मेरे एक बिहारी मित्र हैं। मेरठ में रहते हैं। उनकी शादी मेरठ की लड़की से हुई है। राजद शासन काल में वे एक बार अपनी पत्नी को बिहार ले गए। उनके गांव तक जाने वाली सड़क इतनी खराब थी कि उस पर गाड़ी चलाना बेहद मुश्किल हो रहा था। उनकी पत्नि ने आजिज आ कर कहा, आप मुझे यहीं उतार दें, मैं पैदल चली जाउंगी। एक बार वे राजग के शासन काल में बिहार गए तो उनकी गाड़ी उसी सड़क पर 120 की स्पीड से दौड़ी। मेरे एक और मित्र एक कूलर फैक्टरी चलाते हैं। इन गर्मियों में लेबर की वजह से बेहद परेशान थे। उन्होंने बताया कि बिहारी मजदूर तेजी के साथ बिहार वापस जा रहे हैं। वजह, अब बिहार में भी रोजगार पैदा हो गए हैं। जब दो सौ रूपए उसे अपने ही राज्य में मिल जाएंगे तो वह इधर-उधर क्यों जाएगा। इन दोनों बातों से यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि राजद क्यों हारा और राजग क्यों जीत गया। बिहार की जनता को तथाकथित ’इलीट’ वर्ग हेय दृष्टि से देखता आया है। बिहारी को एक गाली के रूप में प्रयोग भी होते देखा गया है। उसी हेय समझी जाने वाली जनता ने पूरे देश को ऐसा संदेश दिया है, जो आज तक इलीट क्लास नहीं दे पायी है। इस देश के नेताओं और जनता को बिहार की जनता के इस संदेश को समझने की जरूरत है।
राजनैतिक विश्लेषक नीतीश कुमार की जीत के पीछे कुछ भी फैक्टर गिना रहे हों, लेकिन बिहार की जनता का एक लाईन का संदेश यह है कि अब जातिवाद और धर्मवाद की राजनीति नहीं की जा सकती। जो भी जनता को की बुनियादी जरुरतें पूरी करेगा वही राज करेगा। मुस्लिम वोटों को अपनी जागीर समझने वाले नेताओं को भी बिहार के मुसलमानों ने जता दिया है कि विकास के लिए वे भाजपा को भी वोट कर सकते हैं। यहां पर भाजपा नेतओं को भी समझना चाहिए कि साम्प्रदायिक राजनीति से अल्पसमय के लिए तो सत्ता में आया जा सकता है, लम्बे वक्त तक सत्ता में रहने के लिए उसे साम्प्रदायिक राजनीति का परित्याग करना ही होगा।
राजग की जीत के बाद पूरा मीडिया जैसे ’नीतीशमय’ हो गया है। उनकी पार्टी नेपथ्य में चली गयी है। खतरा यह पैदा हो गया है कि कहीं नीतीश कुमार ’वाह-वाह’ की इस आंधी में अपने आप को पार्टी से बड़ा न समझने लगें। वैसे भी नीतीश हेठी के लिए जाने जाते हैं। यह जीत उन्हें और ज्याद हठी बना सकती है। उन्हें लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह यादव के हश्र को नहीं भूलना चाहिए। इन नेताओं ने पार्टी को अपनी पारिवारिक जागीर मान लिया था। हद यह थी कि रामविलास पासवान ने अपने परिवार के छह लोग चुनाव में उतार रखे थे। इन नेताओं को भ्रम था कि उनकी जाति के लोग उनके अंधभक्त हैं इसलिए वे वोट उन्हीं को देंगे। बिहार की जनता ने लालू और पासवान को नकार कर यह साबित कर दिया है कि अब उनका जाति और धर्म के नाम पर शोषण नहीं किया जा सकता।
