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बिनायक सेन के नाम एक खुला पत्र

मदनबिनायक सर जी, जैसे ही आपकी जमानत पर फ़ैसला सुरक्षित का समाचार पढ़ा, समझ गया कि जमानत नामंजूर होने की संभावना ज्यादा है। मेरा आपना अनुभव है कि 80 फीसदी मामलों में न्यायालय जब जमानत पर फ़ैसला सुरक्षित रखता है तो उसके नामंजूर होने का ही आदेश होता है। यह भी एक जांच का विषय है कि आखिर वह कौन सा कारण होता है और अंतत: वह सुरक्षित फ़ैसला इनकार की शक्ल में हीं क्यों आता है। खैर यह एक अलग वाद-विवाद का मुद्दा है मेरे और सम्मानीय न्यायाधीशों के बीच। सत्‍ता चाहती है बिनायक सेन जैसों को मार देना या फ़िर सजा करवा कर बिनायक सेन जैसों के मनोबल को तोड़ देना। बिनायक सेन यानी राजसत्‍ता के अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला। अगर वह हथियारविहीन सिर्फ़ नक्सल या अन्य सत्‍ता विरोधी विचारों से सहानुभूति रखने वाला है तो आजीवन कारावास।

मदनबिनायक सर जी, जैसे ही आपकी जमानत पर फ़ैसला सुरक्षित का समाचार पढ़ा, समझ गया कि जमानत नामंजूर होने की संभावना ज्यादा है। मेरा आपना अनुभव है कि 80 फीसदी मामलों में न्यायालय जब जमानत पर फ़ैसला सुरक्षित रखता है तो उसके नामंजूर होने का ही आदेश होता है। यह भी एक जांच का विषय है कि आखिर वह कौन सा कारण होता है और अंतत: वह सुरक्षित फ़ैसला इनकार की शक्ल में हीं क्यों आता है। खैर यह एक अलग वाद-विवाद का मुद्दा है मेरे और सम्मानीय न्यायाधीशों के बीच। सत्‍ता चाहती है बिनायक सेन जैसों को मार देना या फ़िर सजा करवा कर बिनायक सेन जैसों के मनोबल को तोड़ देना। बिनायक सेन यानी राजसत्‍ता के अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाला। अगर वह हथियारविहीन सिर्फ़ नक्सल या अन्य सत्‍ता विरोधी विचारों से सहानुभूति रखने वाला है तो आजीवन कारावास।

और अगर वह नक्सलवादी है तो फ़र्जी एनकांउटर, लेकिन अगर उसके अंदर सरकार को नाकों चने चबवा देने की क्षमता है तो फ़िर वह बन जाता है परेश बरुआ। आराम से भारत के गृहमंत्री के साथ चाय पीते हुये वार्ता करने वाला। उसके सारे खून माफ़। कोई गिरफ़्तारी नही। हुर्रियत पाकिस्तान समर्थक है, खुलेआम अलगाव की बात करते हैं लेकिन कोई परेशानी नहीं होती भारत के सरकार को। हां जब अरुंधति उनकी बात बोलती हैं तो वह देशद्रोह हो जाता है। चाहे परेश बरुआ हो या यासीन मलिक ये सभी देशद्रोही नहीं हैं, न तो कांग्रेस के लिये और न ही भाजपा के लिये, न साम्यवादियों के लिये और न ही थर्ड फ्रंट के लिये। बिनायक सेन आपने कोई हत्या नहीं की है, लेकिन परेश बरुआ के उल्फ़ा ने तो सैकडों की हत्या की है। सैनिकों तक को मारा है। हुर्रियत ने सेना के जवानों तक को मरवाया है, लेकिन वे देशद्रोही नहीं हैं।

देशद्रोही तो आप हैं, बिनायक सेन जी आपको यह अधिकार किसने दिया कि सरकार से यह पूछे कि दादा भी रिक्शा चलाता था, पोता भी चलाता है, सरकार जी, कब पोता रिक्शा चलाना बंद करेगा? नान्‍हो माझी की कितनी पीढि़यां रिक्शा चलाएंगी? कब तक मयावती दलित होने का लाभ लेती रहेंगी? बिनायक सेन जी नरसिंहा समझौता कर लेता है, अपने ही साथियों की हत्या करता है। क्या करता बाल-बच्चे भी तो हैं। एक डॉयलाग सुना है सर जी, “बेटा कहता है, ‘मेरे साथ अत्याचार हुआ इसलिये मैंने हथियार उठाया’, मां कहती है, ‘अत्याचार तो लाखों लोगों के साथ होता है, वे लोग तो नक्स्लाइट नहीं बनते”। जानते हैं सर जी मैं क्या कहता हूं, अत्याचार सह कर जो जीते हैं वो कायर हैं। हो सकता है कुछ मूर्खों को लगे कि मैं भड़काने वाली बात करता हूं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा 2जी घोटाले में, जांच पर इसका असर नहीं पड़ना चाहिये कि इस घोटाले में शामिल लोग फ़ोर्ब्स पत्रिका की अमीरों की लिस्ट में शामिल हैं। यह भी पूछा कि क्यों नहीं विशेष अदालत में 2जी की सुनवाई हो?

अब सुनवाई चाहे किसी भी अदालत में हो, करेगा कोई जज ही न। इसकी क्या गारंटी है कि वह केजी बालाकृष्‍णन या जस्टिस पाटिल नहीं होगा। जज साहब के नाम भी एक संदेश है, क्यों नहीं इस तरह के मुकदमों की की सुनवाई सार्वजनिक हो, यानी जैसे लोक सभा की कार्रवाई दिखाने वाले टीवी चैनल की तरह जनता को दिखाया जाए कि क्या हो रहा है। वैसे भी तो टीवी चैनल महत्वपूर्ण मुकदमों की कार्रवाई को तोड़-मरोड़कर, अपने –अपने फ़ायदे के दृष्टिकोण से दिखाते ही हैं। एक और कानून भी होना चाहिये, भ्रष्ट नेता और अफ़सर को गोली मारने की छूट वाला। मारने वाले को सिर्फ़ यह साबित करना होगा कि जिसे मारा वह भ्रष्ट था। बिनायक सर जी, आप 60 वर्ष के हो चुके हैं, आप जिस भी जेल में रहें, वहां के कैदी दिन की शुरुआत आपके नाम से करें और 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को बिनायक सेन जिंदाबाद कहें। जिस दिन यह समय आयेगा हिंदुस्तान सही अर्थों में आजाद मुल्क कहलायेगा। भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और सुभाष चन्द्र बोस का सपना साकार हो जायेगा। जय हिंद, जय भारत।

लेखक मदन कुमार तिवारी बिहार के गया जिले के निवासी हैं. पेशे से अधिवक्ता हैं. 1997 से वे वकालत कर रहे हैं. अखबारों में लिखते रहते हैं. ब्लागिंग का शौक है. अपने आसपास के परिवेश पर संवेदनशील और सतर्क निगाह रखने वाले मदन अक्सर मीडिया और समाज से जुड़े घटनाओं-विषयों पर बेबाक टिप्पणी करते रहते हैं.

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