का राय कचहरी भी नहीं गए। उन का ब्लड प्रेशर, शुगर और अस्थिमा तीनों ही बढ़ कर उन्हें तबाह किए हुए थे। और मुनमुन सारे गिले शिकवे भूल कर उनकी सेवा में लग गई थी। मुनक्का राय की एक समस्या यह भी थी कि इतनी सारी बीमारियों के बावजूद वह एलोपैथिक दवा भूल कर भी नहीं लेते थे। भले मर जाएं पर आयुर्वेदिक दवाओं पर ही उन्हें यक़ीन था। आयुर्वेदिक दवाओं के साथ दो तीन दिक्क़तें थीं। एक तो फौरी तौर पर आराम नहीं देती थीं। दूसरे, जल्दी मिलती नहीं थीं हर जगह। तीसरे, अपेक्षाकृत मंहगी थीं। फिर भी आयुर्वेदिक दवाओं की तासीर और मुनमुन की अनथक सेवा ने मुनक्का राय को हफ़्ते भर में फिट कर दिया। वह कचहरी जाने लायक़ हो गए। इधर वह कचहरी गए, उधर मुनमुन पढ़ाने गई। जाते समय अम्मा ने रोका भी कि, ‘तुम्हारे बाबू जी ने मना किया है तो कुछ सोच कर ही मना किया होगा।’
‘कुछ नहीं अम्मा वह गुस्से में थे सो मना कर दिया। ऐसी कोई बात नहीं है।’ वह बोली, ‘वह बात अब ख़त्म हो चुकी है।’ और निकल गई। वह जानती थी कि शिक्षा मित्र की नौकरी छोड़ने का मतलब था रूटीन ख़र्चों की तंगी। भाई लोग अफ़सर, जज भले हो गए थे पर घर के ख़र्च की, अम्मा-बाबू जी के स्वास्थ्य की सुधि किसी को नहीं थी। सभी अपनों-अपनों में सिमट कर रह गए थे। वह तो गांव से बटाई पर दिए खेत से अनाज मिल जाता था। खाने के लिए रख कर बाकी अनाज बिक जाता था। कुछ उस से, कुछ बाबू जी की प्रैक्टिस और कुछ शिक्षा मित्र की उस की तनख़्वाह से घर ख़र्च जैसे तैसे चल जाता था। बाबू जी तो पैदल ही कचहरी जाते थे पर उस का गांव बांसगांव से पंद्रह किलोमीटर दूर था। सीधी सवारी नहीं थी। दो बार सवारी बदलनी होती थी। थोड़ा पैदल भी चलना पड़ता था। कभी कभार रिक्शा भी। तो कनवेंस का ख़र्च भी था। और इस सब से भी बड़ी बात थी कि वह ख़ाली नहीं थी अपनी तमाम समवयस्क लड़कियों की तरह। जो शादी के इंतज़ार में घर में पड़ी-पड़ी खटिया तोड़ रहीं थीं। ख़र्च चलाना भले थोड़ा मुश्किल था पर अपने ख़र्चों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता था, इसी से वह ख़ुश थी। बस उस को थोड़ा यह अपराधबोध ज़रूर होता था कि इस दौड़-धूप और आपाधापी में वह विवेक के क़रीब पहुंच गई थी। पहले तो यों ही, फिर भावनात्मक और अब देह भी जीने लगी थी वह। यह सब कब अचानक हो गया वह समझ ही नहीं पाई। पर आज रास्ते में न आते, न जाते विवेक नहीं दिखा तो उसे खटका भी और अखरा भी।
शाम को घर आई तो उस ने नोट किया कि बाबू जी का कचहरी का काला कोट तो खूंटी पर टंगा है पर वह नहीं हैं। फिर भी उस ने अम्मा से कुछ पूछा नहीं। न ही अम्मा ने उस से कुछ कहा-सुना। थोड़ी देर बाद बाबू जी भी आ गए। वह बाबू जी के पास चाय ले कर गई। उन्हों ने चाय पी ली पर मुनमुन से कुछ कहा नहीं। ज़िंदगी रूटीन पर आ गई। पर सचमुच में नहीं।
राहुल ने उधर विवेक-मुनमुन कथा रमेश, धीरज और तरुण तीनों बड़े भाइयों को फ़ोन कर के परोस दी थी। तीनों ही बौखलाए। पर घर का फ़ोन कटा होने के कारण भड़ास निकाल नहीं पाए। पड़ोस में किसी ने राहुल की तरह फ़ोन किया नहीं। तय हुआ कि कोई बांसगांव जा कर मामले को रफ़ा-दफ़ा करे। रमेश और धीरज को लगा कि जजी और अफ़सरी के रुतबे में बांसगांव में जा कर किसी से तू-तू, मैं-मैं करना ठीक नहीं है। प्रोटोकाल भी टूटता है सो अलग। बदनामी होगी अलग से। अंततः तय हुआ कि तरुण जाए और समझा-बुझा कर मामला शांत करा दे। तरुण गया भी। पर वह किसी से उलझा नहीं। मुनमुन को ही जितना डांट-डपट सकता था डांटा-डपटा। बाबू जी की तरह उस ने भी आदेश दिया कि, ‘घर से बाहर जाना बंद करो नहीं टांगें तोड़ दूंगा।’ साथ ही यह भी कहा कि, ‘शिक्षा मित्र की नौकरी ने तुम्हारा दिमाग ख़राब कर रखा है। यह भी बंद करो। कोई ज़रूरत नहीं है इस नौकरी की। यह हम सभी का फ़ैसला है।’
‘पर बाबू हम लोगों का ख़र्चा वर्चा भी सोचते हो कभी तुम लोग?’ अम्मा ने पूछा।
‘तो आप ही लोगों ने इस को पुलका रखा है। सिर चढ़ा रखा है।’ तरुण भड़का, ‘इस की तनख़्वाह है कितनी? और क्या इस की तनख़्वाह से ही आज तक घर चला है?’
