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बिहार चुनाव और पसमांदा मुसलमान

यूसुफ बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निष्क्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं। इन चुनाव में किसी भी पार्टी ने टिकटों के बंटवारे में पसमांदा मुसलमानों का ख़्याल नहीं रखा। हमेशा की तरह इस बार भी उनकी टिकट की दावेदारी हर पार्टी में ख़ारिज हुई। कांग्रेस ने यूं तो बिहार में इस बार मुस्लिम कार्ड जमकर इस्तेमाल किया है लेकिन उसकी फ़ेहरिस्त में पसमांदा मुसलमानों की तादाद कम ही है।

यूसुफ

यूसुफ बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निष्क्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं। इन चुनाव में किसी भी पार्टी ने टिकटों के बंटवारे में पसमांदा मुसलमानों का ख़्याल नहीं रखा। हमेशा की तरह इस बार भी उनकी टिकट की दावेदारी हर पार्टी में ख़ारिज हुई। कांग्रेस ने यूं तो बिहार में इस बार मुस्लिम कार्ड जमकर इस्तेमाल किया है लेकिन उसकी फ़ेहरिस्त में पसमांदा मुसलमानों की तादाद कम ही है।

पिछले चुनाव में जिस पसमांदा मुसलमान के वोटों के घोड़े पर सवार होकर नीतीश कुमार सत्ता की दहलीज़ पर पहुंचे थे इस बार वो भी उन्हें भूल गए। पसमांदा मुसलमानों के मुद्दे की बदौलत नीतीश कुमार के बग़लगीर होने से लेकर राज्यसभा तक का सफ़र तय करने वाले अली अनवर को भी इस पर अब ऐतराज़ नहीं रहा। रही बात लालू प्रसाद यादव और राम विलास पासवान की तो उन्हें पसमांदा मुसलमानों की फ़िक्र न कभी पहले थी और न अब है। इस बारे में बीजेपी से किसी भी तरह की उम्मीद के बारे में सोचना ही बेकार है।

इन हालात में ये सवाल अहम हो जाता है कि आख़िर पसमांदा मुसलमान क्या करें, उनका वोट किधर जाए? ऐसे हालात मे पसमांदा मुसलमानों को मोटे तौर पर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव में से किसी एक का चुनाव करना है। टिकट बंटवारे में नाइंसाफ़ी को नज़र अंदाज़ करके अगर पसमांदा मुसलमान इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करते हैं तो नीतीश का पलड़ा थोड़ा भारी दिखता है। पसमांदा आंदोलन से जुड़े लोगों के दावे को अगर सच माना जाए तो लालू-राबड़ी के 15 साल के राज में संसद, विधान मंडल और राज्य के आयोगों में कुल मिला कर 25 पसमांदा मुसलमानों को नुमाइंदगी मिली। जबकि नीतीश कुमार के पांच साल के राज में 30 लोगों इन जगहों पर नुमाइंदगी मिल चुकी है। पंचायती राज की बात करें तो इस वक़्त राज्य में 518 मुखिया पसमांदा मुसलमान हैं, 452 सरपंच हैं, 51 ज़िला परिषद के सदस्य हैं और 22 प्रमुख हैं। लालू-राबड़ी के 15 साल के राज में पंचायत स्तर पर पसमांदा मुसलमानों की तादाद उंगलियों पर गिनने लायक़ ही रही थी। इसके अलावा नीतीश कुमार ने अब्दुल क़य्यूम अंसारी, ग़ुलाम सरवर, शहीद अब्दुल हमीद और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान की जयंती सरकारी स्तर पर मनाकर पसमांदा मुसलमानों का दिल जीता। इसके अलावा दलित-पिछड़े मुसलमानों के लिए तालीमी मरकज़ खोलकर ये संकेत दिए वो पसमांदा मुसलामानों के लिए वाक़ई कुछ करना चाहते हैं। पसमांदा आंदोलन में कभी अली अनवर के साथ रहे लोग पसमांदा समाज को नीतीश कुमार के इन कामों जानकारी तो दे रहे हैं। लेकिन उनके हक़ में वोट करने की अपील नहीं कर रहे। टिकटों के बंटवारे में पसमांदा मुसलमानों का अनदेखी से ये तबक़ा नीतीश कुमार से ख़ासा ख़फ़ा है।

