: मानवाधिकारों का हो रहा है उल्लंघन : आजमगढ़ को बदनाम करने की साजिश : 13 सितंबर 08 को दिल्ली में हुए बम धमाकों के बाद 19 सितंबर को बाटला हाउस में आजमगढ़ के साजिद और आतिफ अमीन का फर्जी एनकाउंटर किया गया, जिसको आज सरकारी दस्तावेज भी प्रमाणित कर रहे हैं। सरकार और पुलिस मारे गए दोनों बच्चों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट न देने के विभिन्न हथकंडे अपनाए कि इससे आतंकवादियों को सहयोग मिलेगा, तो वहीं न्यायिक जांच की मांग को लेकर तर्क दिया कि इससे पुलिस का मनोबल गिर जाएगा। बहरहाल मानवाधिकार संरक्षण के लिए बनायी गए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का चरित्र भी इस घटना में खुलकर सामने आया। पहले तो मानवाधिकार आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में एनकाउंटर को क्लीनचिट दी पर बाद में अपनी फर्जी एनकाउंटर लिस्ट में बाटला हाउस को शामिल किया।
लंबे प्रयासों के बाद सूचना अधिकार कार्यकर्ता अफरोज आलम साहिल ने सूचना के अधिकार के तहत बाटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए साजिद और आतिफ अमीन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त की, जिसने इस तथ्य को और मजबूती दी कि पुलिस ने दोनों मासूमों की हत्या की थी। दोनों के शरीर पर चोटों के निशान प्रमाणित करते हैं कि दोनों को गोली मारने से पहले बुरी तरह से मारा-पीटा गया था। यह रिपोर्ट पुलिस के उस दावे को खोखला साबित करती है कि पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाई थी।
केंद्र सरकार ने अपने तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल, जो कथित रुप से इस विवादास्पद एनकाउंटर की निगरानी कर रहे थे तथा दिल्ली की मुख्य मंत्री शील दीक्षित के बचाव के लिए, पुलिस के मनोबल गिरने की दुहाई ही नहीं दी बल्कि राष्ट्रीय मानवाधिकार अयोग की गरिमा को भी दागदार किया। आयोग ने साजिद और आतिफ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के इन बिंदुओं को आखिर में क्यों संज्ञान में नहीं लिया। आयोग ने दूसरे पक्ष को सुनने, घटनास्थल की जांच तथा कथित एनकांउटर में जीवित पकड़े गए मु. सैफ का बयान दर्ज न करके जांच के तटस्थ मापदंडों की अनदेखी की। जिससे आयोग की विश्वसनीयता को गहरा आघात लगा। दिग्विजय का आजमगढ़ दौरा इसी राजनीतिक दुष्चक्र का हिस्सा था जहां साजिद के सिर में लगी गोलियों को संदिग्ध बताया और न्यायिक जांच की मांग को छोड़ देने का दबाव भी बनाया।
इस बात पर तमाम राजनीतिक दलों ने भी सवाल उठाया। खुद दिग्विजय सिंह ने फरवरी की संजरपुर-आजमगढ़ यात्रा में इस बात को कहा कि जिस तरह से लड़कों को गोलियां मारी गयी ऐसा एनकाउंटर में नहीं होता। पर न्यायिक जांच की मांग पर दिग्विजय सिंह जवाब नहीं दे पाए और कहा कि यह उनका व्यक्तिगत मानना है। तब ऐसे में सवाल उठता है कि वही दिग्विजय सिंह संजरपुर जाकर कहते हैं कि सोनिया-राहुल संजरपुर को लेकर बहुत चिंतित हैं और जब मानवाधिकार जैसे गंभीर मसले पर बात आती है तो कहते हैं कि उनका यह व्यक्तिगत राय है। वोट के लिए गोरखपुर में सांप्रदायिकता विरोधी मोर्चे के मुखौटे के साथ कार्यक्रम करना उन्हें व्यक्गित नहीं लगता। एक साल बाद आजमगढ़ मुंह दिखाने आए क्रांग्रेसियों ने इसके लिए सांप्रदायिकता विरोधी मोर्चे के एक मुखौटे और एक भाड़े के प्रभारी अमरेश मिश्र का सहारा लिया।
