: दयानंद पांडेय का उपन्यास : ‘चलो अगर तिलक में लूला-लंगड़ा, काना-अंधा या ऐसा वैसा दिखा तो शादी कैंसिल कर देंगे। बस!’ राहुल बोला, ‘तुम इतना शक क्यों कर रही हो बाबू जी के फ़ैसले पर?’ ‘इस लिए कि यह मेरी ज़िंदगी है, मेरे भविष्य का सवाल है। ज़माना बदल गया है। पर बाबू जी नहीं। वह अभी भी पुराने पैटर्न पर चल रहे हैं जब बाल विवाह का ज़माना था और लोग मां-बाप, घर दुआर देख कर शादी कर देते थे।’ ‘ओह इतनी सी बात?’ राहुल बोला, ‘बाबू जी पर इतना अविश्वास करना ठीक नहीं है। ख़ुशी-ख़ुशी शादी करो सब ठीक होगा।’ कह कर राहुल ने अपनी ओर से बात समाप्त करनी चाही। ‘आप लोग दीदी लोगों की शादी में तो इतने निश्ंिचत नहीं थे। एक-एक चीज़ खोद-खोद कर ठोंक पीट कर तय कर रहे थे।’
‘तब मुनमुन समय बहुत था।’ राहुल बोला, ‘तब की बात और थी। हम लोग तब कमज़ोर थे। आज नहीं हैं। आज कोई हम लोगों की तरफ़ सपने में भी आंख उठा कर नहीं देख सकता।’
‘इतना अहंकार ठीक नहीं है राहुल भइया!’ मुनमुन बोली, ‘रावण इसी में डूब गया था और बरबाद हो गया।’
‘क्या बेवक़ूफी की बात करती हो?’ राहुल बोला, ‘तुम्हारी शादी है शुभ-शुभ बोलो!’
‘शुभ-शुभ ही आगे भी रहे भइया इसी लिए तो कह रही हूं कि एक बार अपने होने वाले बहनोई को शादी के पहले ठीक से जांच पड़ताल लीजिए।’ मुनमुन बोली, ‘आखि़र मैं कोई दुश्मन तो हूं नहीं आप लोगों की जो इस तरह बिना जांचे-समझे हमें एक अनजाने खूंटे से बांध दे रहे हैं। आख़िर हमारी जिंदगी का सवाल है।’
‘बाबू जी पर तुम को भरोसा नहीं हैं?’ राहुल परेशान हो कर बोला।
‘पूरा भरोसा है। पर अब वह उतने शार्प नहीं रह गए। उमर हो गई है। दूसरे वह सिर्फ़ घर और लड़के के पिता को देखे हैं। लड़के को नहीं।’
‘क्यों बरिच्छा में तो देखे ही होंगे?’
‘कहां?’ मुनमुन अकुला कर बोली, ‘उस के छोटे भाई ने बरिच्छा लिया। वह तो इलाहाबाद से आया ही नहीं था, बरिच्छा में।’
‘क्यों?’
‘हां, बाबू जी सिर्फ़ फ़ोटो से ही काम चला रहे हैं।’
‘चलो अब आज तिलक तो कैंसिल हो नहीं सकती।’ राहुल बोला, ‘पर मैं कोशिश करूंगा कि उस को आज ठीक से देख-समझ लूं। कहीं कोई दिक्क़त हुई तो कैंसिल कर दूंगा यह शादी।’
‘सच राहुल भइया!’ वह राहुल के पैर पकड़ कर बैठ गई, ‘भूलिएगा नहीं।’
‘बिलकुल!’
धूमधाम से तिलक गई और चढ़ी। वापस आ कर सब लोगों ने तिलक में ख़ातिरदारी और इंतज़ाम की बड़ाई के पुल बांध दिए। फिर इस फ़िक्र में पड़ गए कि यहां इंतज़ाम में कोई कोर कसर न रह जाए! सारी बातें थीं पर नहीं कुछ था तो वह थी दुल्हे की बात। कोई दुल्हे के बारे में ज़िक्र भी नहीं कर रहा था, भूले से भी। सुबह से शाम हो गई। मुनमुन कान लगाए-लगाए थक गई। सभी इंतज़ाम में डूबे थे। अंततः मौक़ा देख कर मुनमुन ने फिर राहुल को पकड़ा। पूछा, ‘मेरा काम किया?’
‘कौन सा काम?’
‘दुल्हा देखा?’ वह खुसफुसाई।
‘हां, भई हां दुल्हा देखा!’ राहुल ज़रा ज़ोर से बोला।
‘धीरे से नहीं बोला जा रहा?’ मुनमुन फिर खुसफुसाई।
‘हां, भई देखा।’ राहुल भी मुनमुन की तरह खुसफुसाया।
घर में सब लोग यह सब देख कर खिलखिला कर हंस पड़े। मुनमुन लजा कर अपने कमरे में भाग गई। लेकिन थोड़ी देर बाद फिर से उस ने मौक़ा देख कर राहुल को पकड़ा और उस का हाथ पकड़ कर उसे छत पर ले गई। बोली, ‘मेरा मज़ाक उड़ाने का समय नहीं है यह। मेरी ज़िंदगी और मौत का सवाल है यह।’
‘अच्छा?’ राहुल ने आंख फैला कर मज़ा लेते हुए कहा।
‘तो तुम नहीं मानोगे? न बताओगे?’
