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बाबा की ‘जान’ को खतरा है

सुरेश नीरवजब से सुना है कि बाबा की जान को खतरा है अपनी तो जान ही सांसत में है। वैसे तो मोर्चे पर तैनात सैनिक और अनशन पर डटे नेता की जान हमेशा खतरे में ही रहती है। पर यहां तो मामला बाबा का है। हमने अपने एक मित्र को सूचना दी कि अपने भ्रष्टाटाचार भगाऊ बाबा की जान खतरे में है तो वह शैतान बड़ी ज़ोर से हंसा। फिर बोला- उमराव जान, गौहर जान-जैसी जानें नवाबों के तो हुआ करती थीं अब बाबाओं के भी होने लगीं। हमने तुनकते हुए कहा- तुम्हें तो हर वक्त दिल्लगी ही सूझती रहती है। कभी सीरियस भी रहा करो। बाबा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। वे अब राष्ट्र की धरोहर बन चुके हैं। और तुम हो कि दिग्गी राजा की तरह फिकरेबाजी पर उतारू हो। अरे उनकी हिफाजत हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

सुरेश नीरव

सुरेश नीरवजब से सुना है कि बाबा की जान को खतरा है अपनी तो जान ही सांसत में है। वैसे तो मोर्चे पर तैनात सैनिक और अनशन पर डटे नेता की जान हमेशा खतरे में ही रहती है। पर यहां तो मामला बाबा का है। हमने अपने एक मित्र को सूचना दी कि अपने भ्रष्टाटाचार भगाऊ बाबा की जान खतरे में है तो वह शैतान बड़ी ज़ोर से हंसा। फिर बोला- उमराव जान, गौहर जान-जैसी जानें नवाबों के तो हुआ करती थीं अब बाबाओं के भी होने लगीं। हमने तुनकते हुए कहा- तुम्हें तो हर वक्त दिल्लगी ही सूझती रहती है। कभी सीरियस भी रहा करो। बाबा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। वे अब राष्ट्र की धरोहर बन चुके हैं। और तुम हो कि दिग्गी राजा की तरह फिकरेबाजी पर उतारू हो। अरे उनकी हिफाजत हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है।

वो बोला लेकिन बाबा ने तो दो दिन पहले ही कहा था कि उन्हें आतंकवादियों से कोई खतरा नहीं है। फिर ये खतरा किससे हैं। लगता है बाबा को ये खतरा अपने भक्तों से है। भक्तों से तो भगवान को भी सबसे ज्यादा खतरा रहता है। अच्छे खासे अपने भगवान रामलला विद फैमली अयोध्या के छोटे से मंदिर में रह रहे थे। भक्तों की कृपा से अब पुलिसिया बीड़ी के ठोंटों के बीच खुले मैदान में धूप-बारिश झेल रहे हैं। भक्तों से जब रामजी नहीं बचे तो बाबा रामदेव की बेचारे की क्या बिसात। अपने बापू गांधीजी की भी जितनी दुर्दशा उनके भक्तों ने की उतनी तो जालिम अंग्रेज भी नहीं कर पाए थे। भक्तों का बड़ा झंझट रहता है। जिसके जितने भक्त उसकी जान को उतना ही बड़ा खतरा।

ओसामा के सबसे ज्यादा भक्त पाकिस्तान में थे। पता ही नहीं चला किस भक्त ने उन्हें निबटवा दिया। मजाल है भारत में कोई ओसामाजी को हाथ भी लगा पाता। ओसामाजी की तो बात छोड़िए अफजाल गुरू और कसाब भाई तक को कोई छू नहीं सकता। क्योंकि यहां उनके भक्त नहीं है। हमारी तो ऐसी ही मान्यता है। इसीलिए वे यहां आजन्म पूर्ण सुरक्षित हैं। बाबा को ये बात अब खूब समझ में आ गई है। इसलिए उन्होंने भी अपने भक्तों से सुरक्षित दूरी बना ली है। अब भक्तों को बाबा की जगह कमांडो के पैर छूकर ही पुण्य लाभ लेना होगा। बाबा खुद भी योगासन अब कमांडों के घेरे में ही किया करेंगे। मामला जान की सुरक्षा का जो है।