वहीं बाटला हाउस एनकाउंटर की न्यायिक जांच की मांग को लेकर समाजवादी पार्टी ने संसद में सवाल उठाया तो गृह मंत्री पी चिदंबरम ने न्यायालय की टिप्पणी का हवाला दिया। इस पर सपा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की फर्जी एनकाउंर लिस्ट का भी हवाला दिया। लाजवाब कांग्रेस तो इस पर कोई तर्क नहीं दे पायी पर सपा के उपर भी सवाल उठता है कि अगर वो सचमुच बाटला हाउस एनकाउंटर पर न्यायिक जांच चाहती थी तो उसने क्यों नहीं संसद के बाहर सड़क पर इस मुद्दे को लेकर उतरी, जबकि इस मसले पर भारी जनसमर्थन है।
एक तरफ कांग्रेस के प्रतिनिधि आजमगढ़ जाकर मानवाधिकारों का रोना रोते हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस शासित प्रदेशों की जेलों में बंद आजमगढ़ के लड़कों को प्रताड़ित कर अपने द्वारा थोपे गए झूठे गुनाहों को कबूल करने पर मजबूर करते हैं। ताजा मामला तिहाड़ जेल में बंद आजमगढ़ के सलमान का है। 27 अगस्त 10 को सलमान के उपर तिहाड़ जेल में दीपक झुग्गी वाले ने कातिलाना हमला किया। सलमान को ब्लेड से जगह-जगह मार कर लहुलुहान कर दिया गया। उस समय जेल के अधिकारी वहां खड़े हस रहे थे और कह रहे थे कि आतंकवादी के साथ यही होना चाहिए। मेडिकल के नाम पर सिर्फ मरहम पट्टी करवा दी गयी। इससे पहले जयपुर जेल में 22 नवंबर 09 को बकरीद की नवाज के वक्त मारा पीटा गया। आजमगढ़ के सरवर ने इसकी शिकायत भी की कि जयपुर में जब गर्मियों में पारा काफी चढ़ जाता है और उनके बैरक प्रेशर कूकर की तरह तपने लगते हैं तब भी उन्हें सिर्फ आधे-एक घंटे के लिए बाहर निकाला जाता है।
ऐसे में दिग्विजय सिंह और उनके भाड़े के सांप्रदायिकता विरोधी मोर्चे पर सवाल उठता है जो यह कहता है कि मामले की जल्द सुनवायी के लिए एक कोर्ट बनाया जाय। पहले कांग्रेस अपने जेलों में की जा रही इन अमानवीय करतूतों पर लगाम लगाए। कम से कम अंग्रेजों के जमाने के जेल मैनुअल का तो पालन करवाए। इसी तरह 27 मार्च 09 को जुम्मा की नमाज के वक्त गुजरात जेल में कैदियों के साथ मारपीट की गयी, जिसमें आजमगढ़ के अबू बसर को गंभीर चोटें आयीं और कई कैदियों के सर फट गए और फैक्चर हो गया। कैदियों को झूठे आरोप मनवाने के लिए मारपीट की यह अमानवीय प्रवृत्ति पूरे देश के जेलों की हो गयी है।
आजमगढ़ के कई लड़के अब भी गायब हैं। आजमगढ़ के लड़कों की ही क्यों गिरफ्तारी हुयी। इस पर सवाल पूछने वालों के लिए एक तथ्य जानना चाहिए। उत्तर प्रदेश में 2001 में भाजपा सरकार ने राज्य की पुलिस को एक सर्कुलर; परिपत्र सं-एस टी/एस एल पी -32/2004/4140, मई 2001 को बी बी बख्शी द्वारा हस्ताक्षरित, एस एस पी लखनउ, जारी किया। इस सर्कुलर में आईएसआई के खतरे से निपटने की आड़ में निर्देश दिया गया कि हर थाना प्रभारी; एसएचओ अपने इलाके में रह रहे प्रत्येक मुस्लिम और सिख परिवार के बारे में पंजीयन तैयार करें। भाजपा की गैर-लोकतांत्रिक अल्पसंख्क विरोधी नीति स्पष्ट करती है कि मुसलमान युवकों को फंसाने की यह साजिश बहुत पहले से चल रही है, जिसकी वाहक आज कांग्रेस है।