‘देखो सच बात यह है कि तुम्हारा होने वाला दुल्हा एक आंख और एक पैर दोनों से लाचार है।’ राहुल मज़ा लेते हुए बोला, ‘इसी लिए मैं वहां सब के सामने कुछ बताने से हिचक रहा था। अब तुम पूछोगी कि फिर भी मेरी शादी क्यों उस से की जा रही है? तो मैं देखो बस इतनी सी बात कहूंगा कि यह बाबू जी का फ़ैसला है और हम भाइयों में से कोई भी बाबू जी का फ़ैसला चैलेंज करने की स्थिति में नहीं है। ठीक?’ राहुल ने बात ख़त्म करते हुए पूछा, ‘अब मैं जाऊं? बहुत से काम बाक़ी हैं।’
‘ओफ़्फ़ राहुल भइया यह मज़ाक का विषय नहीं है।’
‘तुम को अब मेरी बात पर भरोसा नहीं है तो मैं क्या कर सकता हूं?’ कह कर राहुल हंसता हुआ छत से सीढ़ियां उतरता भाग गया। और फिर जब तीसरी बार मुनमुन ने राहुल को पकड़ा तो राहुल ने सच बता दिया, ‘देखो मुनमुन तुम्हारा दुल्हा दिखने में औसत है। ठीक ठाक कह सकता हूं। अगर अमिताभ बच्चन नहीं है तो मुकरी या जगदीप या जानी लीवर जैसा भी नहीं है। क़द तुम से निकला हुआ ही है और रंग भी तुम्हारे जैसा ही है।’
‘और बात व्यवहार?’ मुदित होती हुई मुनमुन बोली।
‘अब तुम जो इतना पीछे पड़ी हो तो सच बताऊं मेरी बहन, ज़रा देर में किसी का बात व्यवहार कैसे कोई जान सकता है? और ऐसे मौक़े पर वैसे भी सभी लोग ज़रूरत से ज़्यादा फ़ार्मल हो जाते हैं। हैलो हाय और एक दूसरे के परिचय के अलावा कुछ ख़ास बात भी नहीं हुई।’
‘चलो राहुल भइया इतना बताने और पहले ख़ूब सताने के लिए शुक्रिया।’ वह हाथ जोड़ कर विनयवत बोली।
‘और हां, अगर ज़्यादा डिटेल जानना हो तो रमेश भइया से पूछ लो। उन्हों ने उस से ज़्यादा देर तक बात की। आखि़र उन के पुराने मुवक्किल का बेटा था। और फिर सच पूछो तो पूरे तिलक समारोह में उन्हीं का भौकाल भी था। वी.वी.आई.पी. वही थे। हर कोई जज साहब, जज साहब की ही धुन में था। धीरज भइया की कलफ़ लगी अफ़सरी भी उन की जज साहबियत के आगे नरम पड़ गई थी।’
‘रमेश भइया!’ मुनमुन ऐसे बोली गोया उस के मुंह में कोई कड़वी चीज़ आ गई हो, ‘मेरी औक़ात नहीं है उन से यह सब पूछने की।’
‘तो अब मेरी आधी-अधकचरी सूचनाओं से काम चलाओ।’
‘देखते हैं!’
पर दूसरे दिन कोहराम मच गया। पर गुपचुप। कुछ ऐसे कि ख़ामोश अदालत जारी है। घनश्याम राय का फ़ोन आया था। उन के मुताबिक़ किसी विवेक सिंह ने फ़ोन कर उन के बेटे राधेश्याम को धमकी दी थी कि, ‘बारात ले कर बांसगांव मत आना। नहीं पूरी बारात और तुम्हारे हाथ पांव तोड़ कर बांसगांव में गाड़ दूंगा। मुनमुन हमारी है और हमारी रहेगी।’ घनश्याम राय यह डिटेल देते हुए पूछ भी रहे थे कि, ‘यह विवेक सिंह कौन है?’
जानता तो हर कोई था कि विवेक सिंह कौन है पर सब ने अनभिज्ञता ज़ाहिर की। और कहा कि, ‘चिंता मत करें कोई सिरफिरा होगा और उस का पता करवा कर इंतज़ाम कर दिया जाएगा। आप ख़ुशी-ख़ुशी बारात ले कर आइए।’ यह आश्वासन धीरज ने अपनी ज़िम्मेदारी पर दिया। लेकिन घनश्याम राय ने कहा, ‘ऐसे नहीं आ पाएगी बारात।’
‘फिर?’
‘मैं पहले अपनी होने वाली बहू से सीधे बात करुंगा फिर कोई फ़ैसला लूंगा।’
‘सुनता था आप बड़े दबंग हैं, ब्लाक प्रमुख रहे हैं। पर आप तो कायरता की बात कर रहे हैं?’ धीरज ने कहा।
‘आप जो समझिए पर मैं लड़की से बात किए बिना कोई फ़ैसला नहीं ले सकता।’
‘रुकिए मैं अभी बात करवाता हूं।’
‘नहीं फ़ोन पर नहीं। मैं मिल कर आमने-सामने बात करूंगा। और आज ही।’
‘तो कब आना चाहेंगे?’