नीतीश को यह याद रखना होगा कि बिहार की जनता ने 84 प्रतिशत सीटें नीतीश कुमार को नहीं बल्कि राजग को दी हैं। उसकी नीतियों को दी हैं। हमारे लोकतंत्र की यह बहुत बड़ी खामी है कि यहां पर पार्टी और नीतियों से ज्यादा ’चेहरों’ को अहमयित दी जाती है। यही वजह है कि ’चेहरे’ से नकाब हटते ही चेहरा ही नहीं पार्टी भी रसातल में चली जाती है। यदि चेहरों के बजाय नीतियों को अहमियत दी जाए तो किसी और चेहरे को नीतियों को सही तरह से लागू करने के लिए आगे लाया जा सकता है। राजग की जीत के बाद पार्टी जनता दल यू के बजाय चेहरे नीतीश कुमार की ज्यादा तारीफ की जा रही है। पार्टी की कहीं चर्चा नहीं है। राजग का जिक्र नहीं है। यहां तक कि जनता दल यू के अध्यक्ष शरद यादव को कोई नहीं पूछ रहा है। कुल मिलाकर इसे नीतीश कुमार की जीत बताया जा रहा है। यदि ’चेहरा’ ही जीत दिलाने में सक्षम होता तो कांग्रेस को चार सीटें नहीं मिलतीं।
यह बहुत अजीब है कि बिहार का चुनाव जीतने के बाद मीडिया नीतीश को भावी प्रधानमंत्री के रूप प्रचारित करने पर तुल गया है। उत्तर भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री की अप्रत्याशित जीत के बाद मीडिया उसे देश का भावी प्रधानमंत्री घोषित कर देता है। नरेन्द्र मोदी के बारे में भी यही किया गया था तो मायवती को भी यही समझा जाने लगा था। मायवाती को तो वामपंथी पार्टियों ने 2009 के चुनाव में अपना प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट कर दिया था। यह अतिवाद है। एक राज्य की सफलता से कोई मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का दावेदार नहीं हो सकता।
दक्षिण के राज्यों में एमजी रामचंद्रन और एनटी रामाराव जैसे लोग ऐतिहासिक जीत हासिल करते रहे हैं। उनकी लोकप्रियता उत्तर भारत के नेताओं से ज्यादा रही है। इतनी ज्यादा कि उन्हें भगवान तक का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन सिर्फ चेहरे के बल पर वे उत्तर भारत में अपनी जड़ें कभी नहीं जमा पाए। राज्य और देश में बहुत फर्क होता है। भारत जैसे देश में तो और भी ज्यादा, जो विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का देश है। वैसे भी इतिहास बताता है कि भारत में सीधे मुख्यमंत्री से देश का प्रधानमंत्री कोई नहीं बना। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह और चरण सिंह प्रधानमंत्री तो जरूर बनें, लेकिन इनमें भी वीपी सिंह ही ऐसे थे, जिन्हें सांसदों ने प्रधानमंत्री चुना। चरण सिंह और देवगौड़ा राजनैतिक ’हालात’ की वजह से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। हांलाकि वीपी सिंह भी पहले केन्द्र में मंत्री रहे। सीधे वे भी प्रधानमंत्री नहीं बने थे।
बिहार की जनता के संदेश से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी घबरा गईं लगती हैं। मायावती ने अपने विधायकों को आदेश दिया है कि वे जनता को सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों से अवगत कराएं। उत्तर प्रदेश की जनता को पता है कि उत्तर प्रदेश में पार्कों के अलावा किसी और का विकास नहीं हुआ है। उत्तर प्रदेश बिहार से लगा हुआ प्रदेश है। बिहार की जनता का संदेश उत्तर प्रदेश की जनता भी सुन रही है।
लेखक सलीम अख्तर सिद्दीक़ी हिंदी के सक्रिय ब्लागर, सिटिजन जर्नलिस्ट और सोशल एक्टिविस्ट हैं. मेरठ निवासी सलीम विभिन्न विषयों पर लगातार लेखन करते रहते हैं.