आतंकवाद ने आज पीड़ित परिवारों में गहरा अवसाद पैदा कर दिया है और कई बच्चों के अभिभावकों को हार्ट अटैक तक हो गया है। हो भी क्यों न एक-एक लड़के पर पचास-साठ मुकदमें और दो-दो सौ गवाह हैं। यहां यह भी सवाल उठता है कि अगर मुंबई हमला जैसा कि कहा जा रहा है कि सबसे बड़ा हमला था तो उसका फैसला जब इतनी जल्दी आ गया, तो फिर उससे पहले की आतंकवादी घटनाओं को क्यों न्यायालयों में धीरे-धीरे चलाया जा रहा है। क्या यह एक साजिश नहीं है सरकार के झूठों पर पर्दा डालने की। क्योंकि अगर जिस तरह से मुंबई मामले में फहीम और सबाउद्दीन के पक्ष में फैसला आया, वैसे फैसले आएंगे तो सरकार के झूठ का पुलिंदा खुल जाएगा।
बाटला हाउस की न्यायिक जांच की मांग का सवाल हमारे लोकतंत्र पर भी सवाल उठाता है कि यह लोकतंत्र है कि पुलिस तंत्र, जहां पुलिस के मनोबल गिरने का तर्क देकर साजिद और आतिफ अमीन की ठंडे दिमाग से की गयी हत्या की न्यायिक जांच नहीं करवायी जा रही है। और तो और पोस्टमार्टम रिपोर्ट, जिसे पाने का हक परिवार वालों को है, भी नहीं दिया गया। तो वहीं मासूमों की लाश पर खड़े कांग्रेसी तंत्र की रीता बहुगुणा जोशी आजमगढ़ जाकर अतीत में जाने की बात कहते हुए अपने आवास पर हुए हमले को आतंकवादी हमला कहते हुए सीबीआई जांच के लिए कहती हैं।
आतंकवाद के नाम पर मानवाधिकार हनन के इस गंभीर मसले पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी उनके पद और उनकी संवेदनहीनता पर सवाल उठाती है। हमारा मानना है कि लोकतांत्रिक प्रणाली की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए बाटला हाउस फर्जी एनकाउंटर की समयबद्ध न्यायिक जांच करवायी जाय। मुकदमे एक कोर्ट में चलने से आजमगढ़ की न छवि सुधरेगी और न ही लड़के छूटेंगे। इसका एक मात्र हल है पाचों राज्यों में हुए धमाकों की न्यायिक जांच करवायी जाय। पिछले दिनों देश में हुए कई धमाकों में राजनीतिक दलों की भूमिका संदिग्ध थी। ऐसे में यह मामला और संदिग्ध हो जाता है कि कांग्रेस ने लगातार मांग के बावजूद दिल्ली, रामपुर, मुंबई समेत किसी भी आतंकी घटना की जांच से भागती रही। बाटला हाउस मामले में शिवराज सिंह पाटिल और शीला दिक्षित पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाय, क्योंकि ठंडे दिमाग से करवायी गयी हत्या चूक या गलती नहीं होती।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज आजमगढ़ के मसीहुद्दीन संजरी, राजीव यादव, शाहनवाज आलम, तारीक शफीक, विनोद यादव, अंशु माला सिंह, जीतेंद्र हरि पांडेय, अब्दुल्ला एडवोकेट, शफीक एडवोकेट, सुनील, राजेंद्र यादव, अकरम, अबु बकर, आरिफ द्वारा जारी किया गया लेख.