‘अभी दो-तीन घंटे में।’
‘आ जाइए!’ धीरज भी सख़्त हो गया।
फिर राहुल को बुलाया धीरज ने। राहुल के आते ही वह बऊरा गया। लग रहा था जैसे वह राहुल को ही मार डालेगा। राहुल ने कहा भी कि, ‘भइया मैं संभालता हूं।’
‘कोई ज़रूरत नहीं।’ धीरज ने सख़्ती से कहा, ‘तुम अभी मुनमुन को संभालो और समझाओ। अभी थोड़ी देर में घनश्याम राय आ रहे हैं वह ख़ुद मुनमुन से बात करेंगे। तब फ़ैसला करेंगे कि बारात आएगी कि नहीं।’ कह कर धीरज अम्मा के पास गया और कहा कि, ‘अम्मा समझाओ मुनमुन को कि अभी तो शादी कर ले। बाद में चाहे जो करे। इस तरह भरी सभा में हम लोगों की पगड़ी मत उछाले। सिर नीचा मत कराए।’ फिर धीरज ने पत्नी को भी समझाया कि, ‘वह भी मुनमुन को समझाए।’ और रमेश की पत्नी के पास भी गया कि, ‘भाभी आप भी समझाइए।’ इस के बाद उस ने एस.डी.एम. को फ़ोन कर के बुलवाया। एस.डी.एम. से अकेले में बात की और बताया कि, ‘विवेक सिंह नाम का लाखैरा शादी में अड़चन बन रहा है। उसे संजीदगी से बांसगांव की बजाय किसी और थाने की पुलिस से तुरंत गिरफ़्तार करवा कर, हाथ पैर तुड़वा कर हफ़्ते भर के लिए बुक करवा दो।’ उस ने जोड़ा, ‘हमारी इज़्ज़त का सवाल है।’
‘सर!’ कह कर एस.डी.एम. चला गया। और धीरज के कहे मुताबिक़ उस ने उसे दूसरे थाने की पुलिस द्वारा विवेक सिंह को आर्म्स एक्ट में अरेस्ट करवा कर अच्छे से पिटाई कुटाई करवा दी। और मामला क्या है इस की गंध भी नहीं लगने दी। आखि़र सीनियर के घर की इज़्ज़त का सवाल था।
इधर मुनमुन इस सब से बेख़बर थी। पर जब एक साथ अम्मा और भाभियां उसे समझाने लग गईं तो वह बेबस हो कर रो पड़ी। बाद में बहनों ने भी उसे समझाया। लेकिन मुनमुन ने जिस तरह पूरे मामले से अनभिज्ञता जताई और पूरी तरह निर्दोष दिखी तो धीरज को लगा कि दाल में कुछ काला है। और फ़ौरन उस को लगा कि हो न हो यह कहीं गिरधारी चाचा की लगाई आग न हो। उस ने फ़ौरन घनश्याम राय से कहा कि या तो वह कालर आई डी फ़ोन लगवा लें या फिर फ़ोन पर आने वाले काल्स को एक्सचेंज के थ्रू वाच करवा लें। ताकि शरारत करने वाले को दबोचा जा सके। घनश्याम राय ने बताया कि आलरेडी वह कालर आई डी फ़ोन लगाए हुए हैं और नंबर चेक कर लिया है। यह नंबर बांसगांव के ही एक पी.सी.ओ. का है। फिर उन्हों ने वह नंबर भी दे दिया। उस नंबर वाले पी.सी.ओ. पर भी धीरज ने जांच पड़ताल करवाई। कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी कि किस ने फ़ोन किया था। धीरज का मन हुआ कि एक बार गिरधारी चाचा की भी शेख़ी वह निकलवा दे। करवा दे उन की भी इस बुढ़ौती में कुटाई। पर कहीं लेने के देने न पड़ जाएं और अपनी ही छिछालेदर हो जाए। सो वह ज़ब्त कर गया।
ख़ैर, घनश्याम राय बांसगांव आए। गुपचुप उन्हें मुनमुन से मिलवा भी दिया गया। दी गई ट्रेनिंग के मुताबिक़ वह पल्लू किए हुए उन से मिली। मिलते ही चरण स्पर्श किए। और हर सवाल का पूरी शिष्टता से सकारात्मक जवाब दिया और यह भी बताया पूरी ताक़त और विनम्रता से कि, ‘मैं किसी विवेक सिंह को नहीं जानती।’ घनश्याम राय पूरी तरह संतुष्ट हो कर बांसगांव से गए। हुई असुविधा के लिए क्षमा मांगी और कहा कि, ‘निश्चिंत रहिए किसी शरारती तत्व के बहकावे में अब हम नहीं आने वाले। बारात निश्चित समय से आएगी।’
धीरज ने झुक कर उन के चरण स्पर्श कर उन का शुक्रिया अदा किया। इतना सब घट गया पर मुनक्का राय को इस सब की ख़बर नहीं दी गई। जान-बूझ कर। कि कहीं यह सब जान सुन कर उन का स्वास्थ्य न बिगड़ जाए। अम्मा को भी धीरज ने समझा दिया कि, ‘बाबू जी को यह सब मत बताना नहीं कहीं उन की तबीयत बिगड़ गई तो मुश्किल हो जाएगी।’
