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बाजारू मीडिया के पत्रकार भी करें अपनी संपत्ति का खुलासा

बाज़ार से मीडिया या मीडिया से बाज़ार, ये एक ऐसा सच है जो नि:संदेह मीडिया की खोखली तस्वीर पर कटाक्ष के लिए काफ़ी है। अब जब सभी को अपनी संपत्ति घोषित करने का फ़रमान जारी किया जा चुका है, तो भला ऐसे में पत्रकार या मीडियापर्सन को भी क्यों बख़्शा जाए। आख़िर दूसरे की फटी में जब ये लोग अपनी टांग अड़ा सकते हैं तो फ़िर उनकी भी बखिया क्यों न उधेड़ी जाए, उनके बारे में भी पता लगाया जाए कि उनके पास कितनी अघोषित संपत्ति जमा है। लेकिन बहुत कठिन है डगर पनघट की। आज देश में कितने पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें न तो वक्त पर तनख़्वाह मिलती है और न ही वो सुविधाऐं जिनके वो सही मायनों में हक़दार होते हैं, हालात ये हैं कि उन्हें मान्यताप्राप्त बनाने में ही सरकार सालों लगा देती है।

बाज़ार से मीडिया या मीडिया से बाज़ार, ये एक ऐसा सच है जो नि:संदेह मीडिया की खोखली तस्वीर पर कटाक्ष के लिए काफ़ी है। अब जब सभी को अपनी संपत्ति घोषित करने का फ़रमान जारी किया जा चुका है, तो भला ऐसे में पत्रकार या मीडियापर्सन को भी क्यों बख़्शा जाए। आख़िर दूसरे की फटी में जब ये लोग अपनी टांग अड़ा सकते हैं तो फ़िर उनकी भी बखिया क्यों न उधेड़ी जाए, उनके बारे में भी पता लगाया जाए कि उनके पास कितनी अघोषित संपत्ति जमा है। लेकिन बहुत कठिन है डगर पनघट की। आज देश में कितने पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें न तो वक्त पर तनख़्वाह मिलती है और न ही वो सुविधाऐं जिनके वो सही मायनों में हक़दार होते हैं, हालात ये हैं कि उन्हें मान्यताप्राप्त बनाने में ही सरकार सालों लगा देती है।

दूसरे की आवाज़ बनने वाला पत्रकार खुद की आवाज़ नहीं उठा पाता, गली मौहल्ले के स्टिंगर से लेकर मीडिया में काम करने वालों को रोजाना कितने तनाव से गुज़रना पड़ता है, शायद आम लोगों को नहीं मालूम। हालात तो ये है कि खुद कई साल गुज़र जाने के बाद भी अगर कुछ अग्रणी पत्रकारों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर पत्रकार एक सामान्य दुकानदार से भी कम कमा पाते हैं। मीडिया में ग्लैमर की वजह से लोग आ तो जाते हैं लेकिन कुछ दिनों के बाद ही अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं, यहां की हक़ीक़त जानकर वो अपना सिर पकड़ लेते हैं। मीडिया में ज्यादातर ऐसे लोग काम कर रहे हैं जिनको पत्रकारिता कम अपना रौबदाब ज्यादा झाड़ना आता है।

अगर एक सर्च करा ली जाए तो सबके कपड़े उतर जाऐंगे, टीवी पर सिक्योरिटी में बैठकर चिल्लाने वाले ज़रा सड़क पर चिल्लाकर दिखाएं। बिना पेंदी के लोटे की तरह इस चैनल से उस चैनल इस अख़बार से उस अख़बार दौड़ते रहते हैं सारी उम्र… जो थोड़ा चालाक और तेज होता है वो बाज़ी मार लेता है,  लेकिन जिसका कहीं कोई लिंक नहीं वो ताउम्र कलम घिसकर और अच्छे की उम्मीद में ज़िंदगी गुज़ार देता है। ख़बर को आज नमक मिर्च लगाकर परोसा जा रहा है, ख़बर के नाम पर विज्ञापन बटोरे जा रहे हैं, पैसा लाओ चाहे पेड न्यूज़ कैसी भी हो चलाओ मत दौड़ाओ, बाज़ार में टिके रहना है तो ख़बर को माल बनाओ और अच्छी पैकिंग कर बाज़ार में उतार दो, चाहे इससे किसी का भला हो या न हो चैनल और अख़बार का भला तो है ही।

मीडिया इंडस्ट्री का बाज़ार इस वक्त 30 हज़ार करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का है, जिसमें कि न्यूज़ चैनल और अख़बार की हिस्सेदारी तक़रीबन 30 से लेकर 35 फीसदी तक है। अब ऐसे में आप ख़ुद अनुमान लगा सकते हैं कि विज्ञापन से कितना बड़ा पैसा इसके हिस्से में आ रहा है, लेकिन टीरआरपी के चक्कर में और सबसे तेज और सबसे आगे निकलने की होड़ में ख़बरों से समझौता करना कितना आसान और फ़ायदे का सौदा है ये शायद आम लोग नहीं जानते। अब ऐसे में जो पत्रकार बाज़ार और न्यूज़ चैनल या अख़बार के दांव पेंच समझ गया वो आगे बढ़ गया, लेकिन जिसने ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करनी चाही उसे उसकी क़ीमत का अंदाज़ा इतनी जल्दी हो जाता है जितनी कि दिन से रात।

मीडिया में अगर सभी को अपनी संपति का खुलासा करना पड़ गया तो यहां भी अमीर-गरीब वाली खाई सामने आ जाएगी, सच्चाई तो ये है कि मीडिया में पैसा है ही नहीं, और है तो बहुत है अब ये आप निर्भर करता है कि आप किस दायरे में रहना चाहते हैं। आप अपनी ज़िंदगी अभाव में गुज़ार देना चाहते हैं या फ़िर बड़ी और लंबी गाड़ियों और नेताओं, मंत्रियों से संबधों की बदौलत बेशुमार दौलत कमाकर अपना रौबदाब बना सकते हैं। अब जब फ़रमान जारी हो चुका है तो सभी पत्रकारों को चाहे वो ट्रैनी हो या स्ट्रिंगर या फ़िर बड़ा पत्रकार सभी को अपनी संपति का खुलासा करना चाहिए फ़िर जो हकीक़त सामने आएगी उससे मुंह मोड़ना शायद हमारी सरकार और हमारे आकाओं को भारी पड़ जाएगा।

लेखक इंतिखाब आलम पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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