पूरे चुनाव में पसमांदा मुसलमानों की दिलचस्पी कम होने की एक और वजह ये भी है कि किसी भी पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में पसमांदा मुसलमानों के मुद्दों को तरजीह नहीं दी। लालू-पासवान के गठबंधन ने मुसलमानों के लिए 15 फ़ीसदी आरक्षण की वकालत करके पसमांदा  मुसलमानों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। पसमांदा मुसलमान मज़हबी आधार पर आरक्षण के सख़्त ख़िलाफ़ हैं। वो चाहते हैं कि जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफ़ारिशों के उस हिस्से पर अमल हो, जिसमें हिंदू अनूसूचित जातियों के समकक्ष पेशा करने वाले मुसलमानों को अनुसूचित जातियों में शामिल करके उन्हें दलित आरक्षण की सुविधा देने की बात कही गयी है। लोकिन लालू-पासवान इस बारे मे पसमांदा मुसलमानों के कोई ठोस आश्वासन नहीं दे सके। नीतीश कुमार ने आश्वासन तो दिया है लेकिन उन्होंने बड़ी चालाकी से मुसलमानों के दोनों धड़ों को ख़ुश करने की कोशिश की है। जनता दल यूनाइटेड के घोषणा-पत्र में बिंदु पांच में के दूसरे पैरा में लिखा है-

“अल्पसंख्यक समुदाय के कल्याणार्थ सच्चर कमिटी तथा रंगनाथ मिश्र आयोग की अनुसंशाओं को लागू करने के लिए केंद्र सरकार पर दवाब बनाया जाएगा। दलित मुसमानों को उनका हक़ दिलाने के लिए हम प्रतिबद्ध हैं तथा केंद्र सरकार पर इसके लिए बराबर दबाव बनाए रखेंगे। सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को आरक्षण देने के मुद्दे पर जनता दल (यू) केंद्र सरकार पर दवाब डालेगा कि वह आरक्षण की मौजूदा अधिसीमा 50 प्रतिशत को बढ़ाने के लिए संविधान में आवश्यक संशोधन करें ताकि मुस्लिम समाज को आरक्षण देने का मार्ग प्रशस्त हो सके।”

इससे साफ़ है कि एक तरफ़ तो नीतीश कुमार दलित मुसलमानों के हक़ की बात करके पसमांदा मुसलमानों को ख़ुश करते दिखते हैं तो वहीं अगली ही लाइन में मुस्लिम समाज को आरक्षण देने की वकालत करके अगड़े मुसलमानों को ख़ुश करते दिखते हैं। घोषणा-पत्र जारी करते वक़्त जब नीतीश से इस दोहरी नीति की बाबत सवाल पूछा गया तो वो इस मुद्दे पर साफ़-साफ जवाब नहीं दे सके। हालांकि उन्होंने सफाई दी कि दलित मुसलामानों की ही वकालत कर रहे हैं। लेकिन घोषणा-पत्र की भाषा एकदम साफ है। इसे बेहद चालाकी से लिखा गया है। आख़री वाक्य में वो अगड़े मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में मुसलमानों के लिए 15 फ़ीसदी आरक्षण की मांग की वकालत कर रहे हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग के 27 प्रतिशत आरक्षण में मुसलमानों के एक बड़े तबके को पहले से ही लाभ मिल रहा है तो फिर मुस्लिम समाज के लिए आरक्षण का मार्ग प्रशस्त करने की बात कहां से आ गयी। ज़ाहिर है कि अगड़े मुसलमानों के संगठनों की तरफ़ से धार्मिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर जो आंदोलन चलाया जा रहा है, घोषणा-पत्र में उसी का समर्थन किया गया है। एक साथ दो नावों की ये सवारी नीतीश कुमार को मंहगी पड़ सकती है।

पसमांदा मुसलमानों के लालू या नीतीश से ज़्यादा नाराज़गी अपने उन नेताओं से है, जिन्होंने राज्य सभा या फिर विधान परिषद में पहुंचने के लिए पसमांदा आंदोलन का इस्तेमाल किया और फिर आंदोलन को बेसहारा छोड़ दिया। पिछले चुनाव मे पसमांदा मुसलमानों ने खुल कर नीतीश कुमार का समर्थन किया था, लेकिन इसबार वो खुला समर्थन ग़ायब है। पसमांदा वोटों में इस बार बिखराव भी ज़्यादा हो गया है। पहले जो पसमांदा मुसलमान अली अनवर और ऐजाज़ अली के बीच बंटे थे, वो अब कई ख़ेमों में बंट चुके हैं। अली अनवर और उनके बाद पसमांदा महाज़ के अधयक्ष बने सलाम परवेज़ पसमांदा महाज़ को भूलकर पूरी तरह जनत दल (यू) के रंग मे रंग चुके हैं। कभी अली अनवर के साख कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले उस्मान हलालख़ोर बीच चुनाव में नीतीश का साथ छोड़ कर लालू के पाले में आ गए हैं। दलित मुस्लिम मुद्दे पर नीतीश कुमार के सौदेबाज़ी करके राज्यसभा पहुंचन वाले ऐजाज़ अली इस चुनाव मे अपनी अलग पार्टी बनाकर 50 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। पसमांदा मुसलमान अपने इन रहनमाओं की सियासी पलटबाज़िया देख कर हैरान और परेशान हैं। ये वो नेता है जिन्होंने पसमांदा आंदोलन की बदौलत राज्यसभा, विधान परिषद और आयोगों में जगह पायी और बाद में आंदोलन और आंदोलन के अपने साथियों को लात मार दी। अब इनकी सारी ताक़त अपने-अपने पद बचाने में लग रही है।