अम्मा मान गई थीं। फिर धीरज ने सोचा कि क्यों न शादी के दिन फ़ोर्स की भी व्यवस्था कर ले। एस.डी.एम. से कह कर सादे कपड़ों में पुलिस लगवाने की व्यवस्था करवा दी और एस.एस.पी. से कह कर घुड़सवार पुलिस भी स्वागत के लिए दरवाज़े पर तैनात करवाने की व्यवस्था कर ली। फिर उस घड़ी को कोसा जब बाबू जी ने बांसगांव में रहने का तय किया। अपने को भी कोसा कि क्यों यह घर बांसगांव जैसी लीचड़ जगह में बनवाया जहां की गुंडई की चर्चा पहले पहुंचती है, आदमी बाद में पहुंचता है। इस से अच्छा रहा होता कि उसने यह घर गांव में बनवाया होता। ख़ैर, अब तो जो होना था, हो गया था, आगे की सुधि लेनी थी। फ़िलहाल तो घर में रौनक़ थी। लगता ही नहीं था कि यह वही घर है जिस में मुनक्का राय, मुनमुन और उस की अम्मा संघर्ष भरे दिन गुज़ारते रहे हैं। एक-एक पैसे जोड़ते और तिल-तिल मरते रहे हैं। कभी दवाई के लिए तो कभी रोजमर्रा की चीज़ों के लिए।
अभी तो घर गुलज़ार था और चकाचक पुताई और सजावट से सराबोर चहकते और महकते लोगों से भरा यह घर यक़ीन दिला रहा था कि हां, इस घर में जज और अफ़सरों का बसेरा है। चिकने-चुपड़े बच्चे भी इस बात की तसदीक़ कर रहे थे। गिरधारी राय तक इस घर की ख़ुशी में खनकती सजावट और चहक की रिपोर्ट भी मुसलसल पहुंच रही थी। कुछ पट्टीदार और रिश्तेदार कबूतर बने हुए थे। पर गिरधारी राय पल-पल बेचैन थे। घर की ख़ुशियों और उस की खनक से नहीं बल्कि जो बबूल वह फ़ोन पर घनश्याम राय और उस के बेटे को परोसवा चुके थे, उस से आम की फसल कैसे मिल रही थी, इस से! उन्हें तो उम्मीद थी कि अब तक तो कोहराम मच जाएगा। पर यहां तो सब गुड-गुड न्यूज़ की बौछार थी। एक रिश्तेदार महिला जो प्रौढ़ा से वृद्धावस्था में जा रही थीं, शादी की तैयारियों, इंतज़ामात, ज़ेवरात वग़ैरह के ब्यौरे परोस रही थीं और गिरधारी राय के दिमाग़ में मक्खी भिनभिना रही थी। जब बहुत हो गया तो वह बुदबुदाए, ‘चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात है!’
‘शुभ-शुभ बोलो भइया। अइसा काहें बोल रहे हो!’ रिश्तेदार महिला बोली।
‘अरे नहीं हम दूसरी बात पर बोल रहे हैं।’ कह कर गिरधारी राय ने बात काट दी।
खै़र, तय समय पर बारात आई। पर द्वारपूजा के ठीक पहले ख़ूब ज़ोरदार बारिश शुरू हो गई। सारी व्यवस्था थोड़ी देर के लिए छिन्न भिन्न हो गई। गिरधारी राय की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। किसी ने मुनक्का राय से कहा कि, ‘बारिश तो बंद ही नहीं हो रही? क्या होगा?’
‘कुछ नहीं हमारे बेटे सब हैं न! सब संभाल लेंगे!’
‘ये बारिश भी संभाल लेंगे?’ पूछने वाला बिदका।
‘अरे नहीं, वह तो भगवान संभालेंगे। मैं तो व्यवस्था की बात कर रहा था।’
‘अच्छा-अच्छा!’
मुनक्का राय मुदित थे। मुदित थे; व्यवस्था पर, ताम झाम पर, बेटों की सक्रियता पर।
ख़ैर बारिश बंद हुई द्वारपूजा की तैयारियां शुरू र्हुइं। ज़मीन गीली हो गई थी। सो चार तख़त बिछा कर उसी पर द्वारपूजा के लिए तैयारी की गई। द्वारपूजा पर दामाद के पांव पूजते हुए मुनक्का की आंखें भर आईं। भर आईं यह सोच कर कि अब मुनमुन भी कुछ दिनों बाद चली जाएगी और वह अकेले रह जाएंगे, मुनमुन की अम्मा के साथ। छत से पड़ रही द्वारचार की अक्षतों के बीच जो औरतें फंेक रही थीं मुनक्का की ख़ुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था। तिस पर बैंड बाजे पर बज रही छपरहिया धुन ने उन्हें इस बुढ़ौती में भी मस्त कर दिया। इतना कि द्वारपूजा के बाद तख़त पर से छटक कर कूदे और अपने पीछे बज रहे बैंड के बीच घुस कर नचनिया का नाच देखने लगे। उन के किसी रिश्तेदार ने बुदबुदा कर पूछा भी आंख मटका कर कि, ‘का हो मुनक्का बाबू?’