‘पहले तो नहीं पर अभी तो थोड़ी बहुत मदद कर ही रही है।’ अम्मा ने शांत स्वर में ही कहा।
तरुण चुप हो गया। शाम को उस ने बाबू जी से भी इस बाबत विचार-विमर्श किया। पर बाबू जी हूं-हां के अलावा कुछ बोले ही नहीं। तरुण बांसगांव से वापस लौट गया। लौट कर दोनों भाइयों को पूरी रिपोर्ट दी। दोनों भाइयों ने भी हूं-हां में ही बात कर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर ली। राहुल ने भी तरुण को फ़ोन कर के सारा हाल चाल लिया। तरुण ने राहुल को साफ़ बता दिया कि, ‘मुनमुन जो भी कुछ कर रही है या बिगड़ रही है वह बाबू जी और अम्मा की शह पर ही। उन लोगों ने उसे सिर चढ़ा रखा है। और इस से भी ज़्यादा शिक्षा मित्र की नौकरी ने उस का दिमाग़ ख़राब कर रखा है। इतना ही नहीं अम्मा का तो मानना है कि मुनमुन ही घर ख़र्च चला रही है।’
‘यह तो हद है!’ राहुल ने कहा और फ़ोन रख दिया। उस ने इस पूरे मसले पर थाईलैंड में विनीता से राय मशविरा किया। और तय हुआ कि रीता को रिक्वेस्ट कर के बांसगांव भेजा जाए। वही जा कर मुनमुन को समझाए। राहुल ने रीता को फ़ोन कर के सारी समस्या बताई और कहा कि, ‘तुम्हीं जा कर समझाती मुनमुन को तो शायद वह मान जाती।’ रीता ने अपनी ढेर सारी पारिवारिक समस्याएं और प्राथमिकताएं बताईं और कहा कि, ‘मेरा अभी तो जाना मुश्किल है।’ ज़रा रुक कर उस ने राहुल से कहा कि, ‘भाभी लोगों को क्यों नहीं भेजते?’
‘रीता तुम भी!’ राहुल बोला, ‘भइया लोगों के पास समय नहीं है बहन के लिए और तुम भाभी लोगों की बात कर रही हो। अरे भाभी लोगों को यह सब जानने के बाद ख़ुद ही बात संभालनी चाहिए थी पर किसी ने सांस तक नहीं ली। मैं इतनी दूर हूं और इसी लिए तुम पर यह ज़िम्मेदारी डाल रहा हूं।’
‘चलो अभी तुरंत नहीं पर जल्दी ही जाऊंगी बांसगांव।’ रीता बोली।
‘ठीक है।’ राहुल आश्वस्त हो गया।
कुछ दिन बाद रीता गई बांसगांव। अम्मा, बाबू जी की दशा देख कर वह विचलित हो गई। मां तो सूख कर कांटा हो गई थी। लग रही थी जैसे हैंगर पर टांग दी गई हो। मुनमुन भी बीमार थी। डाक्टरों ने उसे टी.बी. बताया था। अब ऐसे में वह मुनमुन को कैसे तो और क्या समझाती? आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास वाली गति हो गई उस की। फिर भी मौक़ा देख कर उस ने अम्मा, बाबू जी मुनमुन तीनों की उपस्थिति में मुनमुन विवेक कथा का ज़िक्र किया। और मुनमुन को सलाह दी कि, ‘परिवार की इज़्ज़त अब तुम्हारे हाथ है। इस पर बट्टा मत लगाओ।’
‘मैं तो समझी थी कि तुम हम लोगों का हालचाल लेने आई हो रीता दीदी।’ मुनमुन बोली, ‘पर अब पता लग रहा है कि तुम तो दूत बन कर आई हो।’
‘नहीं, नहीं मुनमुन ऐसी बात नहीं है।’
‘अरे दूत बनना ही है तो विभीषण की तरह राम की बनो, विदुर और कृष्ण की तरह पांडवों की बनो।’ मुनमुन बोली, ‘दूत बनना ही है तो उन भाइयों के पास जाओ जो जज और अफ़सर बने बैठे हैं। उन्हें घर की विपन्नता, दरिद्रता और मुश्किलों के बारे में बताओ। बताओ कि उन के बूढ़े मां-बाप और छोटी बहन बीमारी, भूख और असुविधाओं के बीच कैसे तिल-तिल कर रोज़-रोज़ जी और मर रहे हैं। बताओ कि उन की फूल सी छोटी बहन मां-बाप के साथ ही बूढ़ी हो रही है।’