लेकिन इस बिखराव के वाबजूद पसमांदा मुसलमान बहुत सी विधान सभा सीटों पर अपनी ताक़त दिखाने का माद्दा रखते हैं। कई सीटों पर अलग-अलग पसमांदा बिरादरियां अकेले ही चुनाव का रुख़ पलटने की ताक़त रखती हैं। लोक सभा चुनाव में कांग्रेस के प्रवक्ता और यूपीए-एक में गृहराज्य मंत्री रहे शकील अहमद मधुबनी से चुनाव इस लिए हारे कि उन्होंने बीच चुनाव में पसमांदा मुसलमानों के अस्तित्व को ही नकार दिया था। उनके एक बयान से नाराज़ होकर पसमांदा मुसलमानों ने बाक़ायदा ऐलान कर के आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को वोट दिया। नतीजा ये हुआ कि शकील अहमद तीसरे स्थान पर खिसक गए। लेकिन इस ग़लती से न उन्होंने कोई सबक़ सीखा है और कांग्रेस ने। कांग्रेस ने इस बार थोक के भाव मुसलमानों को टिकट दिए लेकिन पसमांदा मुसलमानों में उंगलियों पर गिनने लायक़ ही लोग की टिकट के लायक़ पाए गए। बिहार कांग्रेस से जुड़े पसमांदा तबक़े के मुस्लिम नेता आरोप लगा रहे हैं कि शकील अहमद, इमरान क़िदवई और महबूब अली क़ैसर ने मिलकर पसमांदा मुसलमानों के टिकट नहीं होने दिए। पसमांदा मुसलमानों की इस नाराज़गी की वजह से महबूब अली क़ैसर को अपने ही गढ़ में हार का मुंह देखना पड़ सकता है।

कांग्रेस के कई और उम्मीदवार पसमांदा मुसलमानों का नाराज़ी से डरे हुए हैं। कई जगहों से खबरें आ रहीं हैं कि पसमांदा मुसलमान कांग्रेस के अगड़े मुस्लिम उम्मीदवारों के हराने के लिए ख़ामोशी से कमर कसे बैठे हैं। कांग्रेस के नेतओं के अनुसार इस बार पार्टी ने सूबे में क़रीब 15 पसमांदा मुसलमानों को टिकट दिए हैं। लेकिन नेता ये भी स्वीकार करते हैं कि पार्टी में पसमांदा मुसलमानों की नुमाइंदगी बेहद कम होने की वजह से उनमें नाराज़गी है और इसका ख़ामियाज़ा पार्टी को चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। वहीं पसमादा मुसलमानों की ख़ामोशी नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव को भी परेशान कर रही है। हालांकि पसमांदा आंदोलन में बिखराव की वजह से इनका वोट किसी एक तरफ़ पड़ने की उम्मीद तो नहीं हैं। लोकिन अलग-अलग क्षेत्रों में इनके अलग-अलग रुख़ की वजह से कई सीटों पर आश्चर्यजनक उलटफेर हो सकता है। पसमांदा मुसलमानों का रुख़ इस बार किसी की पार्टी नैया पार लगाने या किसी पार्टी की नैया डुबोने से ज़्यादा उन्हें धोखा देने वालों को सबक़ सिखाने का लगता है। ये ग़ुस्सा कहीं ज़्यादा मतदान के रूप में फूटेगा तो कहीं मतदान नहीं करके। किस पसमांदा बिरादरी का वोट कहां किस पार्टी के उम्मीदवार को जाएगा इसका फ़ैसला एकदम आख़री वक़्त में होगा।

लेखक  जाने माने  टीवी पत्रकार  और राजनीतिक  विशलेषक हैं  साथ ही पसमांदा  आंदोलन से  भी जुडे हैं।  वो पसमांदा  और दलित नमुसलमानों  के वो प्रखर  प्रवक्ता माने  जाते हैं।  इस मुद्दे  पर उनकी प्रतिबद्धता  का अंदाज़ा  इसी से लगाया  जा सकता है  कि 2006 में इसी  मसले पर पूछे  गए एक सवाल  पर दिल्ली  की जामा मस्जिद  के शाही इमाम  सैयद अहमद  बुख़ारी ने  प्रधानमंत्री  आवास पर ही  यूसुफ़ अंसारी पर हमला कर दिया था। यूसुफ से उनके मोबाइल नम्‍बर 9811512904 या ई-मेल [email protected] के जरिये संपर्क किया जा सकता है.

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