‘अरे बड़ा सुंदर नाच रहा है?’ वह बुदबुदाए और शरमा गए। शरमा कर वहां से छिटक गए।
बारातियों का जलपान वगै़रह संपन्न हो गया था और बाराती उस इंटर कालेज में लौट चुके थे जहां वह ठहराए गए थे। विवाह की बाक़ी तैयारियां और खाने पीने की व्यवस्था चल रही थी। दरवाजे़ पर रमेश कुछ लोगों के साथ बैठा था। लोग रमेश यानी जज साहब के पास आते और प्रणाम कह कर या चरण स्पर्श कर के आते जाते रहे। तभी मुनक्का राय के एक सहयोगी वकील दो लोगों के साथ आ गए। कुर्सियां कम थीं। अचानक एक ख़ाली कुर्सी पर वह बैठ गए और बड़ी बेफ़िक्री से बोले, ‘हे रमेश ज़रा जाओ उधर से दो तीन ठो कुर्सी उठा लाओ।’ वहां उपस्थित लोग भौंचकिया कर उन वकील साहब को देखने लगे। पर जिस बेफ़िक्री से वकील साहब ने रमेश से कुर्सी लाने को कहा था, उसी फुर्ती से रमेश उठ कर कुर्सी लेने चला गया। कुर्सी ला कर वह रख ही रहा था कि एक दूसरे वकील ने उन वकील साहब से बड़ी संजीदगी से कहा, ‘आप को पता है वकील साहब आप ने एक न्यायाधीश से कुर्सी मंगवाई है।’
‘अरे, क्या बोल रहे हैं आप?’ शर्मिंदा होते हुए वह बोले, ‘बेटा माफ़ करना मुझे याद नहीं था।’
‘अरे कोई बात नहीं चाचा जी!’ रमेश पूरी विनम्रता से बोला, ‘आप कहिए तो दो चार और कुर्सियां ला दूं?’
‘अरे नहीं, बेटा बस!’ वकील साहब हाथ जोड़ कर बोले।
‘अब यह हाथ जोड़ कर मुझे शर्मिंदा तो मत करिए।’ रमेश ने ख़ुद हाथ जोड़ कर कहा।
ऐसे ही कुछ न कुछ चलता-घटता रहा। फिर भसुर द्वारा त्याग-पात यानी कन्या निरीक्षण हुआ; जयमाल हुआ, खाना पीना हुआ। सब ने खाने की और इंतज़ाम की डट कर तारीफ़ की। क्या घराती, क्या बाराती सब ने। ज़्यादातर बाराती चले गए। घराती, पड़ोसी चले गए। रिमझिम बारिश के बीच विवाह की रस्में शुरू हुईं तब तक आधी रात हो चुकी थी। कहीं कुछ अप्रिय नहीं घटा। सब ने चैन की सांस ली। लावा परिछाई हुई, पांव पुजाई हुई, कन्यादान हुआ। सुबह हो गई पर बारिश की रिमझिम नहीं थमी। बीच रिमझिम ही नाश्ते के बाद कोहबर में दुल्हा-दुल्हन ने पासा खेला। माथ ढंकाई हुई और मड़वा अस्थिल की रस्में हुईं। दुल्हा दुल्हन की सखियों और घर की महिलाओं से मिला। बची खुची बारात जब विदा हुई तब भी रिमझिम थमी नहीं थी। दुल्हन विदा नहीं हुई। क्यों कि घनश्याम राय के यहां विवाह में दुल्हन की विदाई विवाह में सहती नहीं थी। गौना तय हुआ था बरस भर के भीतर।
ख़ैर, शादी ठीक निपट गई, यह सोच कर सब ने संतोष किया। पूरी शादी में रिश्तेदारों और परिवारीजनों ने यह भी नोट किया कि रमेश को बड़े भाई के नाते का सम्मान भी मिल गया था। बाक़ी बहनों की शादियों में नौकरों से भी गई बीती हैसियत हो गई थी उस की, अब की नहीं। रमेश भी सिर झुकाए नहीं, सिर उठाए घूम रहा था। मुनक्का राय भी हर्ष में थे।
और जैसा कि सभी शादियों में होता है कि बारात की विदाई के बाद जो जहां जगह पाता है, सो जाता है और जो रिश्तेदार रात में सो चुका होता है, वह विदाई की तैयारी में होता है। यहां भी वही मंज़र था। पर यहां थोड़ा फ़र्क़ भी था। दोपहर होते-होते रमेश, धीरज और तरुण भी सपरिवार बांसगांव से विदाई की तैयारी में थे। अम्मा ने टोकते हुए रोका भी कि, ‘अभी कई रस्में बाक़ी हैं। फूलसेरऊवा बाद जाते तो अच्छा था। पर इस सब के लिए किसी के पास समय नहीं था। सब की अपनी-अपनी व्यस्तताएं थीं। फिर हुआ यह कि घर में रिश्तेदार रह गए, घर वाले चले गए। मुनक्का राय का सारा हर्ष विषाद में बदल गया। बीच रिमझिम में ही तीन बेटे सपरिवार चले गए। सब के पास अपनी-अपनी गाड़ियां थीं। स्टार्ट हो गईं। बारी-बारी। अब रह गया था राहुल और उस का परिवार। विनीता और रीता दोनों बहनें, उन के पति और बच्चे। छिटपुट और रिश्तेदार। राहुल को अभी सारे बचे खुचे हिसाब किताब करने थे। सब की विदाई करनी थी। सब से छोटा होने के बावजूद उसे बड़ों की ज़िम्मेदारी निभानी पड़ रही थी। ख़र्च-वर्च की तो वह ख़ैर थाईलैंड से ही प्लानिंग कर के आया था। पर यह ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ेगी, उस ने सोचा नहीं था। बड़े भाइयों पर वह किंचित क्रोधित भी हुआ। वह अम्मा से कह भी रहा था कि, ‘मत कुछ करते लोग बस घर में बने रहते तो अच्छा लगता।’
‘हां, बेटा बारात जाते ही घर सूना हो गया। मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा।’ अम्मा ने कहा।
दो दिन बाद राहुल भी चलने को तैयार हो गया तो अम्मा ने टोका कि, ‘तुम को तो बेटे अगले हफ़्ते जहाज़ पकड़नी थी?’