रीता के पास मुनमुन के इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। पर मुनमुन सुलग रही थी, ‘पूरा बांसगांव क्या जवार जानता था कि यह घर जज और अफ़सरों का घर है। समृद्धि जैसे यहां सलमे-सितारे टांक रही है। पर यह ऊपरी और दिखावे की, घर के बाहर दरवाज़े और दुआर की बातें हैं। घर के भीतर आंगन और दालान की बातंे नहीं हैं। आंगन, दालान और कमरे में बूढ़े मां बाप सिसक रहे हैं। किसी से कुछ कहते नहीं। ब्लड प्रेशर, शुगर और अस्थमा है बाबू जी को। बिना दवाइयों के भी कभी-कभी कैसे दिन गुज़ारते हैं जानती हो? मां के कपड़े लत्ते देख रही हो?’ वह बोलते-बोलते बाबू जी का कचहरी वाला काला कोट खूंटी पर से उतार कर ला कर दिखाती हुई बोली, ‘यह फटा और गंदा कोट पहन कर जब बाबू जी इजलास में मुंसिफ़ मजिस्ट्रेट से किसी बात पर बड़े नाज़ से कहते हैं कि हुज़ूर हमारा बेटा भी न्यायाधीश है तो लोग हंसते हैं। पर क्या उस न्यायाधीश को भी चिंता है कि उस का बाप फटी कोट पहन कर कचहरी जा रहा है।’ वह बोली, ‘एस.डी.एम. मिलता है तो बाबू जी बड़े ताव से बताते हैं कि मेरा बेटा भी ए.डी.एम. है तो वह सुन कर चौंकता है और इनका हुलिया देख कर मुसकुरा कर चल देता है। बैंक में जाते हैं तो बताते हैं कि मेरा भी बेटा बैंक में मैनेजर है। सब काम तो कर देते हैं पर एक फीकी मुससकुराहट भी छोड़ देते हैं। लोगों से बताते फिरते हैं कि मेरा एक बेटा थाईलैंड में भी है। एन.आर.आई है। पर वही लोग जब देखते हैं कि उन्हीं की एक बेटी शिक्षा मित्र भी है तो लोग घर की हक़ीक़त का भी अंदाज़ा लगा लेते हैं।’ वह बोली, ‘ रीता दीदी अब जब दूत बन ही गई हो तो जा कर भइया लोगों को यह सब भी बताओ। और जो मेरी बात पर यक़ीन न हो तो बांसगांव तुम्हारा भी जाना पहचाना है। दो चार गलियों, घरों में जाओ और देखो तो व्यंग्य भरी नज़रें तुम्हें भी देखती मुसकुराती न मिलें तो हमें बताना।’
रीता ने बढ़ कर मुनमुन को सीने से लगा लिया और फफक कर रो पड़ी। सब को समझा बुझा कर रीता दो दिन बाद बांसगांव से लौट गई। फिर जब राहुल का फ़ोन आया तो रीता ने घर की विपन्नता और समस्याओं का पिटारा खोल दिया। और साफ़ बता दिया कि, ‘दोष भइया तुम्हीं लोगों का है। जिस मां बाप के चार-चार सफल, संपन्न और सुव्यवस्थित बेटे हों, जिन की अफ़सरी और जजी के क़िस्से पूरा जवार जानता हो वह ऐसी स्थिति में जो जी रहा है तो तुम लोगों को धिक्कार है।’
‘अरे मैं पूछ रहा हूं कि मुनमुन को कुछ समझाया कि नहीं।’ इन सारी बातों को अनसुनी करते हुए राहुल बोला।
‘समझाया मुनमुन को भी।’ रीता बोली, ‘पता है तुम्हें मुनमुन को भी टी.बी. हो गई है। बाबू जी की दवाइयों का ख़र्च पहले से था, अब यह ख़र्च भी है।’
‘पहले यह बताओ कि मुनमुन मानी कि नहीं?’ राहुल अपनी ही बात दुहराता रहा।
‘मैं अम्मा बाबू जी और मुनमुन की मुश्किलें बता रही हूं और तुम अपना ही रिकार्ड बजाए जा रहे हो।’ रीता बोली, ‘तुम चारो भाई मिल कर अम्मा बाबू जी के ख़र्च का जिम्मा लो। और हो सके तो मुनमुन की शादी तय कर दो। जब तक शादी नहीं तय होती तब तक मुनमुन को बांसगांव से कोई भइया अपने पास बुला लें और उस की टी.बी. का इलाज करवा दें। मेरी राय में सारी समस्या का इलाज यही है। मुनमुन को सुधारना भी ऐसे ही हो सकता है। बल्कि अच्छा तो यह होता कि अब अम्मा बाबू जी को भी कोई अपने पास ही रखता। वह लोग भी अब अकेले रहने लायक़ नहीं रह गए हैं।’
‘तो भइया लोगों को यही बात समझाओ!’ राहुल बोला, ‘मैं तो इतनी दूर हूं कि क्या बताऊं?’
