देश ने 62वां गणतंत्र दिवस मनाया. हर साल की तरह इस साल भी लोग राजपथ के फूलों के गमले चुराकर घर ले गए, जो कोई गमले नहीं उठा सका, वह जो हाथ लगा वह उठा ले गया. ये देश मेरा है और इसके प्रति मेरा कोई कर्तव्य है. ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है, ये भी सिद्ध हुआ. ये वाक्य हमारे महापुरुष कहते थे. गणतंत्र दिवस की छुट्टी थी फिर भी भारतवासियों ने महापुरुषों की बात मानी और उस पर अमल भी किया. सभी लोगों ने नहीं किया तो क्या हुआ? आधा लोगों ने तो किया. ये देश मेरा है – इस पर अमल करते हुए जो-जो देश का है वो-वो मेरा मानकर तुरंत घर ले गए. आखिर गणतंत्र दिवस के उत्सव से प्रेरणा लेने के बाद उसको अमल भी तो तुरंत किया, रही बात देश के प्रति मेरा कुछ कर्तव्य है की, तो वो परसों से देखेंगे क्योंकि 27 जनवरी को फिर छुट्टी जो है.
हर साल होने वाली इस चोरी की अब खबर भी नहीं बनती. लेकिन मैंने सोचा इसकी पड़ताल हो, वैसे राजपथ के आसपास, संसद और मंत्रालयों से रोजाना बहुत कुछ चुराया जाता है और उस पर खबर आने के बाद भी कहां कुछ होता है? तो चलो इस बार कम से कम इस चोरी की ही पड़ताल करेंगे, और हमने एक ऐसे परिवार को पकड़ा जो अपने बीवी-बच्चों के साथ बड़ी शान से फूलों का गमला हाथ में उठाये ले जा रहा था. मानो अशोक चक्र मिला हो, और मोहदय लोगों को दिखाना चाहते हों. हमारे कैमरामैन ने जैसे ही कैमरा ऑन किया और रिपोर्टर ने माइक सामने किया महोदय साहब बड़े शांति से बाइट देने लगे. हम तो हैरान हो गए! हमने पूछा आपको डर नहीं लगता? उसने कहा भाई साहब इस क्षेत्र में चोरी पकड़ना मना है, उसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी चाहिए, जो कभी मिलती नहीं. सो डर किस बात का? फिर हमने पूछा मीडिया के सामने इतने कांफिडेंस से कैसे पेश आये? तो उन्होंने कहा – साहब कलमाड़ी जी जैसों से सीखा है. हम जाने लगे तो बोला न्यूज़ कब चलेगी जरा बता देना, अपने मित्रों और मोहल्ले वालों को बताऊंगा, सारे हमेशा कहते थे मैं कभी नहीं सुधरूंगा, उनको मैं ये न्यूज़ देखने को कहूंगा. हम चले लेकिन फिर जोर से आवाज आई साहब ये बात ए. राजा साहब को मत बताना, हमने पूछा क्यों? बोला बहुत गुस्सा होंगे, कहेंगे साले तुमने मेरी तो नाक काट दी, चुराया भी तो क्या, गमला?
ये वाक्या देख के मीडिया खबर नहीं बनाता, सरकार ध्यान नहीं देती, लोग हंसते और छोड़ देते है. हम तीन मूर्ति की तरफ से निकल रहे थे तो किसी के रोने की आवाज आई, हमने देखा तो बापू रो रहे थे, उनकी बची हुई एक मात्र धोती किसी ने चुराई थी! तब हमारा गुस्सा सातवें आसमान पर गया और हम पुलिस चौकी गए, बड़े गुस्से में चिल्लाये, अरे है कोई यहाँ? तो पीछे से एक मंद आवाज आई, यहाँ कोई नहीं है, सब एक कॉल पर गए हैं. हमने पूछा तो बोले 62 साल पहले की काल थी, इसलिये सब जल्दी में थे, ज्यादा कुछ बताया नहीं, लेकिन बोले अरे वो भारत माता को लूटा जा रहा है, उसे देखने जा रहे है! बड़े आश्चर्य से हमने पूछा लेकिन बंदूकें और लाल बत्ती की गाड़ियां तो यहीं हैं? तो बोला उपर से आर्डर है गोली मत चलाना, लुटेरे, बलात्कारी हमारे मतदाता भी हो सकते हैं, और रही बात इज्जत की तो वो एक बार लुटी क्या और बार-बार लुटी क्या? और लुटी तो हम किसी को बताएंगे तो ही पता चलेगा ना?
तभी किसी महिला के चिल्लाने की आवाज आई, हम तेजी से उधर भागे. आवाज संसद की तरफ से आ रही थी, गेट पर हमें सेक्युरिटी ने रोका और बोला वहां कैमरा और मीडिया को जाना मना है. हमने पूछा, अरे, आवाज क्यों और किसकी है, तो बोला- पूरा पता नहीं पर है कोई भारत माता की है. यह सुन के हमारा गुस्सा अब सौवें आसमान पर चढ़ गया. उससे भी ज्यादा जोर से सेक्युरिटी ने कहा दिल्ली में नये हो क्या? जाओ यहां से. उसे बचाने के लिए पिछले 62 साल में आठ हजार लोग अन्दर गए हैं. हमने पूछा – फिर आवाज क्यों आ रही है? तो वहां खड़ा एक समीक्षक बोला हर बार अन्दर जाने वालों को दोबारा अन्दर जाने की चिंता थी, तो बलात्कारी को कोई रोक नहीं पाया. तब पीछे से सत्ताधारी पार्टी का प्रवक्ता बोला- क्या करें गठबंधन में चुप रहना पड़ता है.
तब भगत सिंह के प्रतिमा ने हमें बुलाया, हमने कहा आपने मीडिया को क्यों नहीं बताया? तो भगत सिंह बोले- मीडिया वालों ने कहा पहले विपक्ष तो चिल्लाये या खबर को प्रायोजक दिलवाए. वैसे भी चीख-पुकार बहुत पुरानी और लंबी है. एक पार्ट में बैठेगी नहीं और ब्रेक के बाद दर्शक को समझेगी नहीं. फिर भगत जी हमसे बोले – ये चिल्लाने की आवाज किसी ने सुनी ही नहीं. हमने कहा- आप तो कुछ उपाय समझाओ. तो वे बोले- पहले अपनी ये आखों देखी पूरे देश को तो बताओ, फिर मै समझाऊंगा. इसलिए सुदर्शन पर गणतंत्र की आखों देखी में इतना ही. भगत सिंह की बात इसके बाद तब की जाएगी, जब आप पहली बात पूरी समझ जाएं.
लेखक सुरेश चव्हानके सुदर्शन न्यूज चैनल के चेयरमैन एवं एडिटर हैं.