‘हां, है तो अगले हफ़्ते का ही जहाज़ पर दिल्ली में कुछ ज़रूरी काम हैं।’ वह बोला, ‘फिर सारे काम-धाम भी निपट गए हैं। कुछ बाक़ी तो रहा नहीं अब?’
‘हां, वो तो है पर दो चार दिन और रह जाते तो अच्छा लगता।’
‘नहीं अम्मा अब जाने दो!’
‘तो फिर अब कब आओगे?’ अम्मा बोलीं, ‘इस के गौने में तो आओगे न?’
‘कहां अम्मा?’ राहुल बोला, ‘इतनी जल्दी फिर छुट्टी और इतना ख़र्चा आने-जाने का। कहां आ पाऊंगा?’
‘हां, ख़र्चा तो तुम्हारा बहुत हो गया।’
अम्मा बोलीं, ‘पर जब मौक़ा मिले जल्दी आना।’
‘ठीक अम्मा।’ कह कर उस ने बाबू जी के भी पांव छुए। मुनक्का राय की आंखों में आंसू आ गए। वह फफक कर रो पड़े और राहुल से लिपट गए। रोते-रोते ही बोले, ‘बुढ़ापे में तुम ने मेरी लाठी बन कर मेरी लाज बचा ली। और क्या कहूं? तुमने बहुत किया।’
‘कुछ नहीं बाबू जी यह तो मेरा धर्म था।’ कह कर राहुल चलने लगा तो मुनमुन उस से लिपट कर फफक पड़ी।
‘अरे अभी तो तुम्हारी विदाई हो नहीं रही, तुम क्यों रो रही हो अभी से।’ राहुल ने हंसते हुए पूछा। पर वह चुपचाप आंसू बहाती रही। कृतज्ञता के आंसू। फिर राहुल ही उस का चेहरा हाथों में ले कर बोला, ‘अब घर की लाज तुम्हारे हाथों में है। अब कुछ ऐसा वैसा सुनने को न मिले तो अच्छा है।’
मुनमुन ने स्वीकृति में सिर हिला दिया। राहुल के जाने के बाद बाक़ी रिश्तेदार भी दो तीन दिन में चले गए। रह गए फिर वही तीन मुनक्का राय, मुनमुन और उस की अम्मा। फिर वही कचहरी, वह स्कूल, वही बीमारी, वही दवाई और वही रोज़मर्रा का संघर्ष।
मुनक्का राय एक दिन मुनमुन की अम्मा से बोले, ‘कैसा तो सांय-सांय कर रहा है घर!’