‘देखो तुम ने पूछा तो तुम्हें बता दिया। भइया लोग पूछेंगे तो उन्हें भी बता दूंगी। अपने आप बताने नहीं जाऊंगी।’ रीता ने साफ़-साफ़ बता दिया। फिर राहुल ने भइया लोगों से इस पूरे मामले पर डिसकस किया। पर हर कोई बस खयाली पुलाव पकाता मिला। और मुनमुन को या अम्मा बाबू जी को भी कोई अपने पास ले जाने को सहमत नहीं दिखा। सब की अपनी-अपनी दिक्क़तें थीं। राहुल हार गया।
उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? उस की बीवी उस से कहती, ‘तुम पागल हो गए हो।’ सुन कर वह खौल जाता। वह कहती, ‘तुम्हारे भइया लोग वहीं हैं, वह कुछ नहीं कर रहे तो तुम क्यों जान दिए पड़े हो? ख़ामख़ा ख़ून जलाते हो और फ़ोन पर पैसा बरबाद करते हो।’
पर राहुल बीवी की बातों में नहीं आया। विनीता दीदी के पास गया। और कहा कि, ‘आप ही भइया लोगों को समझाइए।’
‘भइया लोग भाभी लोगों की राय से चलते हैं, वह लोग नहीं समझेंगे।’ वह बोली, ‘बदनामी ज़्यादा फैले उस से बेहतर है उस की शादी कर दो।’
‘शादी के लिए तो भइया लोगों से बात कर सकती हैं आप?’
‘हां, पहले तुम करो फिर मैं भी करती हूं।’
मुनमुन की शादी करने की बात पर सभी सहमत दिखे। पर दुविधा फिर खड़ी हुई कि तय कौन करे और फिर ख़र्च वर्च भी आड़े आए। अंततः तय हुआ कि चारो भाई चंदा कर लें। इस में भी रमेश ने हाथ बटोर लिए यह कह कर कि मेरा बेटा इंजीनियरिंग करने जा रहा है उस के एडमिशन वग़ैरह में ही वह परेशान है। धीरज ने कहा कि दो लाख रुपए वह दे देगा। तरुण ने भी कहा कि दो लाख रुपए वह भी दे देगा। बाक़ी ख़र्च की बात आई तो राहुल ने कहा, ‘जो भी लगेगा मैं दे दूंगा पर आप लोग वहां हैं शादी तो पहले तय करिए।’ लेकिन कोई खुल कर तैयार नहीं हुआ। राहुल ने हार कर बाबू जी से ही कहा कि, ‘आप शादी तय करिए। बाक़ी ज़िम्मा हमारा।’
मुनक्का राय ने मुनमुन की शादी खोजनी शुरू की। जो ही उन्हें शादी की तलाश में इधर-उधर जाते देखता तो कहता कि ‘आप के चार-चार बेटे वह भी इतने अच्छे ओहदों पर हैं और आप की यह उमर! काहें इतनी दौड़ धूप कर रहे हैं वकील साहब?’ वह एक थकी सी हंसी परोसते हुए कहते, ‘बेटों के पास टाइम कहां है? सब व्यस्त हैं अपने-अपने काम में।’ इधर मुनक्का राय ने शादी खोजनी शुरू की उधर गिरधारी राय सक्रिय हो गए। उन को लगा कि यही मौक़ा है मुनक्का की शेख़ी की हवा निकालने का। मुनमुन विवेक कथा की सुगबुगाहट उन के तक भी पहुंच चुकी थी। मुनक्का राय इधर शादी देख कर लौटते, उधर गिरधारी राय चोखा चटनी लगा कर मुनमुन विवेक कथा परोसवा देते किसी न किसी माध्यम से। अव्वल तो लड़की के भाई जज, अफ़सर हैं सुनते ही लोग दहेज के लिए ढाका भर मुंह फैला देते। तिस पर मुनमुन विवेक कथा मिल जाती। बात बिगड़ जाती। मुनक्का राय परेशान हो गए। बल्कि तार-तार हो गए।