बाबा जिस भक्तिमार्ग पर चलना चाहते हैं वहां भक्तों की भीड़ ने ऐसा ट्राफिक जाम कर दिया है कि भक्तिमार्ग पर चलने में बाबा को बड़ी परेशानी हो रही है। भक्तों की भीड़ और भीड़ की भगदड़ में कुचल जाने का अंदेशा हमेशा बना रहता है। इसलिए ही तो बाबा सियासत की सर्विसलेन से आगे बढ़ना चाह रहे हैं। क्या करें प्रकार-प्रकार के खतरे हैं बाबा की जान को। पान-सुपारी से पूजन करते-करते पता नहीं कौन सुपारी उठा ले। बाबा को यकीनन भक्तों से खतरा है। बाबा की जान के बारे में सोच-सोचकर जान-बूझकर लापरवाह नहीं रहा जा सकता है। सरकार अलग बाबा से नाराज है। अच्छा खासा कारोबार कर रहे थे चटनी-चूरन का। पता नहीं क्या पड़ी थी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने की।

इसी को कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि। चले आए हरिद्वार से दिल्ली भ्रष्टाचार हटाने। मानो भ्रष्टाचार की खदानें दिल्ली में ही खुदी हों। भ्रष्टाचार उत्तराखंड में ही मिल जाता। निशंकजी से कह देते कि भैया भ्रष्टाचार हटाने की खुजली उठी है। हे.. भक्त थोड़ा भ्रष्टाचार इधऱ भी भिजवाओ ताकि हम भ्रष्टाचार हटा सकें। निशंकजी को काहे की कमी। आखिर मुख्यमंत्री हैं। बाबा को जरूरतभर का भ्रष्टाचार तो एकमुश्त वो भिजवा ही देते। और भावुक हो जाते तो किश्त भी बांध सकते थे। मगर नहीं साहब चले आए दिल्ली। जले पर नमक छिड़कने। कलमाड़ी, राजा, कोनीमझी पहले से ही तिहाड़ में हैं। गरीबी में आटा गीला। अन्ना अलग से ही दिल्ली में जंतर-मंतर मार चुके थे। सरकार अपने में परेशान। उसमें इन्हें भ्रष्टाचार हटाने की सूझ गई। भक्तों के भड़कावे में चले आए दिल्ली।

मैं इसलिए बाबा को आगाह कर रहा हूं कि भक्तों से ज़रा बच के रहें। अनशन पर हैं। रोटी की याद करके मन ललचाता तो होगा। ऐसे कमजोर क्षणों में कहीं कोई भक्त चुपके से रोटी का कालाधन ले आया तो बाबा की तपस्या मेनकात्रस्त विश्वामित्र की तरह तड़ से भंग हो जाएगी। और अगर उस खाने में कुछ ऐसा-वैसा हुआ तो जान पर बन सकती है। इसलिए बाबा मन पक्का करके प्लीज.. उसे आप रिफ्यूज कर देना। मेरे थोड़े लिखे को अधिक समझना। मैं आपका भक्त नहीं हूं इसलिए कह रहा हूं- कि बाबा भक्तों से ज़रा बचके। बाकी क्या लिखूं आप खुद समझदार हैं। बालकिशन भैया को हमारी जै रामजी की कहना। आपके साथ भ्रष्टाचार हटाने कित्ते उत्साह से निकले थे। खुद के मम्मी-डैडी बेचारे नेपाली निकल आए। अब इसमें उनका क्या कसूर। और हां…चलते-चलते आपके लिए दो लाइनें-

लोकतंत्र की देखिए महिमा अपरंपार
नेता को जूता मिला बाबा को सलवार.

हीं-हीं-हीं। प्रभु कितना कृपालु है। बाबा… मेरा ये पत्र परम प्राइवेटरूप से गोपनीय है। अकेले में ही पढ़ना। इसे सिब्बल साहब की तरह आप सबके सामने मत बांचना। मैं स्वभाव से वैसे ही बहुत शर्मीला हूं। आपका एक दुर्लभ भूमिगत शुभचिंतक

भोजन भट्ट भारती,

मकान नंबर-420,चोरगली,

सांप्रदायिक नगर,भारत।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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