‘हां, उधर कुछ दिन के लिए कैसा तो गुलज़ार हो गया था घर। सब लोग इकट्ठे थे तो रौनक़ बढ़ गई थी।’ मुनमुन की अम्मा बोलीं।
‘लगता है जैसे यह घर, घर नहीं कोई गेस्ट हाऊस हो गया था। कि मुसाफ़िर आए। खाए-पिए, रहे और चले गए।’ घर की छत को निहारते हुए वह बोले, ‘जैसे किसी पेड़ पर पतझड़ बरपा हो गया हो।’
पर मुनमुन की अम्मा चुप हो गईं। मुनक्का राय के दुख को अपने दुख में मिला कर बड़ा नहीं करना चाहती थीं वह।
इधर मुनमुन ने भी शादी के बाद विवेक की ख़बर नहीं ली, न ही विवेक ने मुनमुन की। रास्तों में भी कहीं मुनमुन को विवेक नहीं मिला। दिखता भी भला कैसे? वह तो ज़मानत के बाद घर में घायल पड़ा दवाइयां खा रहा था। वह सोच नहीं पा रहा था कि उस का कसूर क्या था? जो पुलिस ने उसे फ़र्ज़ी तौर पर आर्म्स एक्ट मंे गिरफ़्तार कर के पिटाई कर जेल भेज दिया। बाइक चलाना, पान खाना, थोड़ी बहुत सिटियाबाजी बस यही तीन शौक़ थे उस के। कट्टा वग़ैरह का शौक़ कभी नहीं रहा उस को। यह बात उस के घर वाले भी जानते थे। पर पुलिस ने उस के पास कट्टा दिखा कर गिरफ़्तार कर लिया। वह भी बांसगांव की नहीं, गगहा की पुलिस ने। यह सब उस के और उस के परिवार की समझ से परे था।
ख़ैर, विवाह के बाद मुनमुन ने संयमित जीवन जीना शुरू कर दिया। उस की शेख़ी भरी शोख़ी जाने कहां बिला गई थी। उस की चाल भी बदल गई थी। अब वह पहले की तरह चपलता, चंचलता और मादकता जैसे भूल गई थी। मांग में ख़ूब चटक सिंदूर लगाए जब वह धीर गंभीर चाल में चलती तो लोग ताज्ज़ुब करते और कहते कि, ‘अरे क्या ये वही मुनमुन है? वही मनुमुन बहिनी?’
हां, अब मुनमुन बदल गई थी। यह वह पहले वाली मुनमुन नहीं थी। बांसगांव की सड़क भी यह दर्ज कर रही थी, उस के गांव का प्राइमरी स्कूल भी और लोग भी। आंख उठा कर लप-लप देखने वाली मुनमुन की आंखें अब नीची हो कर अपनी राह भर देखतीं। वह ख़ुद भी कभी अपने बारे में सोचती कि क्या विवाह एक लड़की को इतना बदल देता है? चुटकी भर सिंदूर का वज़न क्या इतना भारी होता है कि एक चंचल शोख़ लड़की गंभीर औरत में बदल जाती है? हैरत होती थी उसे अपने आप पर। कि उस की बाडी लैंगवेज इतनी बदल कैसे गई?
पर बदल तो गई थी।
लेकिन गिरधारी राय नहीं बदले थे। वह मुनमुन को बदनाम करना चाहते थे। ठीक वैसे ही जैसे कोई सड़क के किनारे-किनारे चल रहा हो और उस के पीछे से कोई मोटरसाइकिल, कोई कार, कोई जीप, कोई बस तेज़ रफ़्तार आए और सड़क किनारे के कींचड़ का छींटा अनायास उस पर मारती चली जाए। वैसे। पर मुनमुन में अचानक आए बदलाव ने उन की इस शकुनी बुद्धि पर लगाम लगा दी थी। फिर भी उन की बूढ़ी आंखें कीचड़ का छींटा कहां से मारा जाए, इस पर शोध करती रहीं।
गिरधारी राय की फ़ितरत थी कि वह अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए हमेशा दूसरों का, दूसरों के औज़ारों का इस्तेमाल करते। जैसे कि अगर किसी को मारना हो तो वह चाहते थे कि बंदूक़ भी किसी और की हो, कंधा भी किसी और का और ट्रिगर भी कोई और ही दबाए। बस निशाना भर उन का हो। और आदमी मार दिया जाता था। बांसगांव में लंठों और मूर्खों की ऐसी जमात बहुतायत में थी। जो गिरधारी राय या गिरधारी राय जैसों के हाथों इस्तेमाल होने के लिए ही जैसे पैदा हुई थी। ठाकुर बहुल बांसगांव में गिरधारी राय ख़ुराफ़ाती जीनियस यूं ही नहीं कहे जाते थे। खैनी बनाते, खाते, थूकते गांधी टोपी लगाते-उतारते बैठे-बैठे, बैठने की दिशा बदल कर ज़ोर से हवा ख़ारिज करते गिरधारी राय बड़ों-बड़ों को निपटा देते। हालां कि उन के पिता रामबली राय जब जीवित थे तो उन के लिए कहते थे ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर! पर गिरधारी राय कहते कि, ‘इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का पढ़ा हूं। और कोई कोदो दे कर नहीं पढ़ा हूं।’
एक बार एक पूर्व विधायक गिरधारी राय से उलझ गए। दबंग भी थे और ठाकुर भी। हमेशा गोली बंदूक़ लिए चार लोगों से घिरे रहते थे। देशी शराब की कई भट्टियां थीं, ईंट के भट्टे थे, कट्टे भी वह बनवाते थे अपने शोहदों के लिए। ठेका पट्टा भी करते थे। और सब कुछ खुले आम। कोई परदेदारी नहीं। उलटे स्थानीय प्रशासन भी उन से डरता था। क्यों कि तब के ठाकुर मुख्यमंत्री से उन के बिरादराना संबंध थे। बड़े संकट में पड़ गए थे गिरधारी राय। फिर भी उन विधायक महोदय को उन्हों ने अपनी ताक़त भर हिदायत दी और कहा कि, ‘हम से मत उलझिए बाबू साहब! नहीं जब सरे बाज़ार आप की पगड़ी उछलेगी तो पछताइएगा!’