बुढ़ौती में पैदा यह बेटी उन्हें सुख भी दे रही थी और दुख भी। वह व्यथित थे बेटों के असहयोग से। बीमारी और आर्थिक लाचारी से। एक बार राहुल का फ़ोन आया तो उस ने शादी की रिपोर्ट पूछी। ‘रिपोर्ट’ शब्द से ही वह भड़क गए। बोले, ‘यह कोई प्रशासनिक या अदालती कार्य तो है नहीं कि तुम को रिपोर्ट पेश करूं?’ वह बोले, ‘शादी ब्याह का मामला है। परचून का सामान तो ख़रीदना नहीं है कि दुकान पर गए और तौलवा कर लेते आए। बूढ़ा आदमी हूं, पैसा कौड़ी है नहीं। कोई संग साथ है नहीं। किसी को कहीं ले भी जाऊं तो किराया भाड़ा लगता है। अपना ही आना जाना दूभर है। बीमारी है, बूढ़ी हड्डियां हैं और तुम हो कि रिपोर्ट पूछ रहे हो?’
‘बाबू जी अभी आप का मूड ठीक नहीं है बाद में बात करता हूं।’ कह कर राहुल ने फ़ोन काट दिया। बाबू जी की कठिनाई भी उस ने समझी। हवाला के ज़रिए पचीस हज़ार रुपए दूसरे ही दिन उस ने बाबू जी के पास भेज दिया। साथ ही मामा, मौसा, फूफा जैसे कुछ रिश्तेदारों को फ़ोन कर के रिक्वेस्ट किया कि, ‘मुनमुन की शादी खोजने में बाबू जी को सपोर्ट करें।’ लोग मान भी गए।
लेकिन शादी का जो बाज़ार सजा था उस में मुनमुन फिट नहीं हो पा रही थी। इंजीनियर लड़के को इंजीनियर लड़की ही चाहिए थी। डाक्टर को डाक्टर चाहिए थी। कोई एम.सी.ए. लड़की मांग रहा था तो कोई एम.बी.ए.। इंगलिश मीडियम तो चाहिए ही चाहिए थी। और मुनमुन में यह सब कुछ भी नहीं था। दहेज भी विकराल था। जैसे कोई क्षितिज और पृथ्वी के बीच की दूरी नाप रहा हो, ऐसा था दहेज का पैरामीटर। मुनक्का राय कहते ‘जस-जस सुरसा बदन बढ़ावा तास दुगुन कपि रूप दिखावा/सोरह योजन मुख ते थयऊ तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ।’ वह कहते, ‘हे गोस्वामी जी आप ने सोरह योजन की सुरसा के आगे पवन सुत को तुरत बत्तीस का बना दिया पर अब मैं इस दहेज की सुरसा के आगे कहां से दुगुन रूप दिखाऊं? और कहां से लाऊं इंगलिश मीडियम, इंजीनियर, डाक्टर, एम.सी.ए., एम.बी.ए.?’
यहां तो शिक्षा मित्र थी। और शिक्षा मित्र सुनते ही लोग बिदक जाते। कहते, ‘भाई अफ़सर, जज, बैंक मैनेजर, एन.आर.आई. और बहन शिक्षा मित्र!’ कई लोग तो शिक्षा मित्र भी नहीं जानते थे। जब वह बताते तो कहते, ‘तो कोई प्राइमरी स्कूल का मास्टर या क्लर्क फ्लर्क ही क्यों नहीं ढूंढते?’ और जोड़ते, ‘माथा फोड़ लेने भर से तो ललाट चौड़ा नहीं न हो जाएगा?’ अब लोग मैच चाहते थे। जैसे साड़ी पर ब्लाऊज, जैसे सूट पर टाई, जैसे सोने पर सुहागा। मुनमुन के लिए सुहाग ढूंढना अब मुनक्का राय के लिए कठिन होता जा रहा था। उन्हें याद आ रहे थे अमीर ख़ुसरो और वह गुनगुना रहे थे बहुत कठिन है डगर पनघट की, कैसे मैं भर लाऊं मधुआ से मटकी, बहुत कठिन है डगर पनघट की!
