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बोया नहीं बबूल तो बबूल कहां से होय

: पीपी सिंह ने भले ही सबका भला ना किया हो, पर किसी का बुरा नहीं किया : इस हाइटेक जमाने में खेत-खलिहान से वास्ता न रखने वाले भी भली-भांति यह जानते हैं कि जब बबूल का पेड़ लगाया ही नहीं जाएगा तो वहां बबूल कहां से उगेगा। आम लगाया जाएगा तभी आम होगा। माखनलाल के मौजूदा प्रकरण से तो यही लग रहा है कि शायद अपने कुठियाला साहब इस बुनियादी बात को भूल गए हों या फिर याद रखते हुए भी नासमझी कर गए। एक सच तो यह है ही कि पीपी सिंह ने बबूल बोए ही नहीं। शायद यही वजह रही कि देश के कोने-कोने से उनके लगाए गए शिष्‍य रूपी फल उनके समर्थन में आए।

: पीपी सिंह ने भले ही सबका भला ना किया हो, पर किसी का बुरा नहीं किया : इस हाइटेक जमाने में खेत-खलिहान से वास्ता न रखने वाले भी भली-भांति यह जानते हैं कि जब बबूल का पेड़ लगाया ही नहीं जाएगा तो वहां बबूल कहां से उगेगा। आम लगाया जाएगा तभी आम होगा। माखनलाल के मौजूदा प्रकरण से तो यही लग रहा है कि शायद अपने कुठियाला साहब इस बुनियादी बात को भूल गए हों या फिर याद रखते हुए भी नासमझी कर गए। एक सच तो यह है ही कि पीपी सिंह ने बबूल बोए ही नहीं। शायद यही वजह रही कि देश के कोने-कोने से उनके लगाए गए शिष्‍य रूपी फल उनके समर्थन में आए।

पत्रकारिता का ककहरा मैंने भी माखनलाल में ही सीखा लेकिन पीपी सिंह का इसमें तनिक भी योगदान नहीं है। क्योंकि उनसे अपना कभी कोई खास सरोकार ही नहीं रहा। अपन तो श्रीकांत सिंह के मुरीद थे। क्योंकि वही हमारे विभाग के सुप्रीमो थे। पढ़ाई के दौरान बतौर पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष बस चुनिंदा मुलाकातें ही पीपी सिंह से हुईं। बाद में इससे कहीं ज्यादा दिल्ली में मुलाकातें हुईं। इन्हीं मुलाकातों के दौरान मैंने पाया कि सर्व विभाग सम्भाव की उनकी भावना ही थी कि उनसे मिलने वाला हर छात्र उनका मुरीद हो जाया करता था। छात्र चाहे किसी विभाग का क्यों न हो और उसकी समस्या कैसी ही क्यों न हो, एक अभिभावक की तरह उचित मार्गदर्शन करने को वह हमेशा तत्पर रहते।

मौजूदा विवाद के दौरान मेरे पास कई सहपाठियों व मित्रों के फोन आए। सभी ने कहा कि पूर्व छात्र होने के नाते मुझे भी इस मैदान में कूद जाना चाहिए। लेकिन मैंने सोचा वस्तुस्थिति जाने बगैर कूद पड़ना अनुचित होगा। अलबत्ता मैंने इसकी तह में जाने की कोशिश की। आखिरकार इसके पीछे राजनीति क्या है और क्यों इस विवाद ने इतना तूल पकड़ा।

बहरहाल, इसके पीछे की राजनीति चाहे जो भी रही हो उस राजनीति की पृष्‍ठभूमि में न पड़ते हुए मैं यह अर्ज करना चाहूंगा कि जांच-पड़ताल की प्रक्रिया के दौरान कई मित्रों के मुताबिक मैंने पाया कि पीपी सिंह मठाधीश हो गए हैं और अपना हक साधने के लिए छात्रों का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि कुठियाला साहब विश्वविद्यालय को संवारने के लिए कई अहम कदम उठा रहे हैं। पीपी सिंह को यह रास नहीं आ रहा है और उन्हें अपनी मठाधीशी गंवाने का डर पैदा हो गया है, इसलिए छात्रों को आगे कर पीछे से राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं। अपने-अपने तर्क में उन्होंने कई बातें बताईं। यह बता ही दूं कि इनमें से अधिकांश मित्र एक धारा विशेष से ताल्लुक रखने वाले हैं और अपने-अपने हितों के लिए उससे जुड़े हैं।

जब मैंने दूसरे साथियों को टटोला तो उन्हें पीपी सिंह का अंध भक्त पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह यही दिखी कि पीपी सिंह ने कम से कम सैकड़ों छात्रों का पढ़ाई के बाद करियर संवारने में अहम भूमिका निभाई। ऐसे ही एक पूर्व छात्र ने कहा, पीपी सिंह अपने खासम खासों को अच्छे संस्थानों में और दूसरी श्रेणी वालों को इसी प्रकार के संस्थानों में भेजते हैं, लेकिन ही कुछ भी हो ब्रजेन्द्र भाई पीपी सिंह ने 3000 रूपये प्रतिमाह की ही नौकरी लगाई हो, लेकिन लगाई तो सही।

मतलब, पीपी सिंह ने आम ही आम बोए ऐसा भी नहीं है लेकिन अहम है कि उन्होंने बबूल नहीं बोए। इसलिए तो वर्तमान से लेकर भूतपूर्व छात्र सभी उनके समर्थन में खुलकर सामने आए। भले ही उनका छात्र रहा हो या न रहा हो। कुठियाला साहब ने ही यदि आम बोया होता तो या फिर बबूल नहीं बोए होते तो आज उनके समर्थन भी सैंकड़ों छात्र खड़ा हो सकते थे, जो कि दिखा नहीं।

लेखक ब्रजेन्‍द्र नाथ सिंह इंडो-एशियन न्‍यूज में प्रमुख संवाददाता हैं.

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