‘जो उखाड़ना हो उखाड़ लेना गिरधारी राय!’ उन पूर्व विधायक ने अपनी मूछें ऐंठते हुए कहा था।
गिरधारी राय तब चुप हो गए थे। पर यह घाव वह किसी घायल नागिन की तरह सीने में दफ़न किए बैठे रहे। कुछ दिन बाद एक नया एस.डी.एम. आया। वह न तो प्रमोटी था, न पी.सी.एस.। बल्कि आई.ए.एस. था। बिहार का रहने वाला था। उस की पहली पोस्टिंग थी। ख़ूब लंबा चौड़ा। ईमानदारी और बहादुरी का भरपूर जज़्बा था। बस गिरधारी राय ने उसे कैच कर लिया। फ़ोन पर उस एस.डी.एम. को पूर्व विधायक बाबू साहब के ग्रास रूट लेबिल की पूरी कुंडली सौंप दी। और उसे चढ़ाते हुए कहा, ‘अभी तक के तो सारे एस.डी.एम. सब कुछ जानते हुए भी इस बाहुबली के सामने सरेंडर किए रहे हैं। लेकिन सुना है कि आप नौजवान हैं, बहादुर हैं और ईमानदार भी। सो आप से ही उम्मीद है!’
‘आप चिंता मत कीजिए!’ कह कर एस.डी.एम. ने फ़ोन काट दिया।
और सचमुच दो तीन दिन बाद से ही एस.डी.एम. ने उस पूर्व विधायक के देशी शराब की भट्टियों, कट्टों की फैक्ट्रियों, ईंट भट्टों पर छापेमारी शुरू कर दी। हफ़्ते भर में ही पूर्व विधायक के ग्रास रूट लेबिल के सारे कारोबार छिन्न भिन्न हो गए। एक रात उस पूर्व विधायक ने एस.डी.एम. को फ़ोन कर पहले तो चेतावनी दी फिर मां बहन की गालियों से नवाज़ा। और कहा कि, ‘नौकरी करनी हो तो सुधर जाओ वरना कटवा कर फेंकवा दूंगा।’ और उधर से एस.डी.एम. कुछ कहता उस के पहले ही फ़ोन काट दिया। एक दिन वह पूर्व विधायक महोदय अपने पूरे दल-बल के साथ बांसगांव बाज़ार से गुज़र रहे थे। उसी बीच एस.डी.एम. भी सी.ओ. पुलिस और एस.ओ. बांसगांव सहित बाज़ार से गुज़रा। एक साथ इतने हथियार बंद लोगों को देख कर एस.डी.एम. भड़का और सी.ओ. से पूछा, ‘यह कौन जा रहा है, किस का कारवां है?’ सी.ओ. ने फुसफुसा कर उस पूर्व विधायक का नाम लिया। तो एस.डी.एम. और भड़क गया। सी.ओ. से बोला, ‘इसे फ़ौरन अरेस्ट करवाइए!’ सी.ओ. प्रमोटी भी था और अधेड़ भी। अचकचाते हुए बोला, ‘सर, इस तरह बाज़ार में?’ उस ने जोड़ा, ‘ठीक नहीं रहेगा।’
‘यहीं ठीक रहेगा।’ कह कर एस.डी.एम. ने अपनी जीप पूर्व विधायक के सामने ले जा कर रुकवा दी। और ड्राइवर से पूछा, ‘इन में से वह कौन है?’ ड्राइवर ने धीरे से इंगित कर दिया। एस.डी.एम. जीप से उतर कर सीधे उस बाहुबली पूर्व विधायक के पास चला गया। पीछे-पीछे पूरी फोर्स मय सी.ओ. और एस.ओ. के।
‘आप ही पूर्व विधायक मिस्टर चंद हैं?’
‘हूं तो, तुम कौन?’
‘मैं यहां का एस.डी.एम. हूं।’
‘ओह तो तुम्हारा दिमाग इतना ख़राब क्यों है?’
‘वह तो बाद में बताऊंगा।’ एस.डी.एम. बोला, ‘पहले आप बताइए आप उस रात भद्दी-भद्दी गालियां क्यों दे रहे थे?’
‘कहो कि गालियों से ही तुम्हें माफ़ कर दिया। नहीं मन तो हो रहा था कि तुम्हारा सिर कलम करवा दूं।’ कह कर पूर्व विधायक ने फिर से एस.डी.एम. पर मां बहन सहित गालियों की पूरी कारतूस ख़ाली कर दी।
जारी…
अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एमए करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। 33 साल हो गए हैं पत्राकारिता
करते हुए। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर प्रेमचंद सम्मान तथा कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हजार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास), प्रतिनिधि कहानियां, फेसबुक में फंसे चेहरे, बर्फ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), हमन इश्क मस्ताना बहुतेरे (संस्मरण), सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’ नाम से प्रकाशित। दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इस उपन्यास के पहले के भागों को पढ़ने के लिए नीचे आ रहे हेडिंगों पर क्लिक करें. दयानंद पांडेय के अन्य लेखों को पढ़ने के लिए सर्च बाक्स में उनका नाम डालकर खोजें.