कठिन डगर ही थी उन के ससुराल की भी। उन के बड़े साले का निधन हो गया है। वह पत्नी और मुनमुन को साथ लिए जा रहे हैं और भुनभुना रहे हैं कि, ‘ इन को भी इसी समय जाना था!’ वह पहले दो बार डोली में ससुराल गए थे। शादी और गौने में। तब सवारी के नाम पर बैलगाड़ी, डोली, घोड़ा और साइकिल का ज़माना था। कहीं-कहीं जीप और बस भी दीखती थी। दो-आबे में बसी उन की ससुराल में जाना तब भी कठिन था और अब भी। कुआनो और सरयू के बीच उन की ससुराल का गांव दो पाटों के बीच फंसा दिखता। ऐसे कि कबीर याद आ जाते, ‘चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’ यही हाल उन के बड़े साले का भी हुआ था। दो छोटे भाइयों के बीच वह पिस कर रह गए थे। मुनक्का राय के ससुर कलकत्ते में मारवाड़ियों की नौकरी में थे। मारवाड़ियों की तरह उन्हों ने भी ख़ूब पैसा कमाया। ख़ूब खेत ख़रीदे। घर बनवाया। बाग़ लगवाया, कुएं खुदवाए। घर की समृद्धि के लिए वह सारे जतन किए जो वह कर सकते थे। पर एक काम जो मूल काम था, बच्चों को पढ़ाना लिखाना, वह उन्हों ने ठीक से नहीं किया। बड़ा बेटा राम निहोर राय तो थोड़ा बहुत मिडिल तक पढ़ लिख गया और बाद में कलकत्ते जा कर पिता के काम में लग गया। हालां कि पिता जितना पैसा तो नहीं पीट पाया लेकिन घर संभाल लिया। बाक़ी दोनों भाई में से मझला राम किशोर राय प्राइमरी के बाद स्कूल नहीं गया तो सब से छोटा वाला राम अजोर राय दर्जा एक के बाद ही स्कूल नहीं गया।
मुनमुन राय के नाना को किसी ने तब के दिनों में समझा दिया था कि बच्चों को बहुत पढ़ाना लिखाना नहीं चाहिए। बहुत पढ़ लिख लेने से वह ख़ुद तो आगे बढ़ जाते हैं पर माता पिता की सेवा नहीं करते। माता पिता की बात नहीं सुनते। इस लिए भी वह बेटों की पढ़ाई के प्रति बहुत उत्सुक नहीं थे। अब अलग बात है कि जो बड़ा बेटा थोड़ा बहुत पढ़ लिख गया था, उसी ने न सिर्फ़ उन की विरासत संभाली बल्कि उन की सेवा टहल भी अंतिम समय में ही क्या ज़िंदगी भर की। बाक़ी दोनों बेटे तो जब तब लड़ते-झगड़ते उन के जी का जंजाल बन गए थे। बात-बात पर लाठी भाला निकाल लेते। इस के उलट बड़ा बेटा राम निहोर राय विवेकवान और धैर्यवान दोनों ही था। भाइयों को हरदम समझा-बुझा कर रखता। बस एक दिक्क़त थी राम निहोर राय की कि उस की कोई संतान नहीं थी। यह दुख बड़ा था पर कभी राम निहोर राय ने किसी पर यह दुख ज़ाहिर नहीं किया।
हां, मझले भाई राम किशोर राय ने ज़रूर उन की इस कमज़ोर नस का फ़ायदा उठाया। अपने बड़े बेटे को बचपन में ही उसे कलकत्ता ले जा कर उन्हें सौंप कर भावुक बना दिया और कहा कि, ‘आज से यह मेरा नहीं, आप का बेटा हुआ। प्रकृति और भगवान से तो मैं कुछ कह-कर नहीं सकता पर अपने तईं तो कर ही सकता हूं।’ और बेटा उन की गोद में डाल कर उन के क़दमों में लेट गया। राम निहोर भाव-विभोर हो गए। राम किशोर राय के बेटे को छाती से लगा कर रो पड़े। फफक-फफक कर रोते रहे। फिर तो वह राम किशोर राय के हाथों जैसे बिक से गए। सरयू-कुआनो में पानी बहता रहा और राम किशोर, राम निहोर का लगातार भावनात्मक दोहन करता रहा। उधर राम किशोर का बेटा बड़ा हो गया और अपने को सन आफ़ राम निहोर राय लिखने लगा। राम अजोर को जब यह बात एक रिश्तेदार के मार्फ़त पता चली तो चौंकना लाजमी था। क्यों कि राम किशोर राय के दो बेटे थे और राम अजोर राय के एक। राम निहोर राय के चूंकि संतान नहीं थी सो सारी जायदाद आधी-आधी इन्हीं दोनों में बंटनी थी। तो इस तरह राम अजोर राय का बेटा राम किशोर के बेटों से दोगुनी जायदाद का मालिक होता था। लेकिन राम किशोर राय की इस शकुनि चाल में राम अजोर के बेटे का भी हिस्सा उन्हीं दोनों के बराबर हो जाता। राम अजोर राय ने इस की बड़ी काट सोची पर कोई हल नहीं निकला।
चूंकि राम निहोर राय का यह भावनात्मक मामला था सो सीधे उन से बात करने की हिम्मत नहीं पड़ी राम अजोर राय की। फिर भी वह देख रहे थे कि राम निहोर भइया सारा विवेक, सारा धैर्य ताक पर रख कर तराज़ू का एक पलड़ा पूरा का पूरा राम किशोर की ओर झुकाए पड़े थे। हालां कि वह सारा उपक्रम कुछ ऐसे करते गोया दोनों भाई उन के लिए बराबर थे। दोनों के परिवारों का वह पूरा-पूरा ख़याल रखते। कलकत्ते से जब आते तो कपड़े लत्ते दोनों परिवारों के लिए लाते। और जो कहते हैं संयुक्त परिवार उस की भावना को भी वह पूरा मान देते। तो भी उन का पक्षपात देखने वालों को दिख जाता। कुछ रिश्तेदार तो उन्हें इस के मद्देनज़र धर्मराज युधिष्ठिर तक कहने लग गए थे। बतर्ज़ अश्वत्थामा मरो नरो वा कुंजरो! पर उन के तराज़ू का पलड़ा राम किशोर की ओर गिरा रहा तो गिरा रहा। पिता मुनीश्वर राय ने कई बार संकेतों में राम निहोर को समझाया लेकिन वह सब कुछ समझ कर भी कुछ नहीं समझना चाहते थे।
पिता के निधन के बाद तीनों भाइयों में जायदाद का बंटवारा हो गया। लेकिन राम निहोर के हिस्से की खेती-बारी, घर-दुआर पर व्यावहारिक कब्जा राम किशोर का ही बना रहा। क्यों कि राम निहोर ख़ुद तो कलकत्ता में ही रहते थे। गरमियों की छुट्टी में ही कुछ दिनों के लिए आते थे। जब शादी ब्याह का समय होता था। वह जब आते तो राम किशोर राय उन के लिए पलक पांवड़े बिछाए मिलते। राम निहोर भी भावुक हो कर इतना मेहरबान हो जाते राम किशोर पर कि सोचते क्या पाएं, क्या दे दें। राम अजोर और उन का परिवार यह सब देख कर अकुलाहट से भर जाता। एक ही घर था, रसोई भले अलग हो गई थी पर आंगन एक था, दालान, ओसारा, दुआर एक था। तो किसी से कुछ छुपता नहीं था। बाद के दिनों में यह खपरैल का घर भी धसकने लगा। और देखिए राम किशोर का नया घर बनने लगा। ज़ाहिर है पैसा राम निहोर का ही ख़र्च हो रहा था। कुछ दिन में राम किशोर का पक्का घर बन कर तैयार हो गया। घर भोज यानी गृह प्रवेश के बाद राम किशोर का परिवार नए पक्के मकान में चला गया।
पर राम अजोर?
नाम भले राम अजोर था, उन के आंगन में अजोर यानी उजाला नहीं हुआ। उसी टुटहे धसकते घर में रह गए। बाद में एक-एक कमरा कर के दो कमरा बना कर आगे पीछे झोपड़ी डाल कर लाज बचाई और धसकते घर से जान छुड़ाई। फिर धीरे-धीरे कर के कई सालों में पूरा मकान बनवाया। अब तक राम निहोर राय भी रिटायर हो कर गांव आ चुके थे। पत्नी का निधन हो चुका था। अब वह नितांत अकेले थे और पूजा पाठ में रम गए थे। गांव के मंदिर में उन का समय पुजारी जी के साथ ज़्यादा गुज़रने लगा था। वह देख रहे थे कि राम किशोर तथा उन के परिवार की उन के प्रति भावुकता और समर्पण समाप्त हो चला था। उन की सारी जायदाद, सारी कमाई, ग्रेच्युटी, फंड सब का सब राम किशोर के हवाले हो चुका था। परिवार की उपेक्षा से वह पीड़ित हो कर मंदिर, पुजारी और पूजा-पाठ में समय बिता रहे थे कि तभी एक वज्रपात और हो गया उन के ऊपर।
उम्र के इस पड़ाव पर चर्म रोग ने उन की देह पर दस्तक दे दिया। वह राम किशोर के परिवार में अब वी.आई.पी. से अचानक अछूत हो गए। उन की थाली, लोटा, गिलास, कटोरी, बिस्तर, चारपाई सब अलग कर दिया गया। एक कमरे में वह अछूत की तरह रख दिए गए। अपने ही पैसे से बनवाए घर में वह बेगाने और शरणार्थी हो गए। सब को शरण देने वाले राम निहोर खुद अनाथ हो कर, शरणागत हो गए थे। राम किशोर की यह अभद्रता, अमानवीयता देख कर वह अवाक थे। वह चाहते थे अपने इस चर्म रोग की दवा करना पर अब पैसा उन के हाथ में नहीं था। कुछ लोगों ने उन्हें बताया कि अगर तुरंत इलाज शुरू कर दिया जाए तो यह रोग ठीक हो सकता है। और जो नहीं भी ठीक हो तो कम से कम देह में और फैलने से रुक सकता है। नहीं यह पूरी देह में फैल सकता है। लेकिन राम किशोर के कान पर जूं नहीं रेंगा। और अब तो राम किशोर का जो बड़ा लड़का राकेश अपने को सन आफ़ राम निहोर राय लिखता था, वह भी खुल कर राम निहोर राय की मुख़ालफत करने लगा। अभद्र टिप्पणियां करने लगा। निरवंसिया, निःसंतान, नपुंसक न जाने क्या-क्या बोलने लगा। न सिर्फ़ अप्रिय संबोधनों से उन्हें नवाज़ता राकेश बल्कि अपने छोटे भाई मुकेश के साथ मिल कर उन्हें जब-तब मारने पीटने भी लगा। राम निहोर जब कभी राम किशोर से रोते हुए गुहार लगाते कि, ‘बताओ इस तरह लात मार खाने के लिए बूढ़ा हुआ हूं? सारी जायदाद, सारी कमाई इसी दिन के लिए सौंपी थी तुम्हें?’
‘क्या करूं अब यह लड़के हमारी भी नहीं सुनते।’ राम किशोर कहते, ‘ज़्यादा तू तड़ाक करूंगा तो ससुरे हमें भी मारेंगे।’
हालां कि राम निहोर ही क्या सारा गांव जानता था कि राम किशोर के बेटे जो कुछ भी कर रहे हैं उन्हीं की शह पर कर रहे हैं। बाद के दिनों में तो राम निहोर भरपेट भोजन के लिए भी तरसने लगे। गांव में अगर कोई उन पर तरस खा कर कुछ खाने के लिए दे देता तो राम किशोर के बेटे उसे जा कर गरिया आते। अपमान और उपेक्षा से अंततः राम निहोर टूट गए। एक रात नींद से उठ कर राम किशोर के पास गए। जगाया और छोटे भाई के पैर पकड़ कर फूट-फूट कर रो पड़े। लेकिन राम किशोर नहीं पिघला। आखि़र राम निहोर ने कहा, ‘हमें मार क्यों नहीं डालते? इस नरक भरे जीवन से तो अच्छा है कि हमें मार डालते।’
‘आप अपने हिस्से का खेत-बारी हमारे बड़े बेटे के नाम लिख दीजिए!’
‘अरे वह तो उस का हई है। मेरे मर जाने के बाद स्वतः उस का हो जाएगा।’
‘कैसे हो जाएगा?’
‘अपने सारे सर्टिफ़िकेटस में वह मुझे अपना पिता ही लिखता है। तो वह मेरा बेटा साबित हो जाएगा। अपने आप मेरा वारिस हो जाएगा।’
‘इतना नादान समझते हैं?’ राम किशोर बोला, ‘ब्लाक के कुटुंब रजिस्टर में वह मेरा बेटा दर्ज है। सर्टिफ़िकेट में लिखा कोई काम नहीं आएगा।’
‘ठीक है लिखवा लो पर मेरी सांसत बंद कर दो।’
‘ठीक है।’ राम किशोर बोला, ‘जाइए सो जाइए।’
दूसरे दिन से राम निहोर की दशा में सचमुच सुधार आ गया। अछूत तो वह बने रहे पर भोजन-पानी, बोली बर्ताव में राम किशोर और उस के परिवार में फ़र्क़ आ गया। राम निहोर लेकिन मन ही मन व्यथित थे। यह सोच-सोच कर कि क्या वह इतने पापी हैं जो इस स्वार्थी भाई से चिपके पड़े हैं? जिस भाई के लिए सारी कमाई, सारा जीवन न्यौछावर कर दिया वही इतना नीच और स्वार्थी निकला? फिर उन्हों ने सोचा कि अगर वह खेती बारी लिख भी देते हैं तो क्या गारंटी है कि वह फिर उन के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा? वह सोचते रहे पर कोई स्पष्ट फ़ैसला नहीं ले पा रहे थे।
अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नही पर
प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’ नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्स में उनका नाम डालकर खोजें.

